<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222</id><updated>2012-02-16T00:57:31.031-08:00</updated><category term='कविता'/><category term='सेहत'/><category term='उपन्यास'/><category term='कहानी'/><category term='जिज्ञासा'/><category term='सुरभि'/><category term='प्रेरणा स्रोत'/><category term='पत्र'/><category term='पहेली'/><category term='तकनीक'/><category term='उपलब्धि'/><title type='text'>बाल जगत  |:|संघ साधना द्वारा संचालित |:|</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>50</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-4826287290793799606</id><published>2009-11-21T01:53:00.000-08:00</published><updated>2009-11-21T01:58:42.065-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जिज्ञासा'/><title type='text'>टि‍मटिम करते तारे</title><content type='html'>गर्मी का मौसम, रात का समय, खुली छत पर मंद-मंद बहती ठंड मदमस्त हवा में जो आनंद और सुख मिलता है, ऐसा और कहाँ?&lt;br /&gt;यह आनंद उस समय और भी बढ़ जाता है, जब अँधेरी रात के साफ आसमान में हजारों, लाखों, करोड़ों की संख्‍या में टिमटिमाते जगमगाते तारे एक ऐसी अद्‍भुत दुनिया का दृश्य प्रस्तुत करते हैं जिसके न आरंभ का पता चलता है और न अंत का।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सदियों से अनेक मनीषी, ऋषि और वैज्ञानिक इन्हें निहारते चले आ रहे हैं, परंतु रहस्य अभी तक बना हुआ है। तारों की इस अचरज भरी दुनिया को कोई अंतरिक्ष कोई ब्रह्माण्ड तो कोई तारा विश्व के नाम से संबोधित करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बच्चो, रात को आकाश में जरा गौर से देखो, तुम्हें दो तरह के तारे दिखाई देंगे। इनमें से कुछ तारे अत्यंत चमकीले तो कुछ धुँधले दिखाई देते हैं, कुछ तारे स्थिर तो कुछ टिमटिमाते नजर आते हैं। जानते हो ऐसा क्यों है? आदि और अंत रहित इस खुले अंतरिक्ष में तारे, ग्रह, उपग्रह आदि अनेक आकार-प्रकार के आकाशीय पिंड हैं, जो दूर से तो लगभग एक से दिखाई देते हैं परंतु उनकी रचना और स्वभाव में अंतर मिलता है जो तारे टिमटिमाते रहते हैं वे हमारे सूर्य के समान विशाल तारे हैं। ऐसा तारों के केंद्र में नाभिकीय संलग्न अभिक्रिया करते हैं जिससे छोटे-छोटे नाभिक मिलकर एक बड़े नाभिक का निर्माण करते हैं जिससे अत्यधिक मात्रा में परमाणवीय ऊर्जा निकलती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह ऊर्जा उष्मा रूप में बदलकर तरल अग्नि पुंज का विशाल आकार ले लेती है। उसी ऊर्जा से हमें प्रकाश और उष्मा मिलती है। हमारा सूर्य इसी प्रकार का एक तारा है। अंतरिक्ष में सूर्य जैसे असंख्‍य तारे हैं। अंतरिक्ष में इनसे छोटे आकाशीय पिंड ग्रह कहलाते हैं। आकार में छोटे होने के कारण इनमें दाब और ताप कम होते हैं। इनमें नाभिकीय अभिक्रिया नहीं होती क्योंकि दाब और ताप कम होने के कारण ये परमाणु एवं नाभिकों पर काबू नहीं पा सकते। इस कारण उनसे प्रकाश, उष्मा एवं ऊर्जा नहीं निकल पाती। ऐसे पिंड दूर से चमकते तो हैं परंतु उनमें दूसरों को प्रकाशित करने की क्षमता नहीं होती और वे दूसरों को न ही उष्मा दे पाते हैं। इन्हें ग्रह कहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रह और तारों में एक अंतर यह भी है कि तारे टिमटिमाते नजर आते हैं जबकि ग्रह ऐसा नहीं कर पाते क्योंकि अग्निपुंज रूप में चमकने वाले तारों से जब प्रकाश किरणें हमारे वायुमंडल की विभिन्न प्रकार की सघन एवं विरल गैस परतों को पार करती हैं तब प्रत्येक माध्यम से दूसरे माध्यम में गुजरने के बाद इनका परावर्तन हो जाता है। मार्ग में इस बार-बार परिवर्तन के कारण ही हमें तारे टिमटिमाते नजर आते हैं। प्रत्येक तारा (सूर्य) आकाश गंगा में धुँधली सफेद सी पट्‍टी दिखाई देने वाली आकाश गंगा का सदस्य होता है। यह अपनी धुरी पर घूमता हुआ आकाश गंगा के केंद्र की परिक्रमा करता है जबकि ग्रह किसी तारे सूर्य के परिवार का सदस्य होने के कारण अपनी कीली पर घूमता हुआ उसके चारों ओर परिक्रमा करता है। हमारी पृथ्‍वी, बुध, शुक्र आदि इसी प्रकार के ग्रह हैं जो सूर्य की ‍परिक्रमा करते रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आकार और प्रकार में ग्रह से छोटा आकाशीय पिंड उपग्रह है। इसमें न तो स्वयं में प्रकाश होता है और न दूसरों को प्रकाशित कर पाता है। जब इस पर किसी तारे का प्रकाश पड़ता है तब यह चमक उठता है जैसे हमारा चंद्रमा। यह सूर्य के प्रकाश से चमकता है और उसी के प्रकाश को चाँदनी रूप में पृथ्‍वी पर परिवर्तित कर देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह भी अपनी धुरी पर घूमता है और पृथ्‍वी के चारों ओर परिक्रमा करता है। इसमें एक विशेष बात यह है अपनी धुरी पर जितने दिन में एक बार घूम लेता है पृथ्‍वी के चारों ओर की परिक्रमा में भी उतने ही दिन लगाता है। आकाश में चंद्रमा जैसे सैकड़ों उपग्रह हैं जो किसी न किसी ग्रह के चंद्रमा के रूप में परिक्रमा करते रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप शायद नहीं जानते कि तारे प्राय: समूहों में पाए जाते हैं। अंतरिक्ष में 83 प्रतिशत तारे जोड़े के रूप में पाए जाते हैं। समूह रूप में भी इस प्रकार फैले हुए हैं कि यदि इन अलग-अलग समूह के तारों को रेखा द्वारा आपस में मिला दिया जाए तब आकाश में अलग-अलग प्रकार के प्रतीक बन जाते हैं। कुंभ, मकर, मेष, सिंह आदि ऐसे ही चिन्ह हैं। उन्हें तारामंडल अथवा राशि कहते हैं। हमारी पृथ्वी सूर्य के चारों ओर जिस मार्ग से परिक्रमा करती है। उसके ऊपर इस प्रकार फैले तारामंडल को 12 राशियों में नामांकित करके प्रत्येक माह के लिए एक राशि निर्धारित की गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नवीन खोजों के आधार पर वर्तमान में 12 के स्थान पर 89 तारामंडल बताए जाते हैं। इनमें से 68 तारामंडल नग्न आँखों से देखे जा सकते। हाइड्र तारामंडल इनमें सबसे विशाल है। सेंटारस, जेमिनी, हर‍कुलिस, विग्रो आदि ऐसे अन्य तारामंडल भी हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-4826287290793799606?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/4826287290793799606/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/11/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/4826287290793799606'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/4826287290793799606'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='टि‍मटिम करते तारे'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-1148911321453113258</id><published>2009-07-28T13:00:00.000-07:00</published><updated>2009-07-28T13:01:59.295-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>संत की सीख</title><content type='html'>यह उस समय की कथा है , जब गुलामी प्रथा प्रचलित थी। एक मस्तमौला संत थे। वह हर समय ईश्वर के स्मरण में लगे रहते थे। एक बार वह किसी जंगल से गुजर रहे थे, तभी गुलामों का कारोबार करने वाले एक गिरोह की निगाह संत पर पड़ी। गिरोह के सरगना ने जब संत का स्वस्थ शरीर देखा तो सोचा कि इस व्यक्ति की अच्छी कीमत मिल जाएगी। उसने तय किया कि उन्हें पकड़कर बेच दिया जाए। उसके इशारे पर गिरोह के सदस्यों ने संत को घेर लिया। संत ने कोई विरोध नहीं किया। &lt;br /&gt;गिरोह के सदस्यों ने जब संत को बांधा, तब भी संत चुप्पी साधे रहे। संत की चुप्पी देखकर एक आदमी से रहा नहीं गया। उसने पूछा, 'हम तुम्हें गुलाम बना रहे हैं और तुम शांत हो। तुम हमारा विरोध क्यों नहीं कर रहे?' संत ने जवाब दिया, 'मैं तो जन्मजात मालिक हूं। कोई मुझे गुलाम नहीं बना सकता। इसलिए मैं क्यां चिंता करूं।' गिरोह के सदस्य संत को गुलामों के बाजार में ले गए और आवाज लगाई, 'एक हट्टा-कट्टा इंसान लाए हैं। किसी को गुलाम की जरूरत हो तो बोली लगाओ।' यह सुनना था कि संत ने उससे भी अधिक जोर से आवाज लगाई, 'यदि किसी को मालिक की जरूरत हो तो मुझे खरीद लो। मैं अपनी इंद्रियों का मालिक हूं। गुलाम तो वे हैं जो इंद्रियों के पीछे भागते हैं और शरीर को ही सब कुछ समझते हैं।' &lt;br /&gt;संत की आवाज उधर से गुजर रहे उनके भक्तों ने सुनी। वे समझ गए कि यह पुकारने वाला कोई अवश्य ही आत्मज्ञानी व्यक्ति है। वे सभी भक्त संत के चरणों में झुक गए। भक्तों की भीड़ देखकर गिरोह के सदस्य घबरा गए और संत को वहीं छोड़कर भागने लगे। उनके भक्तों ने उन्हें पकड़ लिया पर संत ने उन्हें छोड़ देने को कहा। गिरोह के सरगना ने संत से माफी मांगी और अपना यह धंधा छोड़ देने का संकल्प किया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-1148911321453113258?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/1148911321453113258/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/07/blog-post_4891.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/1148911321453113258'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/1148911321453113258'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/07/blog-post_4891.html' title='संत की सीख'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-1405764091167663482</id><published>2009-07-28T12:57:00.000-07:00</published><updated>2009-07-28T12:58:53.354-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>मन की गांठें</title><content type='html'>एक व्यापारी के पास पांच ऊंट थे, जिन पर सामान लादकर वह शहर-शहर घूमता और कारोबार करता। एक बार लौटते हुए रात हो गई। वह एक सराय पर रुका औ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;र एक पेड़ से ऊंटों को बांधने लगा। चार ऊंट तो बंध गए मगर पांचवें के लिए रस्सी कम पड़ गई। व्यापारी परेशान हो गया। जब उसे कुछ नहीं सूझा तो उसने सराय मालिक से मदद मांगने की सोची। तभी उसे सराय के दरवाजे पर एक फकीर मिला, जिसने व्यापारी से पूछा, 'बताओ, क्या परेशानी है?' व्यापारी ने उसे अपनी समस्या बताई तो वह जोर से हंसा। फिर उसने कहा, 'पांचवें ऊंट को भी उसी तरह बांधो जिस तरह बाकी ऊंटों को बांधा है।' व्यापारी बोला, 'मगर रस्सी कहां है?' फकीर ने कहा, 'उसकी कोई जरूरत नहीं है। उसे कल्पना की रस्सी से बांधो। मतलब बांधने का अभिनय करो।' व्यापारी ने वैसा ही किया। उसने ऊंट के गले में रस्सी का काल्पनिक फंदा डाला और उसका दूसरा सिरा पेड़ से बांध दिया। ऐसा करते ही ऊंट आराम से बैठ गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह उठकर बंधे हुए ऊंटों को व्यापारी ने खोला। ऊंट उठकर चल दिए। व्यापारी ने उस ऊंट को भी हांका जिसे काल्पनिक रस्सी से बांधा था लेकिन वह हिला तक नहीं। व्यापारी ने उसे देर तक पुचकारा मगर वह नहीं उठा। गुस्से में आकर व्यापारी ने उसे डंडे मारने शुरू कर दिए। तभी फकीर आ पहुंचा। उसने पूछा, 'इस पर क्यों जुल्म ढा रहे हो?' व्यापारी ने कहा, 'यह उठता ही नहीं।' इस पर फकीर बोला, 'उठेगा कैसे। इसे तो तुमने बांध रखा है।' व्यापारी ने कहा, 'पर मैंने तो बांधने का अभिनय किया था।' फकीर ने मुस्कराकर कहा, 'अब इसे खोलने का अभिनय करो।' ऐसा करते ही ऊंट उठकर चल पड़ा। फकीर ने कहा, 'जिस तरह यह ऊंट अदृश्य रस्सियों से बंधा हुआ था उसी तरह लोग रूढ़ियों से बंधे होते हैं, आगे बढ़ना नहीं चाहते।' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(सूर्या सिन्हा की किताब 'कहानियां बोलती हैं' से)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-1405764091167663482?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/1405764091167663482/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/07/blog-post_28.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/1405764091167663482'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/1405764091167663482'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/07/blog-post_28.html' title='मन की गांठें'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-1536476814430159421</id><published>2009-07-05T05:06:00.000-07:00</published><updated>2009-07-05T05:07:04.291-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>चरणदास चोर</title><content type='html'>'चरणदास चोर' यह फिल्म मैंने दो साल पहले देखी थी। बहुत प्यारी फिल्म है। फिल्म देखने के बाद मैंने तय किया था कि किसी भी हाल में सच बोलूँगा। यह फिल्म का प्रभाव है। फिल्म सिर्फ यही एक बातनहीं बताती बल्कि और भी कई बातें सिखाती हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्म शुरू करने के पहले कहानी के बारे में भी कुछ मजेदार बातें जान लो। जैसे इसकी असल कहानी एक राजस्थानी लोककथा के आधार पर विजयदान देथा ने लिखी। वे विजयदान देथा की कहानी पर हबीब तनवीर साहिब ने छत्तीसगढ़ का लोकरंग मिलाकर 'चरणदास चोर' नाटक करने का सोचा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब श्याम बेनेगल ने अपने शुरुआती वर्षों में अंकुर के बाद बच्चों के लिए फिल्म बनाने का सोचा तो उन्हें भी यही कहानी पसंद आई। श्याम बेनेगल ने इस फिल्म में चरणदास की भूमिका के लिए नाचा के श्रेष्ठ कलाकार लालूराम को चुना था। यह मध्यप्रदेश में बनी फिल्म है जब छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश से अलग नहीं हुआ था तब। तो आओ इस फिल्म की बात शुरू करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चरणदास चोर एक चोर की मजेदार कहानी है। यह चोर ही कहानी का हीरो है। और इस चोर का नाम है चरणदास। एक बार पुलिस से बचने के लिए चरणदास एक साधु के पास जा पहुँचता है। चरणदास साधु को गुरु मान लेता है। साधु चरणदास से पाँच वचन लेता है। इनमें पहले चार वचन इस तरह हैं - सोने-चाँदी की थाली में नहीं खाऊँगा, हाथी-घोड़े के जुलूस में सवारी नहीं करूँगा, कोई रानी भी मुझसे शादी करना चाहे तो मना कर दूँगा और कोई राजा बनाना चाहेगा तो नहीं बनूँगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चरणदास ये चार वचन यह सोचकर देता है कि उसके जीवन में कहाँ-कभी ऐसे मौके आने वाले हैं। साधु बाबा भी उससे कहते हैं कि तूने जो वचन दिए हैं वे बातें तेरे जीवन में कहाँ होने वाली हैं। इसके बाद साधु बाबा कहते हैं कि मेरी तरफ से एक वचन दे कि तू चोरी करना छोड़ देगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पर चरणदास कहता है कि गुरुदेव वह तो मेरा धंधा है। चोरी करना छोड़ दूँगा तो खाऊँगा क्या? फिर पाँचवाँ वचन सच बोलने का देकर वह साधु से बिदा लेता है। चरणदास के ये पाँच वचन ही कहानी को आगे बढ़ाते हैं। फिल्म आगे बढ़ती है। चरणदास के साथ उसका शागिर्द बुद्धू धोबी भी है। दोनों गाँव में खूब चोरियाँ करते हैं। पर दोनों उतने बुरे भी नहीं हैं क्योंकि वे अमीरों का धन लूटकर गरीबों को बाँट देते हैं। दोनों के दिन इस तरह कट रहे थे। एक बार वे राजमहल का रुख करते हैं। बुद्धू धोबी की मदद से चरणदास भेष बदलकर महल में प्रवेश करता है। चरणदास शाही खजाने से अपनी जरूरत के हिसाब से पाँच स्वर्ण मुद्राएँ चुरा लेता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चोरी सिर्फ चरणदास ही नहीं करता बल्कि महल का एक कर्मचारी भी पाँच स्वर्ण मुद्राएँ चुराकर अपने पास रख लेता है। इन मुद्राओं का आरोप भी चरणदास पर भी लगता है। चरणदास महल में बुलाया जाता है। वह पाँच स्वर्ण मुद्राएँ चुराने की बात मान लेता है। बाकी बची पाँच स्वर्ण मुद्रा का रहस्य खुल जाता है और कर्मचारी को सजा हो जाती है। चरणदास के सच बोलने से रानी केलावती प्रभावित होती है। रानी केलावती बनी है स्मिता पाटिल। वे जुलूस भेजकर चरणदास को बुलाती हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोने-चाँदी की थाली में भोजन परोसती हैं, राजा बनाना चाहती हैं और आखिर में शादी का प्रस्ताव रखती है। चरणदास ने तो इन चीजों से दूर रहने का वचन दिया था। इसलिए वह इन प्रस्तावों को ठुकरा देता है। अब रानी गुस्से में आकर चरणदास चोर को मार डालने का हुक्म देती है। सिपानी रानी के हुक्म का पालन करते हैं। मरने के बाद चरणदास चोर यमराज के दरबार में पहुँचता है। उसके पीछे-पीछे बुद्धू धोबी भी रहता है। बुद्धू चित्रगुप्त के बहीखाते से अपने नाम का पन्ना फाड़ देता है और फिर वे वापस भाग निकलते हैं। तो इस तरह वे यमराज से बच &lt;br /&gt;जाते हैं। चोर की जीत पर बहुत खुशी होती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-1536476814430159421?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/1536476814430159421/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/07/blog-post_05.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/1536476814430159421'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/1536476814430159421'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/07/blog-post_05.html' title='चरणदास चोर'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-7423705669721192471</id><published>2009-07-05T05:04:00.000-07:00</published><updated>2009-07-05T05:05:36.808-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जिज्ञासा'/><title type='text'>दीमक लकड़ी कैसे पचा लेती है?</title><content type='html'>पेड़-पौधों में पाया जाने वाला सेलुलोज ही दीमक का भोजन होता है। इसलिए वे तमाम चीजें दीमक का भोजन होती हैं जिनमें सेलुलोज होता है। बहुत सी सूखी लकड़ी पर तुमने दीमक का घर बना देखा होगा। लकड़ियों के बने फर्नीचर, कॉपी-किताबों जैसी बहुत सी चीजों को दीमक चट कर जाती है और फिर वह सामान किसी काम का नहीं रह जाता। दीमक जो सेलुलोज भोजन के रूप में प्राप्त करती है उसे पचा पाने की क्षमता उसमें नहीं होती है। इसे पचाने के लिए दीमक को दूसरे जीव की मदद लेना पड़ती है। &lt;br /&gt;ये दूसरे जीव प्रोटोजोआ कहलाते हैं, जो दीमक की आँतों में रहते हैं। दोनों के बीच सहभागिता का रिश्ता होता है। दीमक लकड़ी को चबाकर निगल जाती है और आँतों में रहने वाले प्रोटॅजोअंस इस लकड़ी की लुगदी को भोजन में बदल देते हैं। इस भोजन से ही दोनों जीव अपना जीवन चलाते हैं। दीमक पर्यावरण में सफाईगार की भूमिका निभाती है पर कई बार यह कीमती सामान को खराब करके नुकसानदायक भी साबित होती है। दीमक समूह में रहती है और भोजन तलाशने में एक-दूसरे की मदद भी करती है। ये चींटियों से मिलती-जुलती लगती हैं। इसलिए इन्हें 'व्हाइट एंट' भी कहा जाता है। आकार के अलावा चींटियों से इनकी कोई समानता नहीं होती।&lt;br /&gt;साभार - वेबदुनिया.कॉम&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-7423705669721192471?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/7423705669721192471/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/07/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/7423705669721192471'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/7423705669721192471'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='दीमक लकड़ी कैसे पचा लेती है?'