
हर रविवार की सुबह गांव के कुछ लोग चौपाल पर जमा होकर यहां-वहां की हांकने में जुटे थे। तभी गांव का एक धनी दुकानदार भी वहां आ पहुंचा और शेखी बघारते हुए बोला, ‘तुम सब अपनी बातें छोड़ो, मेरी सुनो। मैं तो हरीश सेठ के बंगले के अंदर जाकर सब कमरे भी देख चुका हूं।’
लोगों को उसकी बात पर सहसा विश्वास न हुआ क्योंकि हरीश सेठ उस गांव का ही नहीं, पूरे नगर में सबसे धनवान होने के साथ-साथ लालची, अक्खड़ और महाकंजूस भी था।वहां बैठे बड़बोले मोहन से रहा न गया। वह बोला, ‘तुमने तो हरीश सेठ का बंगला देखा भर है। मैं चाहूं, तो उसके साथ बैठकर खाना भी खा सकता हूं।‘ ‘ये मुंह और मसूर की दाल। तुझ जैसे फटीचर का यह ख्वाब कभी पूरा नहीं हो सकता।’ दुकानदार ने मोहन का मÊाक उड़ाते हुए कहा।
‘तो लगी शर्त! अगर मैंने हरीश सेठ के साथ बैठकर खाना खा लिया, तो तुम अपनी बग्घी का घोड़ा और पालतू गाय मुझे सौंप दोगे और अगर मैं वैसा न कर पाया, तो बिना वेतन के दो साल तक मैं तुम्हारे यहां काम करूंगा।’
‘मुझे मंजूर है।’ दुकानदार ने वहां मौजूद लोगों के सामने मोहन से हाथ मिलाते हुए कहा।
‘अब देखो मेरा कमाल!’ कहने के साथ ही मोहन मन ही मन योजना बनाकर हरीश सेठ के बंगले पर जा पहुंचा और वहां तैनात दरबान से बोला, ‘सेठजी से जाकर कहो कि मुझे उनसे कुछ Êारूरी बात पूछनी है।’सेठ ने जिज्ञासावश मोहन को अपने पास बुलवाकर पूछा, ‘क्या पूछना चाहते हो मुझसे?’
‘सेठजी, कृपया आप मुझे यह बताएं कि लगभग आधा किलो वजनी सोने की गेंद का मूल्य कितना होगा?’ ‘लगता है इसके हाथ कहीं से सोने की गेंद लग गई है। इससे पहले कि यह गंवार उसे कहीं ओर बेचे, मुझे ही वह हासिल कर लेनी चाहिए।’ सोचकर हरीश सेठ ने कहा, ‘बता दूंगा, इतनी भी क्या जल्दी है। पहले कुछ खा-पी लेते हैं।’ उसने अपने तथा मोहन के लिए बढ़िया-बढ़िया पकवान बनवाए। फिर दोनों ने डटकर भोजन किया। उसके बाद हरीश सेठ ने मोहन की खातिरदारी करते हुए उसे चांदी का वरक चढ़ी पान की गिलौरी भी भेंट की।
‘अब तुम दौड़कर घर जाओ और सोने की गेंद मेरे पास ले आओ, पर उसे बड़ी सावधानी के साथ और ढंककर लाना।’
‘लेकिन मेरे पास तो कोई गेंद नहीं है।’
‘मÊाक मत करो। मैं तुम्हें उस गेंद के बदले में दो बोरी आटा, दो बोरी दाल और चांदी के कुछ सिक्के भी दूंगा।’
‘मैं सच कह रहा हूं कि मेरे पास ऐसी कोई गेंद नहीं है। मैं तो सोच रहा था कि अगर मुझे कहीं से वैसी कोई सोने की गेंद मिल जाए, तो उसकी कीमत कितनी होगी, बस वही पूछने मैं आपके पास आया था।’‘मूर्ख..बदतमीज..जाहिल..चल फूट यहां से। जाने कहां-कहां से उठकर चले आते हैं।’
हरीश सेठ का पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा था। मोहन चुपचाप बंगले से बाहर आ गया और जोर जोर से हंसने लगा। जहां वह एक अमीर किंतु लालची और कंजूस सेठ के साथ बढ़िया भोजन करने में सफल हुआ, वहीं शर्त जीतकर एक बढ़िया घोड़ा तथा गाय भी हासिल कर चुका था।
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