
आधुनिक भारत के शिल्पी कहे जाने वाले देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू न केवल एक राष्ट्रवादी और युगदृष्टा थे, बल्कि जनवादी भी थे। उन्होंने स्वतंत्र भारत में समतामूलक विकास की नींव रखी।
नेहरू (14 नवंबर 1889-27 मई 1964) ने स्वतंत्र भारत में संसदीय सरकार और जनवाद को बड़ी सावधानी से पाला-पोसा और इसकी जड़ें मजबूत की। इसे हम पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव में भी फलते-फूलते देख रहे हैं।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्राध्यापक कमल मित्र चिनाय ने बताया संविधान निर्माण में आम्बेडकर और अन्य नेताओं के अलावा नेहरू की भी भूमिका थी। उन्होंने अपने नेतृत्व में संविधान को अमल में लाने के लिए अहम योगदान दिया।
चिनाय ने बताया आजादी के बाद के शुरुआती दिनों में सत्ता में कांग्रेस का बहुमत होते हुए भी उन्होंने विभिन्न मुद्दे पर खुलेआम बहस की, जिसे ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी की पत्रिका में भी देखा जा सकता था।
उन्होंने बताया कि 1950 के बाद से पार्टी पर पूर्ण वर्चस्व प्राप्त होने के बावजूद नेहरू ने आंतरिक जनवाद और खुली बहस को कांग्रेस के अंदर भी प्रोत्साहित किया। उन्होंने ऐसे संस्थागत ढाँचे के विकास में सहयोग दिया, जो जनवादी मूल्यों पर आधारित थे और जिनमें सत्ता विकेंद्रित थी।
प्रो. चिनाय ने बताया कि नेहरू खुद को समाजवादी कहते थे, लेकिन खुद को समाजवाद की धारा से कुछ अलग रूप में देखते थे।
एक बार जब नेहरू से पूछा गया कि भारत के लिए वे क्या छोड़कर जाएँगे तो उन्होंने कहा था-आशा है चालीस करोड़ ऐसे लोग जो हमारा शासन चलाने के काबिल होंगे।
नेहरू का मानना था कि भारत जैसे विभिन्नता वाले समाज में जनवाद विशेष तौर पर जरूरी है। उन्होंने समाजवादी दृष्टिकोण को करोड़ों जनता तक पहुँचाया और समाजवाद को उनकी चेतना का हिस्सा बना दिया।
नेहरू की सबसे बड़ी जिम्मेदारी और उनकी उपलब्धि भारत की आजादी का सुदृढ़ीकरण और उसकी चौकसी करना था, क्योंकि उस वक्त दुनिया दो महाशक्तियों अमेरिका और सोवियत संघ के बीच बँटी हुई थी।
प्रो. चिनाय ने बताया नेहरू ने गुटनिरपेक्षता के माध्यम से बहुत सारे देशों को एकत्र कर लिया, वरना आजादी खतरे में पड़ जाती। नेहरू ने सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र को मिलाकर एक राष्ट्रीय क्षेत्र बनाया, जिसे मिश्रित अर्थव्यवस्था के नाम से जाना गया।
उन्होंने बताया कि वे चाहते थे कि सार्वजनिक क्षेत्र निजी क्षेत्र को बढ़ने में मदद करे। साथ ही सार्वजनिक क्षेत्र लोगों को नौकरी मुहैया कराने में मदद करे।
नेहरू ने एक स्वतंत्र और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था के ढाँचे का निमार्ण कार्य आरंभ किया और पंचवर्षीय योजना की शुरुआत की। उन्होंने धर्मनिरपेक्षता की जड़ों को भारतीय जनता के बीच फैलाया।
साभार - वेबदुनिया. कॉम
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