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-6217689554941317758</id><published>2009-06-26T08:00:00.001-07:00</published><updated>2009-06-26T08:00:43.562-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रेरणा स्रोत'/><title type='text'>विल्मा रूडोल्फ : दृढ़निश्चय से विजय</title><content type='html'>घटना है वर्ष 1960 की। स्थान था योरप का भव्य ऐतिहासिक नगर तथा इटली की राजधानी रोम। सारे विश्व की निगाहें 25 अगस्त से 11 सितंबर तक होने वाले ओलिंपिक खेलों पर टिकी हुई थीं। इन्हीं ओलिंपिक खेलों में एक बीस वर्षीय अश्वेत बालिका भी भाग ले रही थी। वह इतनी तेज दौड़ी कि 1960 के ओलिंपिक मुकाबलों में तीन स्वर्ण पदक जीतकर दुनिया की सबसे तेज धाविका बन गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोम ओलिंपिक में 83 देशों के 5346 खिलाड़ियों में इस बीस वर्षीय बालिका का असाधारण पराक्रम देखने के लिए लोग इसलिए उत्सुक नहीं थे कि विल्मा रूडोल्फ नामक यह बालिका अश्वेत थी अपितु यह वह बालिका थी जिसे चार वर्ष की आयु में डबल निमोनिया और काला बुखार होने से पीलिया हो गया था। इस कारण उसे पैरों में ब्रेस पहननी पड़ी। विल्मा रूडोल्फ नाम की यह लड़की ग्यारह वर्ष की उम्र तक चल-फिर भी नहीं सकती थी, लेकिन उसने एक सपना पाल रखा था कि उसे दुनिया की सबसे तेज धाविका बनना है। उस सपने को यथार्थ में बदलते देखने के लिए लोग दीवाने थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉक्टरों के मना करने के बावजूद विल्मा रूडोल्फ ने अपने पैरों की ब्रेस उतार फेंकी और स्वयं को मानसिक रूप से तैयार कर अभ्यास में जुट गई। उसने अपने सपने को मन में प्रगाढ़ किए हुए वह निरंतर अभ्यास करती रही। उसने अपने आत्मविश्वास को इतना ऊँचा कर लिया कि असंभव सी बात पूरी कर दिखलाई। एक साथ तीन स्वर्ण पदक हासिल कर दिखाए। सच यदि व्यक्ति में पूर्ण आत्मविश्वास है तो शारीरिक विकलांगता भी उसकी राह में बाधा नहीं बन सकती।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-6217689554941317758?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/6217689554941317758/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_249.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/6217689554941317758'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/6217689554941317758'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_249.html' title='विल्मा रूडोल्फ : दृढ़निश्चय से विजय'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-4909807414196705640</id><published>2009-06-26T07:52:00.000-07:00</published><updated>2009-06-26T07:59:03.017-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रेरणा स्रोत'/><title type='text'>शौर्य गाथा : लान्सनायक कर्मसिंह</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बार बार शिकस्त&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;शिव कुमार गोयल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;13 अक्टूबर, 1948 को पाकिस्तानी हमलावरों ने कबाइलियों के रूप में, कश्मीर के तिथवाल क्षेत्र पर अचानक भीषण हमला बोल दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तिथवाल क्षेत्र की अंतिम चौकी पर सिख रेजिमेंट के लान्सनायक कर्मसिंह अपने बहादुर जवानों के साथ सजग प्रहरी के रूप में तैयार थे। भारतीय जवानों ने हमलावरों को फुर्ती के साथ ऐसी मार दी‍ कि वे सिर पर पैर रखकर भाग खड़े हुए। सिख जवानों ने 'सत् श्री अकाल' के गगनभेदी उद्‍घोषों के साथ दुश्मन का काफी दूर तक पीछा करके उसे तिथवाल क्षेत्र से दूर धकेल दिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाक हमलावरों ने एक के बाद एक अनेक हमले तिथवाल की अंतिम चौकी पर किए किंतु लान्सनायक कर्मसिंह उनके बहादुर सिख जवानों के शौर्य के सम्मुख पराजित हो गए तो उन्होंने भारतीय जवानों पर बमवर्षा भी की। किंतु भयंकर बम भी भारतीय रणबाँकुरों की अंतिम रक्षा-पंक्ति को हटा न सके। भारतीय जवान फौलाद की तरह चौकी के आगे डटे रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुश्मन ने चौथी बार तिथवाल पर हमला किया तो वीर लान्सनायक कर्मसिंह ने अपने बहादुर सिख जवानों को प्रोत्साहित करते हुए कहा - 'गुरु गोविंद सिंह के बहादुरों! आज दुश्मन ने क्रूर कबाइलियों से, महाराजा रणजीत सिंह के पवित्र कश्मीर पर हमला करवाकर हमारे स्वाभिमान को खुली चुनौती दी है। हमें पाकिस्तानी दरिंदों के हमले का वीरतापूर्वक जवाब देकर अपना पानी दिखाना है। दुश्मन इस बार बच न पाए। मोर्चे सँभालकर तैयार हो जाओ।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिख जवानों ने एक साथ 'सत् श्री अकाल' का गगनभेदी उद्‍घोष किया व दुश्मन पर गोलियाँ बरसाते हुए बिल्कुल निकट पहुँच गए। आमने सामने पहुँचने पर हथगोले का प्रयोग प्रारंभ हो गया। वीर लान्सनायक कर्मसिंह ने हथगोलों से अनेक पाक लुटेरों को धराशायी कर दिया। भारतीय रणबाँकुरों का शौर्य देखकर पाक लुटेरे इस बार भी पीछे हट गए, किंतु वीर कर्मसिंह दुश्मन के हथगोले से घायल हो गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाक हमलावरों ने पीछे से और भी अधिक कुमुक इकट्‍ठी करके पाँचवी, छठी और सातवीं बार तिथवाल पर आक्रमण किया। घायल लान्सनायक वीर कर्मसिंह ने हर बार अपने मुट्‍ठी भर जवानों के साथ डटकर लोहा लिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लड़ाई का मैदान हर बार लुटेरों की लाशों से पट गया। 'सत् श्री अकाल' व 'भारत माता की जय' के उद्‍घोषों से आकाश गूँजता रहा। किंतु आठवीं बार दुश्मन ने और भी अधिक तेजी के साथ‍ तिथवाल पर हमला किया। वीर लान्सनायक कर्मसिंह घायल अवस्था में ही अपने मोर्चे पर डटे हुए दुश्मन पर गोलियाँ दागकर अपने बहादुर जवानों को प्रोत्साहन देते रहे। उन्होंने देखते ही देखते अनेक दुश्मनों को गोलियों से भून डाला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साभार : देवपुत्र&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-4909807414196705640?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/4909807414196705640/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_528.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/4909807414196705640'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/4909807414196705640'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_528.html' title='शौर्य गाथा : लान्सनायक कर्मसिंह'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-3231529142412005057</id><published>2009-06-26T07:51:00.001-07:00</published><updated>2009-06-26T07:51:41.544-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जिज्ञासा'/><title type='text'>रवींद्र सेतू यानी हावड़ा ब्रिज!</title><content type='html'>हावड़ा और कोलकाता को जोड़ने वाला हावड़ा ब्रिज जब बनकर तैयार हुआ था तो इसका नाम था न्यू हावड़ा ब्रिज। 14 जून 1965 को गुरु रवींद्रनाथ टैगोर के नाम पर इसका नाम रवींद्र सेतू कर दिया गया पर प्रचलित नाम फिर भी हावड़ा ब्रिज ही रहा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हुगली नदी पर बना यह पुल हावड़ा और कोलकाता को आपस में जोड़ता है। इसके पहले हुगली नदी पर तैरता पुल था। पर नदी में पानी बढ़ जाने पर इस पुल पर जाम लग जाता था। 1933 में इसकी जगह बड़ा ब्रिज बनाने का निर्णय हुआ। 1937 से नया पुल बनना शुरू हुआ। इस ब्रिज को बनाने का काम जिस ब्रिटिश कंपनी को सौंपा गया उससे यह जरूर कहा गया था ‍&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-3231529142412005057?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/3231529142412005057/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_491.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/3231529142412005057'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/3231529142412005057'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_491.html' title='रवींद्र सेतू यानी हावड़ा ब्रिज!'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-7510221264455104751</id><published>2009-06-26T07:18:00.000-07:00</published><updated>2009-06-26T07:20:40.318-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पहेली'/><title type='text'>पहेलियाँ ही पहेलियाँ</title><content type='html'>बृजमोहन गोस्वामी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1. तुम न बुलाओ मैं आ जाऊँगी,&lt;br /&gt;न भाड़ा न किराया दूँगी,&lt;br /&gt;घर के हर कमरे में रहूँगी,&lt;br /&gt;पकड़ न मुझको तुम पाओगे,&lt;br /&gt;मेरे बिन तुम न रह पाओगे,&lt;br /&gt;बताओ मैं कौन हूँ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2. गर्मी में तुम मुझको खाते,&lt;br /&gt;मुझको पीना हरदम चाहते,&lt;br /&gt;मुझसे प्यार बहुत करते हो,&lt;br /&gt;पर भाप बनूँ तो डरते भी हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3. मुझमें भार सदा ही रहता,&lt;br /&gt;जगह घेरना मुझको आता,&lt;br /&gt;हर वस्तु से गहरा रिश्ता, &lt;br /&gt;हर जगह मैं पाया जाता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;4. ऊपर से नीचे बहता हूँ,&lt;br /&gt;हर बर्तन को अपनाता हूँ, &lt;br /&gt;देखो मुझको गिरा न देना &lt;br /&gt;वरना कठिन हो जाएगा भरना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;5. लोहा खींचू ऐसी ताकत है,&lt;br /&gt;पर रबड़ मुझे हराता है,&lt;br /&gt;खोई सूई मैं पा लेता हूँ,&lt;br /&gt;मेरा खेल निराला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तर : 1. हवा 2. पानी 3. गैस 4.द्रव्य 5. चुंबक 6. काँच&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-7510221264455104751?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/7510221264455104751/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_26.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/7510221264455104751'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/7510221264455104751'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_26.html' title='पहेलियाँ ही पहेलियाँ'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-5784725756784602873</id><published>2009-06-16T06:23:00.000-07:00</published><updated>2009-06-16T06:24:34.122-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जिज्ञासा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सेहत'/><title type='text'>नारियल पानी का नहीं कोई सानी</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://hindi.webdunia.com/miscellaneous/woman/healthbeauty/0906/16/images/img1090616038_1_1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 150px; height: 150px;" src="http://hindi.webdunia.com/miscellaneous/woman/healthbeauty/0906/16/images/img1090616038_1_1.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;यदि आपसे पूछा जाए कि नारियल किस-किस काम आता है तो आपका पहला जवाब होगा पूजा में श्रीफल के रूप में। हिन्दी फिल्मों में तो नारियल पानी हीरो-हीरोइन के बीच रोमांस दर्शाने का भी एक माध्यम है। हीरो-हीरोइन अक्सर सिर भिड़ाकर एक ही नारियल से पानी पीते नजर आते हैं। पर इस नारियल की कहानी सिर्फ इतनी-सी नहीं है। यह एक अत्यंत गुणकारी फल है, जो कई शारीरिक समस्याओं से निजात दिलाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1. अगर आप लंबे सफर पर हैं और जोर से प्यास लग रही हो तो थोड़ा सा रुकिए और नारियल पानी पीजिए। फिर देखिए आप कैसे एनर्जी से भर जाते हैं और आपकी प्यास भी बुझ जाती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2. यह प्यास बुझाने के साथ-साथ सेहत का भी ख्याल रखता है। नारियल का पानी एक कुदरती पेय है। इसकी तासीर ठंडी होती है, जिससे शरीर भी ठंडा रहता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3. मानव रक्त में इलेक्ट्रोलाइट का जो स्तर पाया जाता है, वही स्तर इसमें भी मौजूद होता है। अतः यह इलेक्ट्रोलाइट बैलेंस बनाए रखता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;4. यह पौष्टिक तत्वों जैसे पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, सोडियम और विटामिन ए, बी व सी से भरपूर है जो शरीर के विकास में अत्यंत उपयोगी हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;5. नारियल पानी सायटोकिनिन्स नामक तत्व का प्रमुख स्रोत है, जो कैंसर से लड़ने में बहुत उपयोगी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;6. यह मूत्राशय व किडनी से संबंधित रोगों के लिए एक कारगर औषधि है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;7. नारियल पानी एक स्पोर्ट्‌स ड्रिंक का भी कार्य करता है और इस बात को संयुक्त राष्ट्र के कृषि एवं खाद्य संगठन ने भी प्रमाणित किया है। आजकल लोग भी इसके गुणों को जानने लगे हैं तथा इसका लाभ भी लेने लगे हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-5784725756784602873?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/5784725756784602873/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_8637.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/5784725756784602873'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/5784725756784602873'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_8637.html' title='नारियल पानी का नहीं कोई सानी'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-8102103367667984288</id><published>2009-06-16T06:21:00.000-07:00</published><updated>2009-06-16T06:22:50.040-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>पढ़ाई चालीसा</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;दिलीप भाटिया&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;बेटा पढ़। आगे पढ़। बेटी तू भी पढ़। सुंदर भविष्य गढ़।।&lt;br /&gt;समय है मूल्यवान। अच्छे कामों पर दे ध्यान।।&lt;br /&gt;बना टाइम टेबिल। पढ़ लिखकर बन काबिल।।&lt;br /&gt;प्रतिदिन स्कूल जा। घर से होमवर्क करके ला।।&lt;br /&gt;जिस कक्षा में है उतने घंटे पढ़। हर विषय को ध्यान देकर पढ़।&lt;br /&gt;गणित की एक प्रश्नावली प्रतिदिन कर। अँग्रेजी के दस नए शब्द प्रतिदिन याद कर।।&lt;br /&gt;रट मत। ध्यान से समझ।।&lt;br /&gt;लिखकर नोट्‍स बना। परीक्षा के दिन दोहरा।।&lt;br /&gt;रात को जल्दी सो जा। पढ़ने को सुबह जल्दी उठ जा।।&lt;br /&gt;मॉडल पेपर घर पर कर। रिहर्सल प्रेक्टिस अवश्य कर।।&lt;br /&gt;जितना पूछा है उतना ही लिख। अच्छा स्पष्ट सुलेख लिख।।&lt;br /&gt;शब्दों की सीमा याद रख। समय सीमा का ध्यान रख।।&lt;br /&gt;अपनी गलती चेक कर। केलकुलेशन स्पेलिंग ठीक कर।।&lt;br /&gt;ध्यान देकर प्रश्न पढ़। सही सही उत्तर लिख।।&lt;br /&gt;आधा खाली की सोच भूल। आधा भरा सफलता का मूल।।&lt;br /&gt;चरित्र निर्मल रख। स्वास्थ्‍य ठीक रख।।&lt;br /&gt;बड़ों का कहना मान। बन एक अच्छा इंसान।।&lt;br /&gt;अच्‍छे नंबरों से होगा पास। सकारात्मक सोच होगी अगर साथ।।&lt;br /&gt;मन लगाकर कर पढ़ाई। दिलीप अंकल खिलाएँगे मिठाई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(गुरुजी महाराज कृष्ण जैन को सादर श्रद्धांजलि)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साभार : शुभ तारिका&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-8102103367667984288?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/8102103367667984288/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_9556.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/8102103367667984288'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/8102103367667984288'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_9556.html' title='पढ़ाई चालीसा'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-7678581965467322713</id><published>2009-06-16T05:56:00.000-07:00</published><updated>2009-06-16T05:58:03.994-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सेहत'/><title type='text'>रक्तदान की महत्ता समझनी होगी</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://hindi.webdunia.com/miscellaneous/health/healthnews/0906/14/images/img1090614034_1_1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 150px; height: 150px;" src="http://hindi.webdunia.com/miscellaneous/health/healthnews/0906/14/images/img1090614034_1_1.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;भारत में सालाना एक करोड़ यूनिट रक्त जरूरी&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;आनंद सौरभ&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के तहत भारत में सालाना एक करोड़ यूनिट रक्त की जरूरत है लेकिन उपलब्ध 75 लाख यूनिट ही हो पाता है। यानी करीब 25 लाख यूनिट खून के अभाव में हर साल सैंकड़ों मरीज दम तोड़ देते हैं। खून के एक यूनिट से तीन लोगों की जान बचाई जा सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विश्व रक्तदान दिवस समाज में रक्तदान को लेकर व्याप्त भ्रांति को दूर करने का और रक्तदान को प्रोत्साहित करने का काम करता है। भारतीय रेडक्रास के राष्ट्रीय मुख्यालय के ब्लड बैंक की निदेशक डॉ. वनश्री सिंह के अनुसार देश में रक्तदान को लेकर भ्रांतियाँ कम हुई हैं पर अब भी काफी कुछ किया जाना बाकी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने बताया कि भारत में केवल 59 फीसद रक्तदान स्वेच्छिक होता है। जबकि राजधानी दिल्ली में तो स्वैच्छिक रक्तदान केवल 32 फीसद है। दिल्ली में 53 ब्लड बैंक हैं पर फिर भी एक लाख यूनिट खून की कमी है। डॉ. सिंह ने कहा कि इस तथ्य से कम ही लोग परिचित हैं कि खून के एक यूनिट से तीन जीवन बचाए जा सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रेडक्रास में रक्त देने आए दिल्ली के सरस्वती विहार के पंकज शर्मा पिछले कई सालों से स्वेच्छा से यह काम करते आ रहे है। उनका कहना है कि लोगों को रक्तदान की महत्ता समझनी होगी। यह महादान है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोनीपत हरियाणा के गबरुद्दीन 163 बार खून दे चुके हैं। भाषा को उन्होंने फोन पर बताया कि उनके जीवन का ध्येय रक्त देकर लोगों की सहायता करना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉ.वनश्री कहती हैं कि रेडक्रास में 85 फीसद रक्तदान स्वैच्छिक होता है और इसे 95 फीसद तक करने की कार्ययोजना है। सरकार और विभिन्न संगठनों को ब्लड कैंप और मोबाइल कैंप लगा कर लोगों को रक्तदान के लिए प्रेरित करना चाहिए। लोगों को बताना होगा कि रक्तदान का कोई भी दुष्प्रभाव नहीं बल्कि यह आपको लोगों की जान बचाने वाला सुपरहीरो बनाता है।&lt;br /&gt;सौजन्य से - भाषा&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-7678581965467322713?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/7678581965467322713/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_7028.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/7678581965467322713'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/7678581965467322713'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_7028.html' title='रक्तदान की महत्ता समझनी होगी'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-8088675786571216980</id><published>2009-06-16T05:37:00.001-07:00</published><updated>2009-06-16T05:38:37.343-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>अम्मा से वह आख़िरी मुलाक़ात</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2006/09/20060922104306bigad416.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 416px; height: 225px;" src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2006/09/20060922104306bigad416.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अम्मा से वह आख़िरी मुलाक़ात&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;सुपरिचित कथाकार मंज़ूर एहतेशाम इन दिनों अपने नए उपन्यास की रचना में लगे हुए हैं. प्रस्तुत है इस उपन्यास ‘बिगाड़’ का एक अंश....&lt;br /&gt;बात बिगड़नी तो शायद काफ़ी पहले, जब उसने जायदाद में अपने हक़ का यूँ ही सरसरी तौर पर ज़िक्र किया था, शुरू हो गई थी लेकिन उसकी संजीदगी का शुरू में खुद उसे अंदाज़ा नहीं हुआ था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले कुछ साल उसके लिए ऐसे बीते थे जिनमें अनेक रहस्य-रूपी मामलों पर से पर्दा उठा था और कई ऐसी बातें जिन्हें वह अपने बचपन से जोड़कर लाख समझने की कोशिश के बाद भी नहीं समझ पाता था, साफ़ होती गई थीं. यह कि वह यतीम था और जिन्हें इतने लंबे अर्से तक अपना पिता समझता रहा था, अम्मा के दूसरे शौहर और खुद उसके सौतेले बाप थे, और उसी हिसाब से बाक़ी पाँचों छोटी बहनें, उसकी सौतेली बहनें. और यह भी कि सौतेले बाप की जायदाद में उसका कोई हिस्सा नहीं बनता था. फिर एक के बाद दूसरी, कई ऐसी बातें जिनको जानना न सिर्फ़ अम्मा के प्रति उसकी सोच को गड़बड़ाता था, बल्कि अभी तक जो-जो हो चुका था उसे अजीब तरह से हास्यस्पद बनाता था. अगर यही था तो सात साल पहले जब उसकी गृहस्थी भोपाल में जम चुकी थी, अम्मा ने उसे और मरियम को बंबई वापस आने पर क्यों मजबूर किया?! जवाब एक ही हो सकता था-अपनी ख़ुदगर्ज़ी की वजह से! वहाँ बंबई में अब्बा की जायदाद के उलझे मामलों को सुलझाने के लिए कोई भरौसेमंद भाग¬-दौड़ करने वाला नहीं था. अब्बा की पहली शादियों से, एक नहीं, दर्जन-भर औलादें थीं, लेकिन सब निकम्मी भी, और अब्बा-अम्मा, ख़ास तौर पर अम्मा की दुश्मन भी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; आज की दुनिया में अव्वल तो आदर्श-नामी तोता पालता कौन है, या पालता है तो उसकी परवरिश गिद्ध की तरह करता है, दूसरे लोगों को नोचने-खसूटने के वास्ते इस्तेमाल करने को. ज़िंदा चीज़ें अपनी उम्र गुज़ार सकने के लिए आबो-हवा और फ़िज़ा की मुहताज होती हैं, वह तोते हों, गिद्ध या इंसान! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;दरअसल, उन सात खातों के दौरान ही ज़्यादातर राज़ों पर से पर्दे उठे थे. उस बीच, खुद उसकी कोशिशों से बंबई में ज़्यादातर जायदाद के उलझे मामले भी सुलझ चुके थे, और उसके अपने लिए कुछ माँगने पर अम्मा के इनकार के बाद, जो कोशिश उसने खुद पाँवों पर खड़े होने की की थी, न सिर्फ़ यह कि बुरी तरह नाकाम हो गई थी, बल्कि मामला जिस तरह खुलकर सामने आया था उससे अम्मा को यक़ीन हो गया था कि वह अब्बा की जायदाद में अमल-दख़ल करके, ग़ैर-क़ानूनी तौर पर बंधा-पैसा कमाना चाहता है! उसने ग़ैर-ज़रूरी सफ़ाई देने की ज़रूरत नहीं समझी थी और एक बार फिर, मरियम और बिटिया के साथ उसी शहर भोपाल का रूख़ किया था जो बीते समय में एक बार उनकी पनाहगाह रह चुका था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज की दुनिया में अव्वल तो आदर्श-नामी तोता पालता कौन है, या पालता है तो उसकी परवरिश गिद्ध की तरह करता है, दूसरे लोगों को नोचने-खसूटने के वास्ते इस्तेमाल करने को. ज़िंदा चीज़ें अपनी उम्र गुज़ार सकने के लिए आबो-हवा और फ़िज़ा की मुहताज होती हैं, वह तोते हों, गिद्ध या इंसान! कभी कोई बेईमानी करते हुए नीयत थोड़ी करता है कि मैं अब फ़लां-फ़लां काम बेईमानी का करने जाता हूँ. बेईमानी भी हो जाती है, ईमानदारी की तरह और जो हो जाए उसके पक्ष में दलीलें पेश करना, कौन-सा मुश्किल काम है! बेईमानी भी हो जाती है, ईमानदारी की तरह, और जो हो जाए उसके पक्ष में दलीलें पेश करना, कौन-सा मुश्किल काम है! लगता है, आज ऐसा हो गया है, लेकिन यक़ीनन दुनिया-बनने के साथ ही ऐसा रहा होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल-जवाब का जोखिम भी किसी के साथ इस तकल्लुफ़ को बरतते ही उठाया जा सकता है कि कहीं हम आपसी लक्ष्मण-रेखा का उल्लंघन तो नहीं कर रहे! तो भी, सारे दुनियादारी के तक़ाजे जे़हन में रखने की कोशिश के बावजूद ऐसा हो जाता है (जिसके करने की बेपनाह ख़्वाहिश दिल में होने के बावजूद) जो हम करना नहीं चाहते!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;भोपाल लौटने के कुछ वक़्त बाद, अपना काम शुरू कर सकने के सहारे खोजता, जब वह एक बार फिर वापस बंबई गया था, तो ऐसा ही कुछ अम्मा और उसके बीच हो गया था, जिसके नतीजे उसे अम्मा का वह रौद्र-रूप देखने को मिला था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-अरे जा, जा! अम्मा ने गुस्से की लौ पकड़ती आवाज़ में उसे ललकारा था. –तेरी हैसियत मेरे लिए कपड़े की उस चिन्दी से ज़्यादा नहीं जो महीने पर औरत बांधती है? तुझ जैसे कितने कीड़े मेरे जिस्म से गंदगी बनके बह गए, बेग़ैरत! तू बात किस से कर रहा है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पल भर को उसे चक्कर आ गया था. आँखों के सामने अंधेरा और कानों में झाईयाँ बजने लगी थीं. सारी कड़वाहट और बिगाड़ के बावजूद उसने कल्पना नहीं की थी कि अम्मा उससे कभी इस मुहावरें में बात कर सकती थीं या कभी उसके कान उनकी आवाज़ में यह सुन सकते थे. तब तक हो रही बातचीत, जिसमें खुद उसके तेवर हमले के थे, या हमलावराना ढंग से जिसकी शुरुआत हुई थी, एकदम ग़ायब- उसका दिमाग़ बिल्कुल ख़ाली हो गया था. उस पल अगर उसने क़रीबी दीवार का सहारा न लिया होता तो शायद ग़श खा कर गिर जाता. और फिर, बिल्कुल अनजाने और अनचाहे, उसकी आँखों से आंसुओं की मोटी धारें बह निकली थीं. यह, कि खुद उसके अंदर आंख से बह निकल सकने वाले माद्दे की इतनी मिक़दार मौजूद थी, उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था, क्योंकि खुद अपनी याद में वह शायद ही कभी रोया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; जाने कितना वक्फ़ा रहा होगा, अम्मा का आख़री जुमला सुनने के बाद उसके होशों-हवास वापस लौटने में, लेकिन जब ऐसा हुआ था तो उसने पाया था उस दौरान एक पल को भी अम्मा चुप नहीं हुई थीं, और लगातार उसी कैफ़ियत में बोले चली जा रही थीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज़िंदगी के उलझावे हों या मौत के सदमे, उस पर इस तरह असरअंदाज़ नहीं हो पाए थे कि अपने अंदरूनी समंदर का उसे एहसास हो पाता. और पता नहीं वह रोना ही था या उसे अलग से कोई नाम दिया जाना चाहिए, क्योंकि आंख़ें ज़ारो-क़तार बहती रही थीं लेकिन हलक़ से कोई भी आवाज़ नहीं निकली थीं. बल्कि शायद पूरे वक़्त उसके चेहरे पर मुस्कुराहट सी खेलती रहीं थी! अच्छा हुआ उस वक़्त वहाँ दूसरा कोई नहीं था, वरना क्या तमाशा बनता उसका! एक छह-फीटा, लहीम-शहीम आदमी, सर-मूंछ-सब सफ़ेद, जितना-जितना मुस्कुरा रहा था, आंखों से उतने ही ज़्यादा आंसू बह रहे थे! ‘स्माइल मसल्स’ और ‘हेयर डक्टस’ का आपस में ऐसा मसख़रा शॉर्ट-सर्किट शायद ही कभी देखने में आता हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाने कितना वक्फ़ा रहा होगा, अम्मा का आख़री जुमला सुनने के बाद उसके होशों-हवास वापस लौटने में, लेकिन जब ऐसा हुआ था तो उसने पाया था उस दौरान एक पल को भी अम्मा चुप नहीं हुई थीं, और लगातार उसी कैफ़ियत में बोले चली जा रही थीं. वह पल उसकी शिकस्त का पल था-‘कोई सुलह नहीं! उनकी नाराज़गी और गुस्सा खुद उसके कानों तक सिर्फ़ आवाज़ की ऊँच-नीच की तरह पहुँच रहा था, जिसे शब्दों में समझ पाना या जिसका जुम्लों में मतलब निकाल पाना मुम्किन नहीं था. अपनी आस्तीन की कोर से आँखें खुश्क करते हुए उसने नज़र भर कर उन्हें देखा थाः आँखों में कौंधती दीवानगी, नफ़रत में फड़कती नाक और खुद पर क़ाबू रखने के लिए फ़र्श पर बिछे क़ालीन पर होले-होले उठते क़दम. उन्होंने हरे फूल-बूटे की पैटर्न का स्लीपिंग-गाउन पहन रखा था और नाक में कीमती हीरे की लोंग दमक रही थी. उस अधूरे हवास की कैफ़ियत में भी जो लफ़्ज़ सिमट कर उसकी ज़बान पर आया, वह ‘वाह! ही था! एक बार फिर से वह अम्मा के रौब का क़ायल होने पर मजबूर हो गया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वाह! कुछ पल ठहर कर फिर वही उसने ऊँची आवाज़ में दोहराया था, अम्मा को एकटक देखते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वाह-वाह क्या कर रहा है! वह और भड़क उठी थीं-कोई मुशायरा हो रहा है यहाँ?!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुशायरा तो नहीं, वह बोला तो लगा आवाज़ मनों बोझ में दबी, कमज़ोर और कहीं दूर से आ रही थी-वाह-वाह क्या सिर्फ़ शायरी सुनकर ही की जाती है! आपको मान गए, उसकी दाद दें रहे हैं! हम आपके सामने लगते कहाँ हैं, उसने इस तरह कहा था जैसे उनसे नहीं, खुद अपने-आप से बात कर रहा हो. हर मायने में, हैं आप हमारी अम्मा ही! वार और ऐसा तीखा! बक़ौल शायर-‘तेग़आज़मा का हाथ ही काम से जाता रहा!’ मान गए?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जा रस्साले! उन्होंने हिक़ारत से कहा था-शेर सही याद रख सकने तक की तो तमीज़ नहीं, कि ‘तेग़आज़मा का हाथ ही’ और ‘हाथ ही तेग़आज़मा’ के बीच फ़र्क़ कर सकते! शायरों-अदीबों की दोस्ती का दम भरते हैं! हम से सवाल-जवाब करके तफ़सील और सफ़ाई चाहते हैं, केंचेवे स्साले! वह कौन-सी बदबख़्त घड़ी थी, मेरे मालिक! जो मैंने ऐसे जान के दुश्मनों को जना! और जन दिया था तो गला घौंट कर ख़त्म क्यों नहीं कर दिया! वह कौन-सी ख़ता हुई मुझसे मेरे मालिक! जिसकी सज़ा तू इन मरदूदों को मेरे सिर पे मुसल्लत करके दे रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घड़ी और पल, मेरी पैदाइश के, खूब याद होंगे आपको. उसने इस अंदाज़ में कहा था जैसे अम्मा को जता देना-चाहता हो कि उसे सिर्फ़ एक लड़ाई में मात हुई थी. जंग अभी बाकी थी. जब बेटे ने पैदा होकर आँखें खोली और बाप ने दुनिया को अलविदा कहा! जब मुल्क को फ़िरंगी और आपको कंगाल शौहर से...!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने जुम्ला अधूरी छोड़ दिया था. उसे पूरा करने की ज़रूरत भी नहीं थी. वह उसके दिमाग को खूब अच्छी तरह समझती थीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाँ! उन्होंने गुस्से में पूरी ताक़त से चीख़ते हुए कहा था-डाकू! पैदा होते ही बाप को खा गया!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और किसी आँधी में पत्ते-सी काँपती, कुछ घातक कर गुज़रने से बचने के लिए, वह कमरे से चली गई थीं. ठीक किया वरना उतनी देर में वह शॉक और सदमे से इतना तो उबर ही चुका था कि मासूमियत से पूछता-खा कहाँ गया, आपके लिए आसानी कर दी!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज़ादी दिला दी! वह मरते नहीं तो एक कंगाल की मुहब्बत आपके लिए कितने दिन को क़ाफी होती! कितना साथ निभा पातीं आप उसका या जब तक वह ज़िंदा था, कितना साथ रहीं आप उसके!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह थी उसकी अम्मा से वह आख़िरी मुलाक़ात जिसे यादगार कहा जा सकता था.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-8088675786571216980?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/8088675786571216980/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_7008.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/8088675786571216980'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/8088675786571216980'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_7008.html' title='अम्मा से वह आख़िरी मुलाक़ात'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-8678692191830500251</id><published>2009-06-16T05:21:00.000-07:00</published><updated>2009-06-16T05:26:55.103-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>चश्मा -   हिमांशु जोशी</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2007/01/20070105100654kahani_joshi416.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 416px; height: 225px;" src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2007/01/20070105100654kahani_joshi416.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने अभी घर की देहरी पर पाँव रखा ही था कि शाश्वत ने धनी की तरफ, शिकायत से देखते हुए कहा, ‘कह दूँ, दादाजी से...’ रहस्यमय ढंग से वह धनी की ओर देखता रहा, देर तक!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धनी अचकचाया. शायद इस अप्रत्याशित आक्रमण के लिए तैयार नहीं था. बोला कुछ भी नहीं पर उसके मन का दबा हुआ आक्रोश रह-रहकर आँखों की राह झाँक रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बर्फ़ की फ़ुहारों से भीगा मफ़लर, दस्ताने दरवाज़े के पास रखे स्टैंड पर रखता हूँ. फिर चमड़े का लंबा कोट भी जतन से! जिसमें से पिघलती बर्फ़ का पानी बूँद-बूँद निथर रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पॉलिथिन के बैग में लिपटी पुस्तकें मेज़ पर रख देता हूँ और फिर दीवार पर टँगी घड़ी पर मेरी निगाहें अटक आती हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘किसी का फ़ोन तो नहीं आया?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘आया था. धनी ने उठाया और ‘दादा जी अभी नहीं हैं,’’ कहते हुए खट् से रख दिया था.’’ शाश्वत के स्वर में कहीं शिकायत का सा भाव था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘और किसी का नहीं? मैंने जिज्ञासा से फिर पूछा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘आए तो थे-तीन-चार. पर धनी ने पूरी बात सुने बिना ही काट दिए थे...’’ इस बार श्रीमती जी का स्वर था. वह पानी का गिलास मेज़ पर रख कर फिर तेज़ कदमों से रसोईघर की तरफ चली गईं. जहाँ चूल्हे पर किसी वस्तु के जलने के कारण दुर्गंध सी फैल रही थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘अरे, यह तो पूछ लेते कि था किसका?’ मेरे स्वर में तनिक तल्खी थी. ‘कई लोगों से कई तरह के काम होते हैं! व्यर्थ में थोड़े ही कोई यों ही फ़ोन करता है?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘ये बच्चे सुनें, तब न! धनी तो फ़ोन की घंटी बजते ही, आँखें मूंद कर भागने लगता है, रिसीवर उठाने के लिए...’’ श्रीमती जी किचन से ही, आवाज़ लगाती हुई कहती हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं कुर्सी पर धम्म से बैठ जाता हूँ. तौलिए से हाथ-मुँह पोंछता हुआ कहता हूँ, ‘‘कल विकल्प कह रहा था तीन-चार बार फ़ोन किए, पर बात हो न पाई. निहाल भाई घर आने का कार्यक्रम बना रहे थे, पर संपर्क ही न हो सका...!’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिन भर की भाग-दौड़ से थका, यों ही पाँव लम्बे कर लेता हूँ. आँखे मूँदे कुर्सी पर ही लेट सा जाता हूँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तभी अहसास होता है, जैसे मेरे हाथों में, किसी के, नन्हें से कोमल गरम हाथों का स्पर्श सा हुआ.&lt;br /&gt;सहसा मेरी आँखें खुलती हैं. शाश्वत कुर्सी के हत्थे के सहारे खड़ा है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘कौन शाशा?’ मैं चौंक कर कहता हूँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाश्वत अभी भी चुप था. कुछ क्षण सन्नाटा रहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तभी शाश्वत ने मौन भंग करते हुए कहा, ‘दादा जी, यह धनी बहुत शैतानी करता है. आपकी लिखने वाली मेज पर, शॉल ओढ़कर, आपकी तरह बैठता है. आपकी तरह, पेन पकड़ कर, आपकी तरह कुछ लिखने-सा लगता है. मैं कुछ कहूँ, उससे पहले ही, ग़ुस्से से देखता हुआ कहता है, ‘‘देखते नहीं, अब मैं हिमांशु जोशी हो गया हूँ-दादाजी हूँ...! शोरगुल कतई नहीं!’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘इस पर दादी और मम्मी हँसती हैं तो वह और अकड़ कर कहता है,‘‘मैं दादा जी से भी अच्छी कहानियाँ लिख सकता हूँ...’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘अरे, तुम्हें तो अभी कलम पकड़ना भी नहीं आता’’ कहता हूँ तो वह मारने के लिए दौड़ता है...!’’&lt;br /&gt;मैं खिड़की के शीशे के उस पार, चिड़ियों को बरामदे की रैलिंग पर बैठ कर बतियाती हुई देखता हूँ. आश्चर्य होता है, ये गौरय्या भारत के हर भागों में ही नहीं, इधर नॉर्वे जैसे बर्फीले इलाकों में भी होती हैं.&lt;br /&gt;मेरा ध्यान बच्चों की बातों में कम और इधर-उधर की बातों में अधिक भटक रहा है. कल सेमिनार में भाग लेने, विश्वविद्यालय जाना है. ‘पत्रिका’ के लिए संपादकीय लिख कर, फैक्स से भारत भेजना है. भौमिक परसों डेनमार्क चला जाएगा, उससे मिलना है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पता नहीं क्यों, इस बार नॉर्वे आने पर बहुत कुछ बदला-बदला सा लगता है. स्वयं अपने पर भी कुछ कम बदलाव नहीं! पहले शरीर पर समय का असर कम प्रतीत होता था, पर अब कुछ अधिक लगने लगा है!&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;ओस्लो हवाई अड्डे की नव निर्मित मुख्य इमारत से बाहर कार पार्किंग तक की कुछ दूरी खुले में पार करनी होती है. चारों ओर बर्फ़ की सफेद चादर सी बिछी थी. बर्फ़ भी ताजी नहीं, जमकर ठोस शीशे की तरह कठोर! बर्फ़ पर चलने का अभ्यास न होने के कारण, अभी चार-छह कदम ही आगे बढ़ पाया कि पता नहीं कैसे पाँव लड़खड़ाए, संतुलन बिगड़ा, और मैं बर्फ़ पर चारों खाने चित्त!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़ी मुश्किल से उठाया और कार तक पहुँचाया. गाड़ी में बैठकर, साँस में साँस आई. चोट तो नहीं लगी थी, पर लगता था, ठंड के कारण घुटनों का दर्द कुछ बढ़ सा गया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी कार मुख्य मार्ग तक पहुँच भी न पाई थी कि मेरा ध्यान चश्मे की ओर गया. उसके बाईं तरफ का शीशा नदारत था. संभवतः वहीं कहीं गिर गया हो, जहाँ मेरे पाँव रपटा था. मैंने चश्मे को वैसे ही पहन लिया, कम से कम कुछ तो दिखेगा!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘कल बाज़ार से बनवा लेंगे...’’ शशिर ने कहा,‘‘हाथों हाथ मिल जाएगा...’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे दिन ‘स्टूटिंग’ होते हुए बाज़ार पहुँचे. चश्मे की एक भव्य दुकान पर. डॉक्टर ने अनेक बार, अनेक तरह के यंत्रों से आँखों को उलट-पटल कर देखा. सारे टेस्ट करने के पश्चात, अंत में जोड़-घटाने के बाद कहा,‘‘करीब छह हज़ार क्रोनर लगेंगे...’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘छह हज़ार क्रोनर! यानी 36 हज़ार रुपए से भी अधिक!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘कुछ और दुकानें भी हैं! वहाँ भी पूछ लेते हैं...’’ शिशिर ने सुझाव दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम बाहर आते हैं. ‘सीटी सेंटर’ की मार्केट टटोलते हैं. वहाँ भी स्थिति लगभग वैसी ही है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाम को हम बैठे थे. दूरदर्शन पर कोई कार्यक्रम था. शिशिर बार-बार मेरी ओर देख रहा था. उसे लगा कि शायद मुझे देखने में कठिनाई हो रही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘बाबू जी, कल शाम को बोलर जाएंगे. वहाँ मेरे एक टर्किश दोस्त की दुकान है. पैसे की बात न सोचिए. यहाँ ऐसा ही चलता है. रुपयों के हिसाब से जोड़-घटाना करेंगे तो सब मुश्किल हो जाएगा...’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘अरे भई, इत्ती सी बात के लिए क्यों परेशान हो रहे हो? कुछ ही दिनों के लिए यहाँ आया हूँ. भारत पहुँच कर बनवा लूँगा. एक चश्मे पर इतनी राशि खर्च करना मुझे समझदारी नहीं लगती. बिना चश्मे के भी मेरा काम आसानी से चल जाता है. पढ़ने-लिखने के समय, मैं यों भी कभी-कभी चश्मा उतार लेता हूँ. हाँ, बाहर चलते समय कुछ असुविधा अवश्य होती है-कभी, पर ऐसी कोई समस्या नहीं...!’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाम को मैं अपने कमरे में बैठा था. इतने में धनी आया और चुपचाप सामने वाली कुर्सी में बैठ गया.&lt;br /&gt;तभी मुझे कुछ याद आया,‘धनु, शाशा बतला रहा था कि तुमने कहा कि मैं दादा जी से भी अच्छी कहानियाँ लिख सकता हूँ...!’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह इस प्रश्न पर शर्माया नहीं, बल्कि आत्मविश्वास से मेरी ओर देखता रहा. स्वीकृति में उसने मात्र सिर हिला दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘यहाँ छह साल के कम उम्र के बच्चों को तो लिखना-पढ़ना भी नहीं सिखाते. अभी तुम ने पाँच भी पूरे नहीं किए, फिर कैसे लिखते हो...?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘मैं बोल कर कहानी सुना देता हूँ...’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘किस की कहानी सुनाते हो?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘मछली की. चिड़िया की. नदी की. छेर की...’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्षण भर का मौन तोड़ते हुए, जिज्ञासा से कहता हूँ,‘‘अच्छा शेर की सुना दो.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘छेर की...’’इतना कह कर वह चुप हो जाता है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘अच्छा, सुनिए!’’ वह आगे कहता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘एक छेर का बच्चा था! बेबी छेर! एक उसकी मम्मी थी. एक उसके पापा थे. तीनों एक बड़े पत्थर पर बैठे धूप सेंक रहे थे. चारों तरफ बर्फ़ थी. सामने घना जंगल था. कुछ भेड़ें घास चर रही थीं.&lt;br /&gt;तभी एक शैतान लोमड़ी आई. भेड़ों को डॉटने-डराने लगीं. भेड़ें डर के मारे इधर-उधर भागने लगीं.&lt;br /&gt;बेबी छेर दूर से यह सब देख रहा था. उसने वहीं से आवाज़ लगाकर लोमड़ी से कहा, ‘‘इन बच्चों को तंग मत करो!’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोमड़ी ने पलट कर गुस्से से कहा,‘‘तुम चुप रहो! तुम कौन होते हो, मुझे रोकने वाले!’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छेर के बच्चे को गुस्सा आ गया. वह दौड़ता हुआ आया. लोमड़ी को एक चपत लगाता हुआ बोला,‘‘निकल जाओ यहाँ से, नहीं तो मार-मार कर भुर्त्ता बना दूँगा! बच्चों को तंग करते शर्म नहीं आती...’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोमड़ी दुम दबाकर रोती हुई भागी और बेबी छेर फिर अपनी जगह पर लेट कर, धूप सेंकने लगा.&lt;br /&gt;उसकी मम्मी पास ही लेटी यह सब देख रही थी. वह चुपचाप उठी. बच्चे को शाबासी दी. इनाम में उसे पचास क्रोनर का नोट देती हुई बोली,‘‘बहुत अच्छा किया तुमने... ये लो बाज़ार से चॉकलेट खरीद कर खा लो!’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने में छेर के पापा भी उठकर आए. उन्होंने भी उसे पचास क्रोनर चॉकलेट के लिए इनाम में दिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह बाज़ार से ढेर सारी चॉकलेट खरीद कर लाया. उन तीनों ने मिलकर खूब खाई! बस कहानी ख़तम!&lt;br /&gt;‘‘कहानी तो अच्छी है...’’ मैंने कहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सामने वाली आराम कुर्सी पर बैठा शिशिर कुछ काम कर रहा था. शायद उसका ध्यान हमारी बातों पर भी था. वह उठा और पचास क्रोनर का एक नोट लाया. धनी को उसे देता हुआ बोला,‘‘शाबाश! कहानी अच्छी है. यह इनाम लो. शाशा के साथ चॉकलेट खरीद कर खा लेना!’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धनी ने वह नोट मेरी ओर बढ़ाया. मैने देखा-नोट किनारे से थोड़ा सा फटा है. कुछ मैला सा!&lt;br /&gt;अपनी ओर से मैंने पचास क्रोनर और मिलाकर धनी की जेब में डाल दिए!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ अर्से बाद, एक दिन शाश्वत स्कूल से लौटा तो दौड़ता हुआ कमरे में आया. मैं कुछ पढ़ रहा था. आते ही बोला,‘‘दादा जी, धनी ने उस दिन ग़लत कहानी सुनाई और आपने उसे इनाम दे दिया!’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘क्या ग़लत था उसमें? धनी बचाव की मुद्रा में बोला.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘क्लास में आज हमारी मैडम ने बतलाया कि नॉर्वे में तो शेर होते ही नहीं... धनी झूठी कहानी सुना दी और आपने सच मान ली!’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धनी को लगा कि जैसे वह जीती हुई बाजी हारने जा रहा है. वह देर तक कुछ सोचता हुआ बोला,‘‘अरे, जंगल में नहीं होते तो क्या हुआ? कोई फॉरेन से ला भी तो सकता है! क्या दादा जी, दिल्ली के चिड़ियाघर से नहीं ला सकते- अपने साथ हवाई जहाज में! जैसे मोना के पापा आइसलैंड से हवाई जहाज में अपने साथ, सफेद, झवरैला, लाल मुँह वाला कुत्ता ‘पोलर डॉग’ लाए थे?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं बीच-बचाव करता हूँ कि कहानी में कभी-कभी ऐसा भी हो जाता है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तभी एक दिन शाशा ने कहा,‘‘दादा जी, ये धनी आज-कल मन लगाकर नहीं पढ़ता. रोज़ दादी को, मम्मी को ढेर सारी कहानियाँ सुनाता है, चिड़िया की! तितली की! नदी की! बंदर की! फूल की! कहता है,‘‘जब बहुत सारी कहानियाँ हो जाएँगी तो इनाम में इत्ते-इत्ते सारे क्रोनर मिलेंगे.’’ वह दोनों हाथ फैलाता है. ‘‘फिर बाज़ार से दादा जी के लिए हम चश्मा खरीद कर लाएँगे...’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगभग तीन सप्ताह बाद दिल्ली लौट आया. दो-तीन दिन में नया चश्मा भी बना लिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्से बाद एक दिन अपने चमड़े के हैंड बैग की भीतर वाली जेब में कुछ टटोल रहा था तो एक लिफ़ाफ़े में चिड़िया, पहाड़, मछली, पेड़, फूल के टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं से खिंचे बहुत सारे रेखा-चित्र दिखे. और उनके साथ पचास-पचास क्रोनर के दो नोट भी रखे थे, जिनमें से एक का किनारा थोड़ा-सा फटा-फटा सा था-कुछ मैला सा भी!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;****************&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंमाशु जोशी&lt;br /&gt;7/सी-2, हिंदुस्तान टाइम्स अपार्टमेंट्स,&lt;br /&gt;मयूर विहार, फेज-1&lt;br /&gt;दिल्ली-11009&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-8678692191830500251?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/8678692191830500251/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_16.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/8678692191830500251'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/8678692191830500251'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_16.html' title='चश्मा -   हिमांशु जोशी'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-5661127545658144205</id><published>2009-06-15T06:52:00.000-07:00</published><updated>2009-06-15T06:55:30.482-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जिज्ञासा'/><title type='text'>'स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी' फ्रांस ने दी?</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://hindi.webdunia.com/miscellaneous/kidsworld/gk/0906/15/images/img1090615038_1_1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 150px; height: 150px;" src="http://hindi.webdunia.com/miscellaneous/kidsworld/gk/0906/15/images/img1090615038_1_1.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अमेरिकी स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने पर 1876 में फ्रांस की तरफ से स्मारक के तौर पर अमेरिका को स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी भेंट किया गया था। यह स्टेच्यू दोनों देशों की मित्रता का प्रतीक है। 'स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी' इसका प्रचलित नाम हो चुका है जबकि इस स्टेच्यू को जिस तौर पर फ्रांस ने भेंट किया था वह है - 'लिबर्टी इनलाइटिंग द वर्ल्ड'।&lt;br /&gt;यह स्टेच्यू अमेरिका के न्यूयॉर्क हार्बर के लिबर्टी द्वीप पर स्थापित किया गया है। ताम्र पट्‍टिका से बनी यह मूर्ति 46 मीटर ऊँची है। इस मूर्ति की छोटी प्रतिकृति पेरिस में स्थापित है। इस मूर्ति में एक स्त्री को ढीला लबादा ओढ़े हुए दिखाया गया। मूर्ति के बाएँ हाथ में एक पट्‍टिका है और इस पट्‍टिका पर अमेरिकी स्वतंत्रता की तिथि 4 जुलाई 1776 अंकित है। दायाँ हाथ ऊपर की तरफ है और इसमें एक मशाल है। रात के समय इस मशाल को भीतर से प्रकाशमान किया जाता है। रात में यह स्टेच्यू न सिर्फ आकर्षण का केंद्र बन जाता है बल्कि जलयानों और वायुयानों के लिए स्थानीय संकेतक का काम भी करता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-5661127545658144205?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/5661127545658144205/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_615.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/5661127545658144205'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/5661127545658144205'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_615.html' title='&apos;स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी&apos; फ्रांस ने दी?'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-1393035112207934431</id><published>2009-06-15T05:58:00.000-07:00</published><updated>2009-06-15T06:06:43.264-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रेरणा स्रोत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जिज्ञासा'/><title type='text'>आर्यभट्‍ट कौन थे?</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.indicstudies.us/Astronomy/aryabhatta.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 252px; height: 343px;" src="http://www.indicstudies.us/Astronomy/aryabhatta.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;भारत के प्रथम कृत्रिम उपग्रह का नाम आर्यभट्‍ट रखा गया था। यह नाम हमारे देश के एक प्रसिद्ध खगोलशास्त्री और गणितज्ञ के नाम पर रखा गया था। 360 किलो का यह उपग्रह अप्रैल 1975 में छोड़ा गया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  &lt;blockquote&gt;आर्यभट्‍ट ने पाई का काफी सही मान 3.1416 निकाला। उन्होंने त्रिकोणमिति में व्यूत्क्रम साइन फंक्शन के विषय में बताया। उन्होंने यह भी दिखाया कि खगोलीय पिंडों का आभासी घूर्णन पृथ्‍वी के अक्षीय पूर्णन के कारण होता है।      &lt;br /&gt;आर्यभट्‍ट का जन्म सन् 476 में भारत के कुसुमपुरा (पाटलिपुत्र) नामक स्थान में हुआ था। आर्यभट्‍ट प्राचीन भारत के प्रसिद्ध खगोलशास्त्री और गणितज्ञ थे। उनके कार्य आज भी विद्वानों को प्रेरणा देते हैं। वह उन पहले व्यक्तियों में से थे जिन्होंने बीजगणित (एलजेबरा) का प्रयोग किया। &lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने 'आर्यभटिया' नामक गणित की पुस्तक को कविता के रूप में लिखा। यह उस समय की बहुचर्चित पुस्तक है। इस पुस्तक का अधिकतम कार्य खगोलशास्त्र और गोलीय त्रिकोणमिति से संबंध रखता है। इस पुस्तक में अंकगणित, बीजगणित और त्रिकोणमिति के 33 नियम भी दिए गए हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आर्यभट्‍ट ने पाई का काफी सही मान 3.1416 निकाला। उन्होंने त्रिकोणमिति में व्यूत्क्रम साइन फंक्शन के विषय में बताया। उन्होंने यह भी दिखाया कि खगोलीय पिंडों का आभासी घूर्णन पृथ्‍वी के अक्षीय घूर्णन के कारण होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आर्यभट्‍ट ने गणित और खगोलशास्त्र में और भी बहुत से कार्य किए। ये महाराजा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के दरबार के माने हुए विद्वानों में से एक थे। इस महान पुरुष की मृत्यु ईसवी सन् 500 में हुई।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-1393035112207934431?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/1393035112207934431/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_15.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/1393035112207934431'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/1393035112207934431'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_15.html' title='आर्यभट्‍ट कौन थे?'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-6937881412833870929</id><published>2009-06-13T05:57:00.000-07:00</published><updated>2009-06-13T06:13:22.035-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>हमारा क्या है</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2006/11/20061123213331kavita_nagar01.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 150px; height: 300px;" src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2006/11/20061123213331kavita_nagar01.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;हम तो जी मुर्गेमुर्गियाँ हैं&lt;br /&gt;हमें ऐसे मार दो या वैसे मार दो&lt;br /&gt;हलाल कर दो या झटके से मार दो&lt;br /&gt;चाहो तो बर्ड फ्लू हो जाने के डर से मार दो&lt;br /&gt;मार दो जी, जीभरकर मार दो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मार दो जी, हज़ारों और लाखों की संख्या में मार दो&lt;br /&gt;परेशान मत होना जी, यह मजबूरी है हमारी&lt;br /&gt;कि मरने से पहले हम तड़पती ज़रूर हैं.&lt;br /&gt;चीख़ती-चिल्लाती ज़रूर हैं&lt;br /&gt;चेताती हैं ज़रूर कि लोगो, भेड़-बकरियो और मनुष्यो तुम भी&lt;br /&gt;अच्छी तरह सुन लो, समझ लो, जान लो&lt;br /&gt;कि आज हमें मारा जा रहा है तो कल तुम्हारी बारी भी आ सकती है&lt;br /&gt;अकेले की नहीं लाखों के साथ आ सकती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम जानती हैं हमारे मारे जाने से क्राँतियाँ नहीं होतीं&lt;br /&gt;हम जानती हैं कि हमारे मारे जाने को मरना तक नहीं माना जाता&lt;br /&gt;हम जानती हैं&lt;br /&gt;हम आदमियों के लिए सागसब्जियाँ हैं, फलफ्रूट हैं&lt;br /&gt;हमारे मरने से सिर्फ़&lt;br /&gt;आदमी का खाना कुछ और स्वादिष्ट हो जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमें मालूम है मुर्गे-मुर्गी होने का मतलब ही है&lt;br /&gt;अपने आप नहीं मरना, मारा जाना&lt;br /&gt;हमें मालूम है हम मुर्गेमुर्गी होने का अर्थ नहीं बदल सकते&lt;br /&gt;फिर भी हम मुर्गेमुर्गियाँ हैं&lt;br /&gt;जो कभी किसी कविता, किसी कहानी में प्रकट हो जाते हैं&lt;br /&gt;हम मुर्गेमुर्गियाँ हैं&lt;br /&gt;इसलिए कभी किसी को इस बहाने यह याद आ जाता है&lt;br /&gt;कि ऐसा मनुष्यों के साथ भी होता है, फिर-फिर होता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम मुर्गेमुर्गियाँ हैं इसलिए हम सुबह कुकड़ू कूँ ज़रूर करते हैं&lt;br /&gt;हम अपनी नियति को जानकर भी दाने खाना नहीं छोड़ते हैं&lt;br /&gt;कुछ भी, कैसे भी करो&lt;br /&gt;मुर्गेमुर्गियों को आलू बैंगन नहीं समझा जा सकता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साभार - बीबीसी हिंदी &lt;br /&gt;विष्णु नागर&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-6937881412833870929?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/6937881412833870929/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_13.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/6937881412833870929'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/6937881412833870929'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_13.html' title='हमारा क्या है'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-8024306044813134548</id><published>2009-06-10T07:08:00.000-07:00</published><updated>2009-06-10T07:11:57.774-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>मन्नो का ख़त</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2006/12/20061215074640kahani416.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 416px; height: 195px;" src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2006/12/20061215074640kahani416.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कहानी&lt;br /&gt;उस दिन शिवालिक की पहाड़ियों के आँचल में पहुँचते-पहुँचते साँझ हो गई. मुझे अगले दिन पता चला कि मैं थोड़ा और चल लेता तो मुझे नहर के डाक बंगले में शरण मिल सकती थी. पर तब तक सूरज बिल्कुल डूब गया था और पहाड़ियाँ धुंध के कारण मटमैली दिखाई देने लगी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं चिंतित होकर आगे बढ़ रहा था कि अब रात घिरने लगी है आश्रय मिलेगा भी तो कहाँ? तभी एक बूढ़ा एक हाथ में लाठी और दूसरे हाथ में पानी का लोटा थामे गाँव के बाहर जाता दिखाई पड़ा. मैं चुपचाप खड़ा, तमसाकार होती सृष्टि को देखता रहा. बूढ़ा मेरे नज़दीक आया तो ठहरकर मुझे देखने लगा. उसने अपनी मिचमिचाती आँखे झपझपाकर पूछा, ‘‘कौन है भाई?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘अजनबी हूँ बाबा.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘वो तो समझ गया. कौन जात हो? अपनी जाति तो मैंने बता दी. पर कहाँ का रहने वाला हूँ, यह प्रश्न मैं टाल गया.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने पूछा, ‘‘बाबा यहाँ रात को कहीं ठहरने का ठौर मिल सकता है?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठहरने की जगह तो यहाँ कहाँ धरी है पर बेटा एक बात पूछे हूँ,‘‘इस उमर में बैरागी बने क्यों घूम रहे हो? जो उमर खाने, कमाने, घर बसाने की है उसमें भले घर के बालक क्या ऐसे घूमते हैं?’’ फिर ज़रा रुक कर उसने संदेह व्यक्त किया,‘‘लगे है घर से भागे हो. कहीं महतारी तो दूसरी नहीं है?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे उस बूढ़े की ममता से एक विचित्र से स्नेह की अनुभूति हुई. मुझे अपनी सफ़ाई में कुछ भी कहना बेमानी लगा. मैं ऐसे एक बूढ़े को जिसकी बरौनियाँ तक सफेद हो चली थीं, क्या समझा पाता कि घूमना-फिरना या यायावरी भी एक काम है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह बोला,‘‘मेरे कोठड़े में पड़ रहना और तो अब कहाँ टक्कर मारते फिरोगे.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;blockquote&gt; ढिबरी की धुआँ-धुआँ रोशनी में मैने देखा कि उसके पीछे लंबे कद की एक स्वस्थ तरूणी भी थी. वह काले रंग की सूती धोती पहने हुई थी. शायद वह खाना बनाते-बनाते चली आई थी इसलिए चूल्हे की आग की उमस के कारण उसका गौरवर्ण और भी निखर उठा था&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मैं अभी आया कहकर बूढ़ा लाठी ठकठकाता आगे बढ़ गया. 15-20 मिनट बाद जब वह हाथ में खाली लोटा लटकाए लौट रहा था तो उसकी लाठी की ठकठक और बढ़ गई थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं भी उसके संग-संग चल पड़ा. उसने मुझे गाँव के किनारे पर लाकर एक ध्वस्त चबूतरे के नज़दीक ले जाकर खड़ा कर दिया. इसके बाद वह अपने घर गया और बेतरह धुआँ देती एक ढिबरी लेकर लौट आया. उस जीर्ण चबूतरे पर चढ़कर मैंने लक्ष्य किया कि उसके कच्चे कोठड़े में बस दीवारें ही थीं. छत शायद बैठ गई थी. मैंने भीतर जाकर देखा वहाँ एक चारपाई पड़ी थी. ढिबरी एक आले में रखकर वह बोला, ‘‘ यहाँ गरमी लगे तो खाट बाहर चबूतरे से निकाल लेना.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कहा,‘‘कोई ज़रूरत नहीं. मैं यहीं पड़ रहूँगा.’’ यह कहकर मैंने अपना सफ़री थैला चारपाई के सिरहाने टिका दिया. बूढ़ा चला गया तो मैं चारपाई की पाटी पर टिककर कुछ सोचने लगा. तभी वह एक फ़टी दरी और तकिया लेकर आया. मुझे उसके चलने के ढंग से लगा कि बूढ़े को रात के समय कुछ ठीक से सूझता नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब वह चला गया तो मैंने थैले से अपनी लूँगी निकालकर पहन ली और पाजामे को तहाकर तकिए के नीचे रख दिया. तीसरे पहर एक कस्बे से गुजरते हुए जो चना और गुड़ खरीदे थे अभी पोटली निकालने की सोच ही रहा कि वह बूढ़ा हाथ में पानी भरा लोटा लिए आता दिखाई पड़ा. इस बार वह अकेला नहीं था. ढिबरी की धुआँ-धुआँ रोशनी में मैने देखा कि उसके पीछे लंबे कद की एक स्वस्थ तरूणी भी थी. वह काले रंग की सूती धोती पहने हुई थी. शायद वह खाना बनाते-बनाते चली आई थी इसलिए चूल्हे की आग की उमस के कारण उसका गौरवर्ण और भी निखर उठा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन दोनों को देखकर मैं चारपाई से उठकर खड़ा हो गया और आगे बढ़कर बूढ़े के हाथ से पानी का लोटा लेने लगा. तभी मैंने देखा लड़की अपने दोनों हाथों से एक थाली पकड़े हुए थी. लड़की ने उड़ती सी नज़र मुझ पर डाला और आँखे झुका ली. उसके हाथों से थाली लेते हुए मुझे संकोच की अनुभूति हुई. पर थाली उसके हाथ से लेनी ही थी सो मैंने दोनों हाथ आगे बढ़ाकर ले ली और चारपाई के बीचों बीच टिका दी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रेखांकन - लाल रत्नाकर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन दोनों के जाने के बाद मैंने उस घिसी हुई पर ढंग से मांजने के कारण चमचमाती थाली में चार रोटियाँ, भाजी और दो हरी मिर्चे रखी देखी. निश्चय ही मुझे खाने की बहुत ज़रूरत महसूस हो रही थी. मैं दबादब चारों रोटियाँ पाँचेक मिनट में ही चट कर गया. वह जब तक दो रोटियाँ और लेकर आई तब मैं पानी का पूरा लोटा पीकर तृप्ति की डकार ले चुका था. थाली मैंने चारपाई के नीचे टिका दी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने मेरे चेहरे पर अपनी बड़ी-बड़ी पानीदार आँखे केंद्रित करके पूछा,‘‘बस्स! इतना सा खाते हो?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हाँ और क्या? आदमी तो इतना ही खा सकता है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने हल्के से मुस्कराकर कहा,‘‘चार रोटियों से से जादे खाने वाले क्या डंगर होते हैं.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने जीभ निकालकर दाँतों से काटी और बोला, "नहीं नहीं. मेरा वह मतलब नहीं था."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने झुककर चारपाई के नीचे से खाली लौटे, जूठी थाली निकाली और खाली लोटे को उठाते हुए बोली,‘‘पानी मैं अभी ला रही हूँ.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन पानी का लोटा लड़की लेकर नहीं आई बल्कि बूढ़ा ही लाया. मैंने उसे बैठने को कहा तो वह चारपाई पर टिकते हुए बोला, "तुम्हें सोने की देर हो रही होगी."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहीं-नहीं आप बैठिए. मैं इतनी जल्दी कहाँ सोता हूँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब वह बैठ गया तो अपने बारे में बतलाने लगा. उसके पास कुल जमा तीन बीघा जोत थी जिसे वह बटाई पर उठा देता था. उसका एक मात्र पुत्र, दूसरी पत्नी का भी देहांत हो जाने पर वैरागी होकर पता नहीं कहाँ चला गया था. उसकी बेटी ही अब बूढे का एक मात्र सहारा थी. बूढा अपने गाँव तथा आसपास के छोटे-छोटे नंगलों और पुरवों में कथा-वार्ता करके कुछ पा जाता था. कुछ बटाइदार से और बाक़ी यजमानी से जो कुछ भी उपलब्ध होता था उसी से दादा-पोती की गुजर हो रही थी. मगर अब उस बूढ़े की सबसे बड़ी चिंता जवान होती पोती के विवाह को लेकर थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं खिन्नमना उसकी चिंताएँ सुनता रहा और अब उसकी बात भी ठीक से समझ में आ गई जो उसने मुझसे मिलते ही कही थी ‘‘लगे है घर से भागे हो’’ मेरे यों भटकने में उसे कहीं घर छोड़कर भाग जाने वाले अपने बेटे की ही झलक मिली होगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी राम कहानी कहकर जब बूढ़ा चला गया तो मैंने अपने थैले से डायरी और कलम निकालकर तकिए पर रख ली. मैं रात को जहाँ भी सोता था सोने से पहले डायरी में एक-दो पृष्ठ अवश्य लिखता था. पर मैं तुरंत कुछ लिख नहीं पाया. मुझे उस जर्जर बूढ़े की डाँवाडोल काया और उसकी जवान होती पोती का ख़्याल आ गया. मैं सोचने लगा मानों अगर साल-छह महीने में बूढे की आँखे बंद हो गई तो उस खिलते हुए यौवन की दशा क्या होगी? कौन देखेगा पितृहीन परिवारहीन उस आश्रयहीन को.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरे-धीरे सन्नाटा बढ़ता चला गया. दूर कहीं से एक साथ कई कुत्तों के भौंकने की आवाज़ें आ रही थीं. पेड़ों पर बसेरा लेने वाले पक्षी भी बीच-बीच में पंख फडफड़ा उठते थे. वह रात की निस्तब्धता में डूबी चुप्पी विचित्र मायावी लोक की सृष्टि कर रही थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं लगभग गाँव से बाहर एक छतविहीन कोठड़े में बैठा सोच रहा था कि आख़िर मैने ख़ुद यायावरों जीवन क्यों चुना? क्या रात बिरात ऐसी ही बीहड़ परिस्थितियों में भटकने के लिए?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ढिबरी का धुआँ मेरी ओर ही आ रहा था. मैंने उसकी परवाह न करके अपने डायरी खोली और ढिबरी की भुतही रोशनी में लिखने का कर्त्तव्य पूरा करने लगा. अभी मैंने कुछेक पंक्तियाँ ही लिखी होंगी कि वह युवती आती दिखाई पड़ी. वह एक तरह से बदन चुराते हुए मेरे निकट आ रही थी. हालाँकि वहाँ आसपास इस निविर बेला में कोई नहीं था मगर फिर भी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे नज़दीक आकर उसने लगभग फुसफुसाते हुए पूछा,‘‘किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं है.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ समय के लिए तो मैं अवाक् बैठा रहा. वह चारपाई के कुछ और निकट आकर मेरी खुली डायरी की ओर संकेत करते हुए बोली बोली, ‘‘क्या लिख रहे हो?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने यों ही बात बताने की गरज़ से कहा यही इधर-उधर की बातें. जैसे मैं जहाँ जाता हूँ वहाँ का छोटा-मोटा ब्यौरा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘अच्छा’ कहकर वह कुछ क्षण चकित भाव से डायरी देखती रही और बोली, ‘‘क्या इसमें यहाँ की बातें भी हैं, इस कोठड़े और चंडी देवी के मंडप की भी?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘हाँ-हाँ क्यों नहीं लिखूँगा. पर यहाँ चंडी मंडप कहाँ है? उसे तो मैंने अभी देखा ही नहीं है.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘सुबह देख लेना. बाबा जी कल सतनारायण की कथा करने माजरे जाएँगे-तभी देख आना.’’ एक क्षण ठहरकर उसने एकाएक पूछा,‘‘क्या मेरा एक काम कर दोगे?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;blockquote&gt;वह कुछ पल असमंजस में पड़ी सोचती रही और फिर आँखे झुकाकर बोली,‘‘यही लिख दो कि तुम इतने दिन से क्यों नहीं आए?’’&lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मैं उसके इस औचक प्रश्न के आशय का कोई अनुमान नहीं लगा पाया. मुझे उलझन में पड़ा देखकर वह थोड़े से मुस्कराई और बोली,‘‘कोई ऐसी वैसी बात नहीं है. अब तुम सो जाओ सवेरे बताऊँगी.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके चले जाने के बाद ही मेरी चेतना में उसके वह वाक्य,‘‘क्या मेरा एक काम कर दोगे.’’ न जाने कितनी देर गूँजता रहा. न फिर मुझे जल्दी नींद ही आई और न मैं डायरी में ही कुछ लिख पाया. ढिबरी बुझाकर मैं उस चिंतन में चारपाई पर पड़े करवटें बदलता रहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस लड़की का दादा तो सुबह जल्दी ही जाग कर के किसी गाँव में कथा कहने चला गया. मैं सुबह उठकर खेतों की ओर निकल गया. लौटते में प्राइमरी मदरसा गाँव के उत्तर खंडरनुमा चंडी देवी का मंडप भी देख आया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने लौटकर अपनी डायरी खोली और पिछले दिन का विवरण लिखने लगा. कोई दसेक मिनट बीते होंगे कि वह आई और मुझे लिखते देखकर वापस जाने लगी. मैंने उसे बुलाकर कहा,‘‘क्या एक प्याला चाय मिल सकती है?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘हाँ चाय तो मैं बना दूंगी पर प्याले घर में नहीं हैं. गिलास-कटोरी में पी लेंगे.’’? क्यों नहीं पी लूँगा. तुम लाकर तो देखो.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके चेहरे पर स्नेहशीलता भाव उभर आया. जाते-जाते बोली,‘‘दो मिनट में चाय बनाकर लाती हूँ.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं सिर झुकाकर अपनी बातें और डायरी देखने में जुट गया. वास्तव में वह अपेक्षा से कहीं अधिक जल्दी से वह चाय बनाकर ले आई और गिलास से कटोरी में चाय रखने लगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने उसके हाथ से कटोरी लेकर फूक भरते हुए चाय की घूट भरी ही थी कि वह बोल उठी आप शहरी चीनी की चाय पीते होंगे पर घर में तो गुड़ ही था. पता नहीं कैसी बनी होगी. कही काढ़ा तो नहीं बन गई.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘अरे नहीं, बहुत ---मीठी और बढ़िया बनी है.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘झुट्ठी तारीफ़ क्यूँ करो हो! भला हम गाँव-घसले चाय बनाना क्या जानें. यों तो बब्बा जी भरे जाड़ों में सुबह-साँझ लोटा भर के चाय पीवे हैं. उन्हीं के लिए पूस-माघ के चिल्ला जाड़े में बनानी पड़े है.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘कुछ भी कहो तुमने चाय बढ़िया बनाई है.’’ कहकर मैने कटोरी झुककर फर्श पर टिका दी और फिर मैं लग गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने इधर-उधर की टोह सी लेते हुए थोड़ी देर बाद कहा,‘‘हाँ, एक ख़त लिख दो.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘ख़त? पर किसको? एक क्षण रुककर मैंने पूछा,‘‘क्या तुम लिखना नहीं जानती?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह लज्जाकर बोली पर मुझसे लिखना कहाँ आता है. लिखने की कोशिश कई दिन की पर लिखा नहीं बस.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘तब तो लिख दूँगा.’’ मैंने अपने बैग से एक कोड़ा कागज निकालकर कहा,‘‘बोलो किसे क्या लिखना है.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह कुछ पल असमंजस में पड़ी सोचती रही और फिर आँखे झुकाकर बोली,‘‘यही लिख दो कि तुम इतने दिन से क्यों नहीं आए?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके एक छोटे से वाक्य से मैं हिल उठा और और उलझन में पड़कर पूछ बैठा,‘‘कौन है? कहाँ रहता है? इधर न आने की क्या वजह है?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके चेहरे पर उदासी का एक बादल तैरता सा दिखा और आँखे उन्मन उदास हो गई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने टुकड़ों में जो कुछ बतलाया उसका सारांश यह था कि वह एक प्राइमरी स्कूल का अध्यापक था जो पहले इसी गाँव के प्राइमरी मदरसे में तैनात था और जब इस कोठड़े की छत सही सलामत थी तो इसी में रहता था. बाद में कहीं तबादला होकर चला गया था. जाने के बाद गाँव में कभी बस एक बार इधर आया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने उससे पूछा,‘‘क्या तुम्हारे पास उसका कोई पता ठिकाना है?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे यह कहते ही मेरी ओर से पीठ फेर ली और अपने अंत:वस्त्रों से एक कई तहों में मुड़ातुड़ा कागज़ निकालकर मेरी ओर बढ़ा दिया. उस कागज़ को मैंने अतिरिक्त सावधानी से खोला, उस पर एक नाम और किसी गाँव का पता दर्ज़ था मगर कागज़ तुड़मुड़कर और चिकनाई के धब्बों से खस्ता हो चला था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कागज़ पर लिखे पते को अपनी डायरी में उतारा और कागज़ उसे वापस कर दिया. वह खाली कटोरा और गलास ले जाते हुए बोली, ‘‘आप लिखो मैं आपके लिए नाश्ता बनाती हूँ.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह चली गई तो गहरा भावावेश अनुभव करते हुए मैंने एक काव्यात्मक पत्र लिखा. पहली वार जीवन से एक प्रेमिका के उदगारों को व्यक्त करने में मेरी सारी चेतना और संवेदना कितनी सफल हो पाई यह तो मैं नहीं बतला सकता पर मैं कुछ समय के लिए दिशा और कालबोध से परे हो ही गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह आई और मुझे लिखते देखकर कुछ बोलने लगी. मैंने उसे रोका और अपना लिखा हुआ मजमून उसे देते हुए बोला, "अब तुम अपने लेखन में इस पत्र को लिखो और बाद में अपना नाम भी लिख दो. उसे यह नहीं लगना चाहिए कि इस ख़त को लिखने वाला कोई और है." साथ ही मैंने उसे एक कोरा कागज़ और कलम भी उसे दे दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई पौन घंटे बाद वह मेरे लिखे हुए पत्र की अपने हाथ से लिखी हुई नकल लेकर आई. उसने टेढ़े मेढे अक्षरों में भरसक सावधानी बरतते हुए पूरे पत्र को मेरे दिए हुए कोरे कागज़ पर उतारा और अंत में 'आपकी अभागी मन्नो' टीप दिया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं उसका यह ‘अभागी मन्नो’ मुझे भीतर तक हिला गया और मैं अपने ही लिखे पत्र के दारुण वियोग से दहल उठा. मुझे लगा परकाया प्रवेश भी सुरक्षित नहीं है. कभी-कभी वह भी भीतर तक तोड़ डालता है. उस पर गज़ब वह भी था कि वह पत्र पढ़ते हुए वह रोई भी ज़रुर होगी क्योंकि पत्र पर आँसू के निशान मौजूद थे और उसकी आँखे गुड़हल के फूल की तरह लग रही थीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनायास मेरे मुँह से एक लंबी साँस निकल गई और मैंने फैसला किया कि मुझे वहाँ से तुरंत चल देना चाहिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कहा,‘‘मन्नो अब मुझे जाना चाहिए.’’ एक पल बाद ही सहसा मेरे मुँह से एक असत्य उच्चारण हुआ, "मुझे आगे काफी काम है.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘ये क्या? बाबा जी से मिले बिना ही कैसे चले जाओगे? अभी तो आपने कुछ खाया भी नहीं है. जितनी देर में बाबा जी आवें आप मंदिर की तरफ घूम आओ. हमारे गाँव की चंडी देवी बड़ी मानता वाली हैं. मन की सारी मुराद पूरी हो जाएँगी. दशहरे पर तीन दिन का बड़ा मेला लगता है. जाने कहाँ-कहाँ से दुनिया मनौती मानने आती हैं.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘मुराद’ और 'मनौती' के शब्द मेरी चेतना में तैरने लगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे लगा मन्नो का ठहरने का अनुरोध कहीं मेरे लिए बेड़ी न बन जाए. इस बैरागी मन को ठाँव कहाँ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने उसका कोई आग्रह नहीं माना. एकदम से थैला उठाकर चल पड़ा और चलते-चलते बोला, "मैं तुम्हारा ख़त किसी शहर से पोस्ट कर दूँगा."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘नहीं रुकोगे? बाबा जी दुखी होंगे. कुछ खाया भी नहीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘मैं कभी आऊँगा तो रुकूँगा और खाऊँगा भी. उसने चबूतरे, पर खड़े होकर मनुहार से कहा,‘‘ज़रूर आना.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके शब्दों के अतिशय अनुरोध ने मेरे अस्तित्व को मानों अथाह स्नेह से दुलरा दिया है. कोमल स्पर्श की ममतामई छवि को आँखों ही आँखों में बसाए मैं बरबस आगे बढ़ता चला गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदासी के सैलाब में डूबे उसके चेहरे को मुड़कर देखने का साहस मैं खो चुका था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;********************************************&lt;br /&gt;से. रा. यात्री&lt;br /&gt;एफ-1/ ई, नया कविनगर&lt;br /&gt;गाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-8024306044813134548?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/8024306044813134548/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_10.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/8024306044813134548'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/8024306044813134548'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_10.html' title='मन्नो का ख़त'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-3360940558782234724</id><published>2009-06-04T05:57:00.000-07:00</published><updated>2009-06-04T05:59:12.726-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सुरभि'/><title type='text'>डांस थेरेपी से दूर करें लाइलाज बीमारी</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.bhaskar.com/2009/05/26/images/DANCE111.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 204px; height: 216px;" src="http://www.bhaskar.com/2009/05/26/images/DANCE111.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;नई दिल्ली.&lt;/span&gt; डांस सिर्फ कला ही नहीं, एक थेरेपी भी है। शरीर के सात महत्वपूर्ण अंगों का सातों भावों से सीधा संबंध होता है। यही वजह है कि न सिर्फ इस फील्ड में तमाम अनुसंधान चल रही हैं, बल्कि स्ट्रेस से लेकर डायबीटीज, स्पॉंडिलाइटिस और मोटापे तक के इलाज में इस थेरेपी की मदद ली जा रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्लासिकल डांसर नलिनी कमलिनी व हार्ट केयर फाउंडेशन द्वारा ‘स्वास्थ्य में शास्त्रीय नृत्य की भूमिका’ विषय पर की गई अध्ययन में पाया गया कि स्वस्थ रहने में शास्त्रीय नृत्य व संगीत की अहम भूमिका होती है। क्योंकि इसमें प्रदर्शित होने वाले सभी आंतरिक भावों का संबंध शरीर के विभिन्न महत्वपूर्ण अंगों से होता है, इससे थायरॉयड ग्लैंड, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट व पेट से संबंधित बीमारियों का खतरा कम होने के साथ ही बुद्घि विकास तथा शारीरिक और सौंदर्य विकास भी होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के पूर्व निदेशक एवं वरिष्ठ हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. पीके दवे कहते हैं कि डांस से शरीर का ब्लड सकरुलेशन ठीक रहता है। यही वजह है कि आजकल व्हील चेयर पकड़ चुके मरीजों पर भी इलाज के साथ डांस और यूजिक थेरेपी का प्रयोग किया जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नृत्य और शरीर के महत्वपूर्ण चक्रों का संबंध:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शरीर का पहला चक्र मुकुट के स्थान पर होता है, जिसका संबंध आशीर्वाद से होता है। दूसरा माथे के बीचोबीच बिंदी के स्थान पर होता है, इसका संबंध बुद्धि से होता है। तीसरा चक्र गर्दन में होता है, जिसका संबंध सच्चाई से होता है। चौथा चक्र दिल के पास होता है, जिसका संबंध प्रेम से होता है। पांचवां नाभि के पास होता है, जिसका संबंध संदेह से होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छठां चक्र नाभि के नीचे होता है, जिसका संबंध जुड़ाव से होता है और सातवां चक्र मेरूदंड के पास होता है जहां रीढ़ की हड्डियां खत्म होती हैं, इसका संबंध डर से होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह भाव ऐसे करते हैं चक्रों को नियंत्रित&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शास्त्रीय नृत्य में सभी सातों भावों को दर्शाया जाता है, जिसमें इससे जुड़े अंगों पर खिंचाव पड़ता है। मसलन आशीर्वाद का भाव लाने के लिए माथे पर, सच्चाई को प्रदर्शित करने के लिए गर्दन का और प्रेम को दर्शाने के लिए हृदय की मांसपेशियों पर दबाव डाला जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रक्रिया में इन अंगों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं, रक्त संचार बढ़ता है, तनाव कम होता है और इम्यून सिस्टम भी स्ट्रॉंग होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुराना है डांस थेरेपी का इतिहास&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डांस थेरेपी की शुरूआत 1940 में मैरियन चास ने अमेरिका में की थी। मैरियन एक प्रोफेशनल वेस्टर्न डांसर थी और वह डांस सिखाती भी थी। जब उसने देखा कि कुछ छात्र भावनाओं को प्रदर्शित करने में काफी दिलचस्पी रखते हैं जैसे अकेलापन, शर्माना और डर, तो उसने उन्हें डांस की तकनीक की जगह उनके मूवमेंट पर ज्यादा ध्यान दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी दौरान कुछ डॉक्टरों ने उनके पास यह सोचकर बीमारों को भेजना शुरू किया कि उनका तनाव कम होगा और कुछ समय बाद मारिया रेड Rास सेंट एलिजाबेथ हॉस्पिटल की डांस थेरेपिस्ट बन गईं। लेकिन थेरेपी को पहचान 1966 में अमेरिका डांस थेरेपी एसोसिएशन की स्थापना के बाद ही मिली।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-3360940558782234724?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/3360940558782234724/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_6850.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/3360940558782234724'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/3360940558782234724'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_6850.html' title='डांस थेरेपी से दूर करें लाइलाज बीमारी'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-6627882885442532468</id><published>2009-06-04T04:44:00.000-07:00</published><updated>2009-06-04T05:28:13.088-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>कहानी : अपूर्णा</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.bhartiyapaksha.com/wp-content/uploads/2009/05/aparna.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 84px; height: 85px;" src="http://www.bhartiyapaksha.com/wp-content/uploads/2009/05/aparna.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;“बोलो बिट्टू, तोमार नाम की? बोलो।” दादी ने पूछा तो बिट्टू ने अपनी बड़ी-बड़ी भोली आखें दादी के पोपले चेहरे पर टिका दीं। दादी ने उसे पुचकारा, ”बिट्टू बोलो, आमार नाम हिम।” पर हिम नहीं बोला। दादी के गले में बाहें डाल हंसता रहा, जैसे अपना नाम बोलने में कोई गुदगुदी होती हो।&lt;br /&gt;दादी ने फिर समझाना चाहा, पर हिम वैसे ही नटखट-सा मुस्कराता रहा। फिर एकाएक आखों को गोलमटोल करता हुआ तुतला उठा, ”तोमाल नाम की?” दादी ने जैसे सोचा ही न हो, वह कुछ सकपका गई।&lt;br /&gt;नाम याद करते हुए सचमुच एक गुदगुदी-सी हो गई पूरे शरीर में। दादी को यों निरुत्तर देख हिम ने समझाते हुए कहा, ”बोलो, आमाल नाम दा-दी।”&lt;br /&gt;हिम दादी की गोद में ही सो गया था। दादी यों ही अंदाजा लगाने लगी, वह करीब अस्सी पार कर चुकी थी। माना कि उम्र कुछ ज्यादा ही हो चली है और वह अब छोटी-छोटी बातें भी भूल जाया करती है पर ऐसा भी क्या भुलक्कड़पन कि अपना नाम भी याद न आए। बहुत कोशिश की पर कोई फायदा नहीं।&lt;br /&gt;कुछ बेचैनी-सी होने लगी, बेचैनी से भी अधिक हैरानी। पर वह भी क्या करे, बेटा मां पुकारता है, बहू तो संबोधन भी कम ही देती है और हिम तो जैसे एक ही शब्द कहना जानता है, जब देखो दादी। मां-बाबा नहीं कहता, बस एक रट दादी। फिर ध्यान आया, इन्होंने भी कभी नाम नहीं लिया। जब जरूरत पड़ी सुनो जी, और बात शुरू। वह सोचने लगी, जब उसने बहस की थी, ”नाम क्यों नहीं लेते मेरा?” तब ये हाथ मटकाते कहने लगे थे, ”सुनो जी एक ही तो गुण आया है मुझमें पत्नीव्रती पति का उसे तो न छीनो।” वे हंसने लगे थे।&lt;br /&gt;अपने हाथों-पैरों को देखती है तो लगता है कि ये सूखी लकड़ियां अब होम हो जानी चाहिए। पर अपने हाथ में क्या है? आंखों की बरौनियां तक पककर सफेद हो चुकी हैं। यह लंबा सफर उसे ताउम्र भटकाता रहा… छलता रहा। वह आंखें मूंदकर फिर खोलती है, कुछ खोजने की कोशिश में - अपना नाम… अपना परिचय… क्या था भी कभी?&lt;br /&gt;इसी दशहरा की तो बात है, उसका बड़ा पोता कनाडा से आया हुआ था। घर में बड़ी पूजा थी, खाते-पीते अच्छी दोपहर हो गई थी। पोते की बहू उसे खिला-पिलाकर पैर दबाने लगी तो उसके रोम-रोम ने आशीर्वाद दिया। इतने में छोटा पोता हंसकर पूछने लगा, ”चीन्हती भी है दादी, कौन पैर दबाती है?”&lt;br /&gt;”अरे हां रे, तेरी दुलहिनिया है।”&lt;br /&gt;”ना दादी, ये तो भाभी है।” उसने झट आंखें तरेरकर खंडन किया। ”विदेशी बहू को कहां फुरसत है मेरी सेवा की,” इस पर सुराज ने समझाया था, ”हाँ मां, ये बड़के की दुलहिन है।”&lt;br /&gt;सच है उम्र का एक लंबा दौर उसने काट लिया है। पीछे पलटकर देखती है तो बचपन को सीधे-सीधे नहीं पकड़ पाती। लंबी सुरंग-सी जिंदगी… हां, उलटे-उलटे पैर लौटे तो कुछ-कुछ ध्यान आता है। हिम-सुराज के छोटे बेटे का बेटा है जिसका कोई तीन-चार साल पहले ही ब्याह हुआ था। सुराज का बड़ा बेटा कनाडा में नौकरी करता है। उसको एक बेटा और एक बेटी है जो अकसर दुर्गापूजा में घर आते हैं। इस बार भी आया था तो उसके लिए बड़ी सुंदर चिकनी-सी साड़ी लाया था, पर वह उसे बहुत नहीं पहन पाती है, माथे से सरक जाती है साड़ी। अब तो बाल भी गिनती के रह गए हैं सिर पर। उसने सिर पर हाथ फेरा… सन-से सफेद-भुट्टे जैसे बाल…।&lt;br /&gt;बचपन में भुट्टे के बाल इकट्ठे किया करते थे हम… वह सोचने लगी। और सोचते हुए अपने बाबा के मकान के पिछवाड़े जा पहुंची… बरसों पीछे… मिट्टी का घर, ऊपर खपरैल की छत… पिछवाड़े में खड़ा नीम गाछ। वह संभ्रांत बंगाली परिवार की लड़की थी, उस जमाने में भी काफी आधुनिक सोच वाले थे उसके माता-पिता। मास्टर जी घर पर आते थे पढ़ाने के लिए, तब वह इसी पिछवाड़े छिप जाया करती। कभी भुट्टे के बाल अपने बालों पर ढक देती और बुढ़िया बनकर हैरानी से सोचती- क्या कभी सचमुच ऐसी ही बूढ़ी हो जाएगी वह भी? वक्त आज उसे अजीब से मोड़ पर ले आया था। आज वह बूढ़ी जर्जर अपने बचपन को टटोल रही थी।&lt;br /&gt;”गड्डी… गुड्डी… ” मां पुकार रही थी, ”खित्तादा आए हैं कहां छिपी बैठी है?” पहले भी दो रोज लौट गए थे खित्तादा। मां झल्ला रही थी जब नहीं पढ़ना चाहती तो जरूरी है पढ़ाना… छोड़ो भी, लड़की है, कोई लड़का तो है नहीं कि कमाकर खिलाए। मां बड़बड़ाती हुई बाबा पर गुस्साने लगी, ”अरे लड़की को सिलाई-बिनाई सिखाना चाहिए, खूब पढ़-लिखकर क्या करेगी, अपना नाम लिख लेती है, बस हो गया।”&lt;br /&gt; ”अपना नाम… ” हां, यही तो टूटा तार था, उसका। उसने लिखा है अपना नाम, इन्हीं उंगलियों से… पर आज याद नहीं आ रहा। नाम… जिसे दुनिया में उजागर करने की प्रेरणा देते थे खित्तादा… हां, खित्तादा, नाम तो था क्षितिज, पर खित्तादा ही पुकारते थे सब उन्हें। कैसी जोश भरी बातें करते थे खित्तादा, ”जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है। जानती हो, हमारा देश अभी आजाद नहीं है, अंग्रेजों के शिकंजे में जकड़ा है और पराधीन जीवन व्यर्थ है। एकदम  व्यर्थ…। हमें कुछ करना चाहिए, इस देश का कर्जा है हम पर, हमें उसे खून देकर भी चुकाना होगा। ये जो तुम भागती हो पढ़ने से क्या सोचती हो, तुम लड़की हो तो फारिग हो गई इस जिम्मेवारी से”&lt;br /&gt;वह हैरान देखती, ”आमी की, कैनो… मैं क्या, कैसे कर सकती हूं खित्तादा?” ”तुम क्या नहीं कर सकती? देखो तुम लड़की हो, तुम्हें देखकर कोई शक भी नहीं करेगा…हमारी कितनी चिट्ठी-पतरी पहुंचा सकती हो… पर नहीं, तुम्हारे बस का नहीं। तुम तो एक डरपोक लड़की हो और पढ़ाई-लिखाई से भी तुम्हारा दूर-दूर तक वास्ता नहीं… ना-ना तुम से न होगा।” वह आज भी विह्नल हो गई है। खित्तादा ने उसकी जिंदगी को नया अर्थ दिया था, उद्देश्य दिया था।&lt;br /&gt;कितनी ही बार उसने उनके जरूरी कागज इधर-उधर पहुंचाए थे, किसी को कानोकान खबर न हुई थी। एक बार कालीबाड़ी के पीछे से निकलते हुए गीली मिट्टी पर पैर फिसल गया और उसकी चीख निकल आई। गोरे सिपाही दौड़कर आए थे, घेर लिया उसे।&lt;br /&gt;”किधर जाता? नाम केया तुम्हारा?” एक पल को घिग्घी बंध गई उसकी, पर फिर अगले ही पल वह और गंवारों-सी मुंह फाड़कर रोने लगी, ”आमार नाम केया।” ”केया…? वाट…? नाम बताओ… जल्दी, नहीं तो अरेस्ट कर ले जाएंगे।”&lt;br /&gt;”ओई तो… आमार नाम केया, केया तुमी जानो ना? एकटा फूल होए।” और ऊपर डाल पर लगे फूल की ओर इशारा किया था उसने।&lt;br /&gt;”तुम को फूल मांगटा?” गोरा हंसने लगा और डाल हिलाकर ढेरों फूल गिरा दिए उसने… नीचे हरसिंगार के सफेद-सिंदूरी फूल-ही-फूल बिछ गए थे। वह हंस ड़ी… केया, नहीं यह तो यों ही, अंग्रेजों के वाट-वाट, केया-केया सुनकर रख लिया था उसने और यही नाम काम कर गया था। बहरहाल, केया नाम भी बुरा नहीं था। खित्तादा हौले-से हंसे थे उसकी चातुरी पर।&lt;br /&gt;”देखो केया, जोखिम भरा काम है यह, जान भी जा सकती है इसमें।”&lt;br /&gt;”जानती हूं खित्तादा, जग्ग (यज्ञ) में आहुति तो देना ही पड़ता है। मैं तैयार   हूं… आप आगे का काम बताएं,” उसने कमर कस ली थी। ऐसे कितने ही अवसर आए थे। वह घर से निकलती तो एक बार भर आंख देखती थी अपना घर और पिछवाड़े का नीम गाछ।&lt;br /&gt;”काम होने पर मिलूंगी खित्तादा,” कहकर एक आशा बांधे सख्त बनकर निकल पड़ती थी। समय जैसे पींग बढ़ा रहा था, अब वह भी खित्तादा के दल और अभियान का एक जरूरी हिस्सा थी। ऐसा सिर्फ एकबार ही हुआ था कि कोई काम उसे सौंपने से मना कर दिया था खित्तादा ने।&lt;br /&gt;”केनो, केनो,” पूछ-पूछकर जी हलकान कर बैठी थी वह।&lt;br /&gt;”नहीं, बहुत जोखिम भरा काम है यह, और फिर ससुरारियों को किंचित शंका भी हो गई है तुम पर…।” खित्तादा अंग्रेजों को गुस्से में ससुरारी कहकर गलियाते थे।&lt;br /&gt;”शक ससुरारी को नहीं, तुम्हें है खित्तादा, मेरी काबिलीयत पर, जाने दो मुझे, विश्वास करो, काम पूरा किए बिना मरूंगी नहीं मैं।” अगले रोज सुबह-सुबह एक पंजाबिन खित्तादा के दरवाजे खड़ी थी।&lt;br /&gt;”क्या चाहिए? हमने पहचाना नहीं आपको?” खित्तादा ने विस्मय से पूछा तो वह झक्क से हंस दी, ”तुस्सी मैन्नू पहिचान सकदे ने? नई ना… तो ससुरारी मैन्नू किस तरा पहिचान सकदे हां? खित्तादा, तुस्सी शुबा ना करो, मैन्नू कम्म सोंपो…।”&lt;br /&gt;”ओरी बाबा… तुमी अपूर्णा…, ” कहते हुए खित्तादा ने खुशी से तीन बार ताली बजाई, ”खूब भालो, खूब भालो अपूर्णा।”&lt;br /&gt;हां, अपूर्णा! यही तो नाम था उसका।  नहीं, सही नाम तो अपर्णा था, मगर कोलकाता में पहुंचकर अपूर्णा बन गया था फिर भी, यही सही-सगा नाम था उसका, उसकी परिणति को दर्शाता। खित्तादा ने सबसे भारी काम सौंप दिया था उसे। वह निकल पड़ी थी उसे अंजाम देने। पर उधर किसी ने मुखबिरी की और उधर गोरों ने घेर लिया खित्तादा को। खित्तादा पुलिस मुठभेड़ में मारे गए। काम पूरा कर लौटी तो पता चला। लगा जैसे अपूर्णा ही रह गई वह…। कितनी लंबी बरसात रही… अपूर्णा छिप-छिपकर रोती रही।&lt;br /&gt;वक्त बीतता चला गया। खित्तादा की जगह कोई न ले सका। दल के सभी साथी बिखर गए। कुछ एक तो अलग दलों में जा मिले और प्रफुल्लो दा ने नीरा दी से ब्याह कर गृहस्थी बसा ली। बाबा ने सुयोग्य वर देखकर उसे भी ब्याह दिया। वह मन में एक टीस दबाए नियति के आगे नतमस्तक हो गई। ब्याह का विरोध कर पाने का संस्कार नहीं था उसके पास। एक हूक ही रह गई कि वह भी देश के काम आती।&lt;br /&gt;दीपेन रोज सुबह-सबेरे घर से निकलते और देर रात लौटते।&lt;br /&gt;”सुनोजी मैं बिसेस काज से दिल्ली जा रहा हूं, सप्ताह भर में लौटूंगा, तुम्हें भय तो नहीं लगेगा?”&lt;br /&gt;”मैं किसी से नहीं डरती।” एकदम सधी आवाज में अपूर्णा बोली थी। दीपेन अकसर काम से दिल्ली-कलकत्ता करते रहते। पर एक दिन कुछ ज्यादा ही विचलित दिखाई पड़ रहे थे।&lt;br /&gt;”सुबह से देख रही हूं, बरामदे में चहलकदमी कर रहे हैं, कोई परेशानी है तो बताइए।”&lt;br /&gt;और दीपेन ने पहली बार नजर भर कर देखा था अठारह बरस की उस दिलेर लड़की को।&lt;br /&gt;”जानती हो, मेरे जीवन का एक मिशन है, एक ध्येय-आजादी…सुराज…अपना देश…अपना राज…किसी की गुलामी नहीं…सुराज…सुराज।”&lt;br /&gt;अपूर्णा को लगा जैसे उसका जन्म फिर अर्थ खोजने लगा। वह अपना टूटा तार फिर से जोड़ने लगी और बुलंद इरादों से खड़ी हो गई दीपेन के साथ। कदम-कदम पर खतरों से खेलना उसकी और दीपेन की दिनचर्या बन गई थी। दीपेन गर्म दल के सक्रिय कार्यकर्ता थे, स्वतंत्रता की ललक सर चढ़कर बोल रही थी। एक दिन उन्होंने अंग्रेज कलेक्टर पर बम फेंका, उन पर मुकदमा चला और वंदेमातरम का नारा लगाते वे फांसी के फंदे पर झूल गए। अपूर्णा ने वैधव्य का सिंगार ओढ़ लिया। सूना माथा, सूने हाथ… शाखा-पोला, सब धरा का धरा रह गया। फिर पंद्रह अगस्त आया…स्वतंत्राता मिली…मिशन पूरा हुआ… खित्तादा का मिशन… दीपेन का मिशन। अपूर्णा का मिशन भी ठीक उसी रोज पूरा हुआ।&lt;br /&gt;”मुबारक हो दीदी, बेटा हुआ है… नाम सोचा है कुछ?” ”सुराज।” अपूर्णा की मुंदी आंखों से जलधार बह निकली।&lt;br /&gt;आज भी नयन कोर गीले हो गए बूढ़ी अपर्णा के। किंतु नहीं… वह अपर्णा थी ही कब… वक्त के हाथों नाचती कठपुतली थी वह। उसे गाना अच्छा लगता था, पर बाबा की इच्छा थी वह पढ़े, उसने पढ़ा-बंगला, हिंदी और थोड़ी अंग्रेजी भी। खित्तादा ने सिखाया देश पर उत्सर्ग होना…खुद उत्सर्ग हो गए। दीपेन की संगिनी बनी…दीपेन ने साथ छोड़ दिया। नीरा दी उसे कितना भाती थी। भर हाथ लाल-लाल चूडियां, तांत की लाल पाड़ की साड़ी, माथे पर बड़ी-सी टिकुली और मांग में टिहु-टिहु लाल सिंदूर। वह देखती थी खुद को… ऐसे ही चूड़ियां छनकाते…सुराज के पीछे भागते…वह चाहती थी कि सुराज उसे दौड़ा-दौड़ाकर थका दे… पूछ-पूछकर, बोल-बोलकर माथा थका दे। पर सुराज बिलकुल उलट था। शुरू से ही धीर-गंभीर, समझदार। वह बहुत भांपकर चलता था कि कभी उसके किए से मां को कोई तकलीफ न पहुंचे, बहू भी खूब ध्यान रखती थी अपर्णा का।&lt;br /&gt;लेकिन फिर भी, जिंदगी शायद नाम ही समझौतों का है। जब सुराज के बड़े बेटे को कनाडा जाना था नौकरी करने, तब वह कितना आहत हुई थी। पढ़ाई-लिखाई की यहां, लायक बनाया इस देश ने और सेवा करने चल दिया दूसरे देश? सुराज ने समझा-बहला दिया उसे। फिर उस रोज जब पासपोर्ट वाला बाबू छानबीन करने घर आया था और पोते ने उसकी हथेली पर सौ का एक नोट धर दिया था तब सुराज ने तो अनदेखा कर दिया पर वह न कर सकी… बिलकुल ही टूट गई वह। क्या इसी दिन के लिए जान हथेली पर लिए फिरते थे हम सब… क्या इसी दिन के लिए खित्तादा ने, दीपेन ने अपनी जान उत्सर्ग की? उसकी जिंदगी का आधे से अधिक हिस्सा, सुराजेर मां के नाम से जाना जाता रहा… क्या यही था सुराज?&lt;br /&gt;हिम जाग गया था और दा-दी पुकारकर उससे लिपट गया। कितनी मिठास थी इस एक संबोधन में- जैसे उसके मन का सारा अवसाद ब्लाटिंग पेपर की तरह जज्ब कर लिया हो हिम ने। वह झूल गया था दादी की टहनी-सी बांह पर और लगा जैसे उसने हिला दी हो डाली फूलों की- ”तुम को फूल मांगता?”… और हर ओर जैसे हरसिंगार के सफेद-सिंदूरी फूल-ही-फूल बिखर गए हों। जिंदगी आंख मिचौली खेलती उसी से पूछ रही थी। कौन हो तुम पूर्णा… या अपूर्णा…&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-6627882885442532468?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/6627882885442532468/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_5269.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/6627882885442532468'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/6627882885442532468'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_5269.html' title='कहानी : अपूर्णा'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-949512072174880570</id><published>2009-06-04T04:41:00.000-07:00</published><updated>2009-06-04T04:43:51.959-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तकनीक'/><title type='text'>इंटेलिपीडिया क्या है?</title><content type='html'>ऑनलाइन इनसाइक्लोपीडिया विकिपीडिया की तरह इंटेलिपीडिया ऑनलाइन सिस्टम है जिसका उपयोग अमेरिकी सुरक्षा से जुड़ी एजेंसियाँ और गुप्तचर विभाग करता है। इस इंटेलिपीडिया का उपयोग अमेरिकी आंतरिक सुरक्षा से जुड़े विभाग जानकारियों के आदान-प्रदान और जानकारी प्राप्त करने के लिए करते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आम अमेरिकी जनता इसका उपयोग नहीं कर पाती है। इसकी शुरुआत अमेरिकी इंटेलीजेंस में जार माने जाने वाले जॉन निग्रोपॉन ने की थी। सुरक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले विश्लेषक और अधिकारी इंटेलिपीडिया के कंटेट में किसी भी तरह का फेरबदल कर पाते हैं। ठीक उसी तरह जैसे हम वीकिपीडिया पर किसी भी जानकारी में इजाफा या सुधार कर सकते हैं। २००५ के आखिर में इंटेलिपीडिया पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू किया गया और अप्रैल १७, २००६ को इसकी घोषणा कर दी गई कि यह जारी रहेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-949512072174880570?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/949512072174880570/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_4524.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/949512072174880570'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/949512072174880570'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_4524.html' title='इंटेलिपीडिया क्या है?'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-4242986758603592886</id><published>2009-06-04T04:36:00.000-07:00</published><updated>2009-06-04T04:40:33.529-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तकनीक'/><title type='text'>३-जी टेक्नोलॉजी क्या है?</title><content type='html'>थ्री-जी से सीधा अर्थ है टेलीकम्युनिकेशन में तीसरी पायदान। मोबाइल फोन की पहली और दूसरी जेनरेशन ने संचार जगत में जो क्रांति की , ३-जी उसी का विस्तार है। पहली जेनरेशन के मोबाइल फोन के जरिए लोग एक दूसरे से बात तो कर सकते थे पर फोन को टेलीफोन नेटवर्क में जोड़ना पड़ता था। दूसरी जेनरेशन के मोबाइल फोन के जरिए यूजर्स को ज्यादा सुविधा मिली और सेलफोन डिजिटल नेटवर्क की मदद से चलने लगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज मोबाइल फोन ने हमारी दुनिया में क्रांति कर दी है। 3-जी नई क्रांति है। इस 3-जी टेक्नोलॉजी की मदद से मोबाइल फोन यूजर्स वीडियो कॉल्स और वायरलेस इंटरनेट जैसी सुविधाओं का उपयोग सेलफोन पर कर पाते हैं। 3-जी टेक्नोलॉजी के बाद अब 4-जी टेकनोलॉजी के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-4242986758603592886?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/4242986758603592886/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_04.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/4242986758603592886'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/4242986758603592886'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_04.html' title='३-जी टेक्नोलॉजी क्या है?'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-7891333464914675010</id><published>2009-06-03T04:49:00.000-07:00</published><updated>2009-06-03T04:54:40.185-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>सम्बलपुर एक्सप्रेस</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2006/09/20060928230454kahani416.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 416px; height: 152px;" src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2006/09/20060928230454kahani416.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘साहेब, नमस्कार! आइए, चाह पी लीजिए’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुप्ता जी थोड़े चिढ़ गए. शाम का टहलना अगर तेज़ कदमों से हो, गहरी साँसे लेते हुए, तभी उसका कुछ मतलब है. ऐसे रुकते-अटकते रहे... मगर एक अचरज ने इस चिढ़ को भुला दिया. ये पुकार तो सम्बल की है! सम्बल यानी सम्बलपुर एक्सप्रेस- सम्राट होटल में पानी सर्व करने वाला झक्की, हड़बड़िया उड़िया बेयरा. गुप्ता जी चाय से पहले डेढ़ दो गिलास पानी ज़रूर पीते थे, इसीलिए इस काले लंबे और हड़ियल अधेड़ उड़िया के वे ख़ास ग्राहक थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘अरे, सम्राट छोड़ दिए का यार?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने पूछा,‘‘ओ बहुत बईमान आदमी है साहेब.’’ सम्बल ने उत्साहपूर्वक, बल्कि, हँसते हुए कहा. एक चाय ढेले में स्टोव, भगौने, ब्रेड वगैरह के पीछे मालिक के रूप में खड़ा वह अजीब लग रहा था. जैसे किसी दूसरे के ढेले पर छुट्टियाँ मना रहा हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘मेरा पनरा सौ दबा दिया साहेब’ उसने बताया. बताने का ढंग शिकायत का कम था, गर्व का अधिक.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘अरे! कैसे? ’ गुप्ता जी ने पूछा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘सीधे बोल दिया कि तुम्हारा कुछ निकलता नईं.’ सम्बल ने लापरवाही से बताया, फिर यह भी जोड़ा-‘बईमान है, एकदम बईमान.’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘ठीक बोल रहा है,‘गुप्ता जी के साथ सांध्य-भ्रमण पर निकले चोबे जी ने कहा. चौबे जी आराम कायल थे और इस मूड में थे कि चाय-वाय पीकर बढ़ा जाए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुप्ता जी की तनिक रुष्ट व प्रश्नवाचक दृष्टि को अनदेखा करते हुए उन्होंने फिर से कहा, ‘‘बिल्कुल ठीक. वो, सोनी तो साला है ही बेईमान.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘चाह, बनाऊँ साहेब?’ सम्बल ने पूछा,‘‘फस्कलास बनाऊँगा-कड़क.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘चलो पी लेते हैं. फिर चले चलेंगे.’ चौबे जी ने भी जोड़ दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोनों बाजू में रखे बेंच पर बैठे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; &lt;blockquote&gt;अऊ जेतना हरामी टाइप के होटल-लॉज वाला रहता है ना, ऊ सब ऐसन हीं करमचारी खोजता है, जो बइल जइसा खटे, कुकुर जइसा पोंछी हिलाए अरू हिसाब-किताब में गदहा हो एकदम&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मालूम हुआ कि एक भूतपूर्व ढेले से सम्बल ने ये सारा जुगाड़- ठेला, बरतन, स्टोव, बेंच सब किराए पर लिया है. सुबह भजिया भी बनाया -रोज़ बनाएगा. बाकी दिन भर ब्रेड-बिस्कुट-चाय चलेगी. ‘आछा से मेहनत करेगा अउर भगवान चाहेगा तो...’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाय भी ठीक-ठाक थी. ‘चाए तो समराट से बीसे है गुरू,’ चौबे जी ने मत दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहाँ से निकले तो गुप्ता जी का सांध्य-भ्रमण-जनित-स्वास्थ्य लाभ लेने का उत्साह थोड़ा ठंडा पड़ गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आराम से चलते हुए तनिक दार्शनिक उदारता से उन्होंने कहा- ‘बिचारा बुद्धू टाइप का है, समझ नहीं पाता, पता नहीं कितना सही बोल रहा है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘बुधू नहीं, मंदबुधि है-रिटारडेड.’ चौबे जी ने बताया-‘अऊ जेतना हरामी टाइप के होटल-लॉज वाला रहता है ना, ऊ सब ऐसन हीं करमचारी खोजता है, जो बइल जइसा खटे, कुकुर जइसा पोंछी हिलाए अरू हिसाब-किताब में गदहा हो एकदम.'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात अकाट्य थी. गुप्ताजी सोच में पड़ गए. ‘सोनी को तो आप भी सुरुवे से जानते हैं ना?’’ चौबे जी ने बात जारी रखी. ‘अइसने ढेला नहीं लगाता था पहिले! त एतना कइसे बढ़ गया! तीन मंजिला, एयरकंडीसन होटल खोल दिया!’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘बिचारा मेनहत भी बहुत किया है यार' , गुप्ता जी ने कहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘मेहनत-फेहनत तो सबे करते हैं महराज.’ चौबे जी ने वितृष्णा से कहा-‘‘हाँ, बल्कि इ कहिए कि चलाक बहुत है, भारी लंद-फंदिया है अऊ सबसे ऊपर, किस्मत का साँड़ है. सबको लूटता है अऊ सबको पटाकर रखता है. ’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘व्यापार में तो भाई, सबको खुश रखना ही पड़ता है.’ गुप्ता जी ने तर्क दिया तो चौबे जी और चिढ़ गए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘देखिएगा, इ जब ना मरे.’ उन्होने कहा,‘‘जइनस ऊ बढ़-चढ़ के खेल रहा है ना, सबे के आँख में गड़ रहा है. इ एक कदम लड़खड़ाया तो चार जने ढकेल के गिरा देंगे अऊ दस जाने कुच के चल देंगे.’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘अमृत पीकर तो यहाँ कोई नहीं आया है.’ गुप्ता जी ने कहा, फिर जैसे बात का समापन किया-छोड़ो यार, हमारा कौन वो पंद्रह सौ दबाया है-मरे या जिए, अपनी बला से.’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘इ सम्बलपुर एक्सप्रेस भी, बड़ा खुसी-खुसी बता रहा था कि मेरा पनरा सौ दबा दिया.’ चौबे जी ने मुस्कुराते हुए कहा,‘‘एतना खुश काहे था? बल्कि कहिए कि एतना खुश कइसे था.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके लगभग पंद्रह दिनों बाद चौबे जी प्रोफेसर सिन्हा के साथ टहलते हुए उधर निकले, तो सम्बल ने फिर हाँक लगाई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘नमस्कार साहेब! आइए, चाह, पी लीजिए.’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोनों बैठे. चौबे जी ने ध्यान दिया कि ठेले की हालत खस्ता है. भजिया-बिस्कुट वगैरह गायब है, बस एक-एक रुपए वाली दो चार डबल रोटियाँ बची हैं. सम्बल भी थोड़ा और दुबला, मैला और काला सा दिख रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘कइसा चल रहा है जी’ उन्होंने पूछ भी लिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘ठीक है साहेब.’ उत्तर में कृतज्ञता भरी मुस्कान भी थी, फिर उत्साह से उसने कहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘जानते है, आज बईमान न सहर छोड़के कही भाग गया है.’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘कौन, सोनी?’ चौबे जी ने पूछा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सम्बल ने मस्ती में तीन-चार बार सिर डुलाया. यानि जी हाँ जनाब, वही.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'क्यों, क्या हो गया?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt; एक थोड़ी मेंटल केस लड़की से उसका चक्कर था. अब ये इडियट समझ नहीं पाया. परसों शाम को लड़की इसके होटल में आ गई. ये कुछ बोल दिया तो वो फार्म में आ गई, भारी न्यूसेंस क्रिएट कर दी. सोनी ने उसे बाहर निकलवा दिया तो वो सीधे थाने चली गई, एफआईआर करवा दी. अब पुलिस की चांदी है. अभी अरेस्ट नहीं करने का पैसा लेंगे.&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;‘एकदम ख़राब वाला केस था साहेब, लड़की के साथ जबरजस्ती वाला. पुलिस खोज रहा है. ’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चौबे जी को थोड़ा अचरज हुआ. सोनी बच-बच के खेलने वाला खिलाड़ी था-ऐसी गफ़लत उससे कैसे हो गई?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘भागेगा तो कहाँ भागेगा? चाय छानते हुए सम्बल ने मुदित स्वर में कहा-‘कल नई पकड़ेगा तो परसों पकड़ लेगा. गरीब आदमी का पईसा खा के बचेगा नई. है ना साहिब?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाय सामने धरकर सम्बल तनिक दूर बैठकर बर्तन साफ करने लगा. चौबे जी ने सिन्हा सर से धीरे से कहा-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘इ मूरख अपना धंधा नहीं देख रहा है. इसी में लहालोट है कि पुलिस सोनी को पकड़ा रही है. अजीब पगलेट है.’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"एक्चुअली हुआ क्या कि..." सिन्हा सर अधिकृ़त, विस्तृत और विधिवतक बोलने वाले आदमी थे. बताने लगे कि एक थोड़ी मेंटल केस लड़की से उसका चक्कर था. अब ये इडियट समझ नहीं पाया. परसों शाम को लड़की इसके होटल में आ गई. ये कुछ बोल दिया तो वो फार्म में आ गई, भारी न्यूसेंस क्रिएट कर दी. सोनी ने उसे बाहर निकलवा दिया तो वो सीधे थाने चली गई, एफआईआर करवा दी. अब पुलिस की चांदी है. अभी अरेस्ट नहीं करने का पैसा लेंगे. फिर अरेस्ट करेंगे तो गाली-गुप्ता नहीं करने का पैसा लेंगे, फिर नहीं मारने-पीटने का पैसा लेंगे, रिमांड पर नहीं लेने का पैसा लेंगे. यही तो एक ऐसा डिपार्टमेंट है जो कुछ करने का नहीं, बल्कि कुछ नहीं करने का पैसा लेता है. एक्चुअली इंडिया के सिस्टम में...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चौबेजी ने महसूस किया कि चाय निहायत बुरी बनी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘चाय बनाए हो कि क्या बनाए हो यार’ बुरा सा मुँह बना कर उन्होंने सम्बल को कोसा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘उसको मत पीजिए साहेब.’ सम्बल ने तत्परता से कहा,‘एक मिनट में दूसरा बना देता हूँ.’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"एक्चुअली क्या है कि..." से शुरू करके सिन्हा सर इस बार चायपत्ती के मार्केट से लेकर उपभोरक्तावाद, क्रिक्रेट, फ़िल्म स्टार, टीबी के कार्यक्रमों के बारे में सदाबहार, अधिकृत और विस्तृत ढंग से बोलते रहे. जब तक कि फिर चाय न आ गई जो कदरन काफी बेहतर थी. पैसे भी सम्बल एक ही बार की चाय के ले रहा था पर गुप्ता जी ने जबरन दोनों बार के दिए. सिन्हा सर ने इस संव्यवहार पर भी एक छोटा सा प्रवचन किया, पर तब तक चौबे जी का मूड काफी उखड़ चुका था, सो बात ख़त्म हुई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके 10-12 मिनट दिनों के बाद प्रोफेसर सिन्हा से सम्बल की मुलाकात सब्ज़ी मार्केट में हुई. इतवार का दिन था. सिन्हा सर इतवारी बाज़ार के बाहर स्कूटर स्टैंड पर खड़े थे. स्टैंड वाला कहीं चिल्लर लेने गया था. सिन्हा सर स्कूटर को स्टैंड में ही रखते थे. आजकल चोरियाँ कितनी बढ़ गई हैं. उन्हें थोड़ा गुस्सा भी आ रहा था. तभी वह विनम्र व प्रसन्न पुकार आई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘साहेब, नमस्कार. भाजी लेने आए हैं?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सम्बल कंघे पर एक बाँस टिकाए खड़ा था. बाँस के सिर पर धागों से लटकी 20-25 पॉलीथीन के थैलों में हवाई मिठाई थी. एक-एक रूपए वाली.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘चाय ठेला बंद कर दिया क्या यार’! उन्होंने बेमन से पूछा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘फायदा नई था उसमें’ सम्बल ने मुस्कुराते हुए कहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘और इसमें?' सिन्हा सर ने व्यंग्य से पूछा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘ये ठीक काम है साहेब.’ सम्बल को व्यंग्य से मलतब नहीं था, ‘धूमेगा-फिरेगा तो चालीस-पचास रुपए मिल जाएगा.’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिन्हा सर ने गौर किया, सम्बल की हालत बहुत ख़स्ता थी. वह एकदम मैला-कुचैला, बदरंग और फटेहाल नज़र आ रहा था. पर चेहरे पर संतुष्टि व बेफीक्री थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘चलो, ठीक है...’ वे बुदबुदाकर रह गए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘मालूम है’? अचानक सम्बल ने उत्साह से और राज़दाराना ढंग से कहा- "बईमान को हाड-अटेक हो गया है, बहिरे ले गया है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘अच्छा.’ सिन्हा सर ने बेमन से कहा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘सक्कर का बेमारी तो पहले से था.’ सम्बल ने मुस्कुराते हुए कहा-गुस्सा बहुत करता है ना. हम भी पईसा मांगा था तो...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘ओय हवाई मिठाई. !’ एक आदमी ने पुराकर लगाई साथ एक छोटा बच्चा भी था. बच्चा ऊँगली उठाकर कुछ बोल रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब तक स्टैंड वाला लड़का भी आ गया. स्कूटर उसके हवाले करके सिन्हा सर मार्केट की ओर बढ़े तो वे सम्बल की बगल से गुज़रे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सम्बल उस आदमी को सम्राट होटल वाले सोनी के हार्ट-अटैक की सूचना दे रहा था. तत्परता और मुस्कान के साथ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कमबख़्त, अजीब जीवट आदमी है. सिन्हा सर ने सोचा और हँस पड़े.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;प्रभु नारायण वर्मा &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-7891333464914675010?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/7891333464914675010/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_03.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/7891333464914675010'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/7891333464914675010'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post_03.html' title='सम्बलपुर एक्सप्रेस'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-654605535742280164</id><published>2009-06-01T04:56:00.000-07:00</published><updated>2009-06-01T05:02:17.757-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>दरवाज़ा अंदर खुलता है</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2006/12/20061220231757kahani_anand416.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 416px; height: 225px;" src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2006/12/20061220231757kahani_anand416.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कहानी&lt;br /&gt;इस जगह से थोड़ी ही दूर पर वह घर है. उस घर में सिर्फ़ एक दरवाज़ा है. वह दरवाज़ा घर के अंदर खुलता है. घर में न कोई खिड़की है, न रोशनदान है. चारों तरफ ऊँची-ऊँची दीवारें हैं और सिर्फ़ कच्चा आँगन. आँगन में एक कुआँ है. एक अमरूद का, एक करौंदे का और एक नीम का पेड़ है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीम के पेड़ के चारों तरफ गोलाई में एक चबूतरा है. चबूतरे पर बीट पड़ी रहती है, जिनसे पता चलता है कि पेड़ पर पक्षी रहते हैं. घर में और कोई नहीं रहता. कोने में एक छोटी सी कोठरी है जो बंद रहती है. उसकी छोटी-सी खिड़की टूटी हुई है, जिससे झाँककर देखो तो वहाँ लकड़ी का एक पुराना संदूक, एक निवाड़ का पलंग और लोहे की दो छोटी तिपाइयाँ नज़र आती हैं. कोठरी का फर्श टूटा हुआ है. दीवार में एक बड़ा-सा आला है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने बताया था, “कोठरी कई बरसों से खोली नहीं गई है. यह उस कोठरी की चाबी है लेकिन इससे ताला नहीं खुलेगा. तुम यह तेल भी ले जाओ. ताला चिकनाई पाकर नरम पड़ जाएगा और चाबी घूम जाएगी. तुम्हें पहले कोठरी की सफ़ाई करनी होगी. इसके बाद तुम अपना सामान वहाँ जमा लेना. दो-चार रोज़ में कुएँ की सफ़ाई करा देंगे. यह घर तुम्हारे रहने लायक बन जाएगा. पहले हमारी बुआ वहाँ रहती थी. उसके मरने के बाद एक चौकीदार रखा था, पर वह हफ्ते-भर में ही भाग खड़ा हुआ. तुम अब भी सोच लो. तुम्हें डर तो नहीं लगेगा?” उन्होंने पूछा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस घर के आसपास कोई दूसरा घर नहीं है. उन्होंने यह बताया था और कहा था कि ढलान पर एक पुराना मंदिर है. उससे थोड़ी दूरी पर यह घर है. घर में मंदिर के घंटे की सुबह-शाम आवाज़ आती है. दिन में बीसियों लोग घर के सामने से गुज़रते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर से थोड़ी दूर नदी है जो बरसात में चढ़ जाती है. तब पानी आँगन में आ जाता है. लेकिन इधर कुछ बरसों से नदी ने भी चढ़ना बंद कर दिया है. बरसात के महीनों को छोड़कर पूरे साल वह एक नाले-सी बनी रहती है. नदी पार करने के लिए पानी वाली जगह पर खूजर के दो पेड़ रख दिए गए हैं. लोग इनपर चलकर नदी पार करते हैं. नदी के पार काफ़ी दूर तक खेत हैं. उसके बाद आमने-सामने गाँव हैं.&lt;br /&gt;“दिशा-मैदान के लिए तुम नदी के पास खेतों में जा सकते हो. दिन में तो घर के सामने की कच्ची सड़क चलती रहती है. रात को भी वहाँ कोई डर नहीं होना चाहिए. चोर-लुटेरा वहाँ से क्या ले जाएगा? तुम सफ़ाई करके सामान जमा लो, फिर घर से लोटा-बाल्टी और लालटेन ले जाना. तुम्हें वहाँ असुविधा नहीं होनी चाहिए”. उन्होंने एक ही साँस में सब बता दिया था.उसे असुविधा शब्द सुनकर हल्की-सी हँसी आई लेकिन उसने उस पर तुंरत काबू पा लिया. उसे कोई असुविधा अब नहीं होती. न किसी चीज़ से डर लगता है. पहले उसे अकेलेपन से ऊब होती थी. अब उसे अकेलेपन से न ऊब होती है न डर लगता है.&lt;br /&gt; वह ऐसे ही अहातेनुमा घरों में रहने का आदी हो गया है. वह एक ट्यूबवेल ऑपरेटर था. किसानों को पानी देता था. वे उससे सिंचाई करते थे. कई किसानों ने उसे प्रलोभन दिया कि वह उन्हें जितना पानी देता है, उसका 10-20 फीसदी ही किताबों को दिखाए और शेष पानी का जितना पैसा बनता हो उसका आधा उनसे नक़द ले ले.&lt;br /&gt;  &lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;शीशा कुछ जगह खुरदरा-सा था, लेकिन बूढ़ी औरत की तस्वीर जैसे एक आश्वस्तकारी ख़ुशी के साथ उसका स्वागत कर रही थी. यह आवाज़ भीतर से उठ रही थी. और तस्वीर में उसे उसकी मौन प्रतिध्वनि महसूस होती थी. उसे लगा कि इन कोठरी ने तो जैसे पेड़, पक्षी और कुएँ से भी ज़्यादा आत्मीयता से उसका स्वागत किया हो&lt;/span&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;उसका दिल नहीं ठुकता था. वह सोचता था कि वह अकेला प्राणी है. न घर, न बाहर. न बाल, न बच्चा. न रिश्तेदार, न दोस्त. उसे जो तनख़्वाह मिलती है उससे उसका काम आसानी से चल जाता है और कुछ पैसा बचाकर वह हर महीने डाकखाने में जमा भी कर देता है. खेतों-गाँवों में घूमते उसका टाइम आसानी से कट जाता है. ख़ुद खाना बनाने, कपड़े थोने और सौदा-सुफल लाने में उसे मज़ा आता है. रोज़ाना वह अपनी किताबों में पानी का हिसाब दर्ज करता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शहर जाता है तो एकाध पत्रिका भी ख़रीद लाता है. पढ़कर उसे अच्छा लगता है. बचपन से उसने देवकीनंदन खत्री, वृंदावनलाल वर्मा, प्रेमचंद वगैरह के उपन्यास पढ़े हैं और पढ़ने का आनंद उठाया है. उसे कभी लालच नहीं आया. उसने किसानों की चौपालों में उनके साथ यदा-कदा हुक्का तो ज़रूर गुड़गुड़ाया, लेकिन किसी से कभी कुछ और लेने की तमन्ना नहीं रखी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने किसानों पर यकीन किया क्योंकि प्रेमचंद के उपन्यासों को पढ़कर उसकी यह समझ बनी थी कि किसान परिश्रमी भले ही नहीं, पर ईमानदार और सच्चे होते हैं. ऐसा मानकर उसने एक बार किसान पर भरोसा किया, जिसने उसे सैकड़ों रुपयों का चूना लगा दिया. वह न केवल मुफ़्त में उसके सरकारी ट्यूबवेल का पानी अपने खेतों के लिए खींचता रहा, बल्कि औरों को भी बेचता रहा. ज़रूरत से ज़्यादा चलने के कारण ट्यूबवेल की मोटर फुंक गई और असिस्टेंट इंजीनियर द्वारा अचानक की गई जाँच में वह पकड़ा गया. उस दिन उसे बहुत डर लगा. उसी दिन उसे सबसे ज़्यादा दुख हुआ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके माँ-बाप बचपन में ही चल बसे थे. उसकी बड़ी बहन ने उसे पाला-पोसा था. वह भी उसके 12वीं पास करते ही चल बसी थी. उसके बाद उसने बहुत धक्के खाए. चौकीदारी और बागवानी की. एक असिस्टेंट इंजीनियर को उस पर रहम आ गया और उसने उसे नलकूप विभाग में ऑपरेटर रखवा दिया. उसकी किस्मत अच्छी थी कि उसकी नौकरी एक के बाद दूसरे साल बढ़ती चली गई, लेकिन 11 साल की सर्विस के बाद भी वह पक्का नहीं हुआ. उसके बाद कई छोटे-मोटे काम करता हुआ 40 साल की उम्र में वह धनीराम कानूनगो के संपर्क में आया. धनीराम ने यह अहाता उसे रहने के लिए दे दिया और शर्त रखी कि वह उसकी किताबें वगैरह भर दिया करेगा. इसके बदले वह उसे पैसे भी देगा. वह चाहे तो धनीराम के घर के बाहर चबूतरे की ड्योढ़ी में बैठकर यह काम करे या इस अहाते में. उसने अहाते को चुना.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धनीराम ने सही कहा था. अहाते का दरवाज़ा अंदर की तरफ खुलता था. उस पर कोई ताला नहीं लगा था. ताला कोठरी के दरवाज़े पर था और उसमें जंग लगा था. उसे खोलने में उसे काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी थी. चाबी घूमती ही नहीं थी. उसे दम लगाना पड़ा था. कुछ नहीं हुआ था. उसने कुप्पी से तेल डाला. फिर भी नरम भी न पड़ा. दोपहर का वक़्त था. लेकिन हवा बह रही थी. पेड़ हिलते थे. इक्का-दुक्का पक्षी चहकते थे, पर नज़र नहीं आते थे. वह नीम के पेड़ के पास आकर ऊपर देखने लगा. उसे बेहद खुशी हुई. वहाँ बीसियों पक्षी बैठे थे. उसने सोचा, मैं ऐसा कुछ भी नहीं करूँगा, जिससे पक्षी परेशान हों. उसने सबसे पहले नीम के पेड़ के चारों ओर बने उस चबूतरे को साफ़ किया. चबूतरे का फर्श सीमेंट का बना था. वह कभी चिकना रहा होगा. अब उस पर ऋतुओं के धुंधले-से निशान थे. कहीं-कहीं बीच में घास दिखती थी. उस पर कुछ टूटे हुए पंख पड़े थे. पर सबसे ज़्यादा बीटें थीं. ज़रा-सी कोशिश से चबूतरे की रूह निकल आई. उसने सोचा, कोठरी न खुलती हो तो न खुले, वह पेड़ के नीचे इस चबूतरें पर अपना सामान रख देगा. जाड़े खत्म हो चुके हैं. रातें ठंडी ज़रूर हैं, लेकिन वह उन्हें बर्दाश्त कर सकता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने अहाते का चक्कर लगाया. जगह-जगह घास उग आई थी. अहाता बड़ा था. कुएँ की जगत की लकड़ी जर्जर हो गई थी. नीचे गहरा कुआँ था. उसकी दीवारें समय की खरोंचों से निरापद लग रही थीं. नीचे पुराना पानी शांत होकर ठहरा हुआ था. उसका मन हुआ, वह आवाज़ दे. उसने कुएँ में मुँह नीचा करके जोर से कहा ‘गिरधारीलाल!’ कुएँ ने तत्काल उसे स्वागत में जोर से कहा ‘गिरधारीलाल’. उसे बेहद ख़ुशी हुई. उसने सोचा, कुआँ सचमुच आत्मीयता से भरा है. इस नई जगह पर इसने ही मुझे पहली बार मुझे मेरे होने का अहसास कराया. फिर जोर से कहा ‘गिरधारीलाल’ आवाज़ उसकी ख़ुशी को संभाल नहीं पा रही थी. उसे लगा कि उसमें नया बल और नई स्फूर्ति आ गई है. तभी कोई कोई पक्षी चहचहाया. उसकी देखा-देखी कुछ और पक्षी चहचाहे. उसे लगा कि उसके स्वागत में जैसे उसके रिश्तेदार हुलस रहे हों. उसने सोचा, अब कोठरी का ताला खुल जाना चाहिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह कोठरी के दरवाज़े पर आ गया. उसने फिर चाबी घुमानी शुरू की. शायद पक्षियों और कुएँ की प्रतिक्रिया को देखकर अब ताला भी नरम पड़ गया था. ताली घूम गई. दरवाज़ा खुल गया और बाहर छोटी-सी खिड़की से देखने पर जो दिखाई नहीं देता था, वह सब भी दिखाई देने लगा. अंदर एक पुराना चित्र लगा था, जिस पर जाले फैल गए थे. एक जगह पर एक मकड़ी जैसे अटकी-सी थी. उसने शीशा साफ़ किया तो उसके पीछे एक बूढ़ी औरत का चित्र उभर आया. उसके चेहरे पर वात्सल्य और ममता की रोशनी थी, जो इतने वर्षों में भी बुझी नहीं थी. हालांकि लकड़ी का फ़्रेम कुएँ की जगत की तरह ही जर्जर था. शीशा कुछ जगह खुरदरा-सा था, लेकिन बूढ़ी औरत की तस्वीर जैसे एक आश्वस्तकारी ख़ुशी के साथ उसका स्वागत कर रही थी. यह आवाज़ भीतर से उठ रही थी. और तस्वीर में उसे उसकी मौन प्रतिध्वनि महसूस होती थी. उसे लगा कि इन कोठरी ने तो जैसे पेड़, पक्षी और कुएँ से भी ज़्यादा आत्मीयता से उसका स्वागत किया हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह कोठरी साफ़ करने में जुट गया. घंटे-डेढ़ घंटे में वह अपनी सादगी में दीप्त हो उठी. सूरज अब कोठरी के भीतर आ गया था और उसकी गर्म हवा चीज़ों के चेहरों को पोंछ रही थी. उसे लगा अब उसे धनीराम के घर से अपना सामान ले आना चाहिए. निवाड़ की चारपाई को ख़ूब झाड़-पोंछकर उसने कोठरी के बाहर धूप में रख दिया ताकि सूरज उसे उसकी तमाम गंधों से मुक्त कर अपनी निर्मल महक से सुवासित कर सके.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;10-15 दिनों में ही धनीराम कानूनगो के इस अहाते को गिरधारीलाल ने चमका डाला. कई जगह क्यारियों में गेंदे और गुलाब के पौधे लगा दिए गए. कुएँ की सफ़ाई करके उसमें पोटेशियम परमेगनेट डाल दिया गया. पानी के ज़्यादा इस्तेमाल के कारण उस पुराने कुएँ का पानी ठंडेपन और ताज़गी में अपने से पहले के हर पानी से होड़ लेने लगा. दरअसल वह स्रोत फिर से जीवंत हो गया था. जैसे ही बाल्टी कुएँ में गिरती, एक मीठी आवाज़ होती, जैसे कुएँ में कोई गाने के लिए उतावला हो. फिर लहरों में बाल्टी में घुसने की होड़ लग जाती. ऊपर आती बाल्टी से छलकता पानी जैसे अपनी ख़ुशी न संभाल पाता हो. अहा! कितने वर्षों के बाद उसका कोई इस्तेमाल कर रहा है. और इस इस्तेमाल में भी पानी को बर्बाद करने का नहीं, बल्कि बचाने का आत्मीय भाव है. कुएँ ने कोठरी से लेकर चबूतरे तक और तीनों पेड़ों से लेकर बीसियों-तीसियों पक्षियों तक में नया जीवन डाल दिया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह रोज़ पेक्षों की जड़ों में पानी देता. चबूतरे को साफ करता और धनीराम कानूनगो की किताबों में एंट्री करता रहता. उसके पास वक़्त कम हो गया था. अब उसे पढ़ने का टाइम नहीं मिलता. वह पौधों के लिए ज़्यादा वक़्त नहीं निकाल पाता. किताबें भरते-भरते उसका मन ऊब जाता तो वह चाहता कि कुएँ से बतियाए. पक्षियों की चहचहाहट सुने. कभी वह पेड़ के ऊपर चढ़ जाता. शुरू-शुरू में पक्षी डरकर उड़ जाते थे पर धीरे-धीरे वे अभ्यस्त हो गए. वह ऊपर चढ़कर उनके घोंसलों में झाँक आता. और कभी-कभी पेड़ की डाल पर बैठकर कोई पुरानी किताब पढ़ता. वहाँ कई बार उसकी आँख लग जाती. पक्षी उस पर निगाह रखते-जैसे माँ सारे काम करते हुए, अपने बच्चों पर निगाह रखती है. जैसे ही उन्हें लगता कि गिरधारीलाल गिर जाएगा, वे जोर-जोर से चहचहाने लगते. तब वह संभल जाता और पक्षियों पर आत्मीय नज़र जालते हुए पेड़ से नीचे आता. पक्षी तब जोर-जोर से चहकते जैसे वह कह रहे हों-अभी थोड़ी देर और हमारे पास बैठो! यह सोचता कि इन पक्षियों को अपने हाथों से सहलाए. उनकी आँखों में देखते हुए अपने प्रेम और करूणा की भाषा से उनके दिल में उतर जाए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीचे फिर कानूनगो के बही-खाते, रजिस्टर और किताबें उसे घूरते. उसे अपने से डर लगता. वह अंदर कोठरी में बूढ़ी अम्मा के चित्र के आगे खड़ा होकर सोच में डूब जाता. उसे लगता है, उसकी माँ भी ऐसी ही रही होगी. अपने हाथ से बनाया हुआ भोजन वह पहले पक्षियों के लिए डालता और जब पक्षी उसे खा लेते तो उसे बहुत ख़ुशी मिलती. खाना खाकर वह कुएँ से बतियाता. उसका निर्मल जल उसे तृप्त कर देता. वह अपने काम में लग जाता. बीच-बीच में पौधों और फूलों के बात करता और जब पक्षी यह देखकर रूठ जाते तो उन्हें मनाता.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; &lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;विवेक बाबू का विवाह हो चुका था. घर की बागडोर उनके हाथ में आ गई थी. उनका छोटा-सा व्यापार चल निकला था. अब वे पुरखों के अहाते को बेचकर अपना व्यापार बढ़ाना चाहते थे. वे गिरधारीलाल से कई बार कह चुके थे कि बाबूजी रिटायर हो गए हैं, तुम कहीं और ठीया ढूंढ़ लो&lt;/span&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;वर्षों वह अपने बनाए उस स्वर्ग में रहता रहा. उसे न कभी अकेलापन लगा, न वह ऊबा. वह कभी बीमार भी नहीं पड़ा. बाहरी दुनिया के साथ उसका संपर्क धनीराम कानूनगो और उनके परिवार की मार्फ़त या दुकानदारों से सौदा-सुलफ खरीदने तक ही सीमित था. सुबह जब वह नदी के पास शौच को जाता तो नदी की हालत देखकर दुखी हो जाता. नदी धीरे-धीरे मरती जा रही थी, जबकि उसके अहाते के सामने की सड़क पक्की हो गई थी. नदी पर एक रपटा बन गया था. पानी की पतली-सी धारा रपटे के नीचे से बहती थी. बरसात में पानी बढ़ने पर रपटे के ऊपर से बढ़ता. जब पानी कम हो जाता तब लोग रपटे के ऊपर से नदी पार करते थे. सड़क पर आवागमन बढ़ गया था. पासवाले मंदिर से अब घंटों की आवाज़ें ज़्यादा आती थीं. बीच में कभी-कभी धनीराम कानूनगो का बेटा विवेक वहाँ आता था. अहाते की बदली हुई हालत देखकर उसे ख़ुशी होती और उसकी आँखें चमकने लगतीं. तब किसी पक्षी की बीट टप से उसकी शर्ट पर गिर जाती. गिरधारीलाल कहता,‘‘विवेक भैया, पक्षी की बीट शुभ होती है.’’ वह अपने हाथ से शर्ट पर गिरी बीट साफ़ करता और लगभग गिरने को तैयार कोई फूल विवेक को देता. यह पता नहीं चलता कि विवेक की नाराज़गी दूर हुई या नहीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जैसे दूसरे दरवाज़ों, अहातों, घरों आदि का जीवन होता है, वैसा ही इस दरवाज़े का भी हुआ. एक दिन उसके बाहर कड़ी-कुंडा जड़ दिया गया. धनीराम रिटायर हो गए थे. घर पर उनका शासन खत्म हो गया था. विवेक बाबू का विवाह हो चुका था. घर की बागडोर उनके हाथ में आ गई थी. उनका छोटा-सा व्यापार चल निकला था. अब वे पुरखों के अहाते को बेचकर अपना व्यापार बढ़ाना चाहते थे. वे गिरधारीलाल से कई बार कह चुके थे कि बाबूजी रिटायर हो गए हैं, तुम कहीं और ठीया ढूंढ़ लो. गिरधारीलाल को इस जगह से मोह हो गया था. वह यहाँ से जाना नहीं चाहता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब तक धनीराम ज़िंदा रहे, गिरधारीलाल यहाँ बना रहा. उन्होंने विवेक को समझाया कि बेटे, मुफ्त में जगह की चौकीदारी हो रही है. अब तो हम गिरधारीलाल को तनख़्वाह भी नहीं देते. थोड़ी बहुत मदद कर देते हैं. पर उसने अहाते को वैसे ही चमकाकर रखा है. धनीराम के काम से मुक्त होने के कारण गिरधारीलाल का मन अब उस माहौल में और ज़्यादा लगता. वह पक्षियों के बीच खाना खाता. पौधों को दुलारता. तितलियों के पीछे भागता. हवा और पानी के साथ अपने संस्मरणों को याद करता और कुएँ से जब गिरधारीलाल की प्रतिध्वनि आती तो उसे अपने होने पर यकीन होता. उसे लगता कि ईश्वर ने उसे कितना सुख और ख़ुशी दी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरवाज़े के बाहर कुंडा जड़ दिए जाने के बावजूद दरवाज़ा अभी भी अंदर ही को खुलता है. वह अंदर से ही बंद होता है जैसे पहले बंद होता था. लेकिन अब कभी भी वह बाहर से बंद किया जा सकता है और उस पर ताला ठोका जा सकता है‘‘यह सोच-सोचकर गिरधारीलाल परेशान हो जाता’’ वह सोचता, क्या इस पर्यावरण के बिना वह ज़िंदा रह सकता है? वह कुएँ में जोर से अपने को पुकारता और पाता कि कुएँ की आवाज़ में अब पहले-सी बात नहीं है. उसे लगता कि पक्षियों में भी अब रूखापन है. पौधे सूख रहे हैं और कोठरी में उसे अब डर-सा लगता है. वह उदास है कि किसी ने उसकी आत्मा को उसमें से निकाल लिया है. वह एक शव है. वह अचानक कब्रिस्तान हो गया है. वहाँ अब सन्नाटा है. पक्षी सन्नाटा गाते हैं और कुएँ से सन्नाटे की प्रतिध्वनि आती है. कोठरी में सन्नाटा है. उसे अहाते से बाहर निकाल दिया गया है विवेक कह रहा है,‘‘बाबूजी ने दया करके इसे यहाँ रख लिया और इसने यहाँ पर कब्ज़ा जमा लिया है.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह नदी की ओर बढ़ रहा है. उसके पीछे अचानक पक्षियों का झुंड बढ़ा चला आ रहा है, जैसे वह ख़ुद की अपने कंधे पर अपनी अर्थी लिए जा रहा हो और पक्षी शोक में डूबे उसकी शवयात्रा में शामिल हो गए हों. कुएँ में वर्षों से उसकी सतह पर अटकी प्रतिध्वनियाँ रुक-रुककर पुकार रही हैं,‘‘गिरधारीला! गिरधारीलाल...’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;साभार - बीबीसी हिंदी &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मधुसूदन आनंद&lt;br /&gt;103-ए, गौतम नगर&lt;br /&gt;नई दिल्ली-110049&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-654605535742280164?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/654605535742280164/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/654605535742280164'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/654605535742280164'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='दरवाज़ा अंदर खुलता है'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-5159586990623096035</id><published>2009-05-31T04:57:00.000-07:00</published><updated>2009-05-31T05:07:35.014-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>शत्रुओं में फूट से अपना लाभ</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://josh18.in.com/media/images/2008/Oct/16oct_panch.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 180px;" src="http://josh18.in.com/media/images/2008/Oct/16oct_panch.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;किसी&lt;/span&gt; नगर में द्रोण नाम का एक निर्धन ब्राह्मण रहा करता था। उसका जीवन भिक्षा पर ही आधारित था। अतः उसने अपने जीवन में न कभी उत्तम वस्त्र धारण किए थे और न ही अत्यंत स्वादिष्ट भोजन किया था। पान-सुपारी आदि की तो बात ही दूर है। इस प्रकार निरंतर दुःख सहने के कारण उसका शरीर बड़ा दुबला-पतला हो गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्राह्मण की दीनता को देखकर किसी यजमान ने उसको दो बछड़े दे दिए। किसी प्रकार मांग-मांगकर उसने दोनों बछड़ों को पाला-पोसा और इस प्रकार वे जल्दी ही बड़े और हृष्ट-पुष्ट हो गए। ब्राह्मण उनको बेचने की सोच रहा था तभी उन दोनों बछड़ों को देखकर एक दिन किसी चोर ने चुरा लेने की योजना बनाई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह चोरी करने जा ही रहा था कि आधे मार्ग में उसको एक भयंकर व्यक्ति दिखाई दिया। उस व्यक्ति के प्रत्येक अंग से भयंकरता का आभास हो रहा था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसे देखकर चोर घबराकर एक बार तो वापस जाने का विचार कर बैठा, किन्तु फिर भी उसने साहस करके उससे पूछ ही लिया, “आप कौन हैं?” “मैं तो सत्यवचन नामक ब्रह्मराक्षस हूं, किन्तु तुम कौन हो?” &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“मैं क्रूरकर्मा नामक चोर हूं। मैं उस दरिद्र ब्राह्मण के दोनों बछड़ों को चुराने के उद्देश्य से घर से चला हूं।” राक्षस बोला-“मित्र! मैं छः दिनों से भूखा हूं। इसलिए चलो आज उसी ब्राह्मण को खाकर मैं अपनी भूख मिटाऊंगा। अच्छा ही हुआ कि हम दोनों के कार्य एक-से ही हैं, दोनों को जाना भी एक ही स्थान पर हैं।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार वे दोनों ही उस ब्राह्मण के घर जाकर एकान्त स्थान पर छिप गए। और अवसर की प्रतीक्षा करने लगे। जब ब्राह्मण सो गया तो उसको खाने के लिए उतावले राक्षस से चोर ने कहा, “आपका यह उतावलापन अच्छा नहीं है। मैं जब बछड़ों को चुराकर यहां से चला जाऊँ तब आप उस ब्राह्मण को खा लेना।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राक्षस बोला, “बछड़ों के रम्भाने से यदि ब्राह्मण की नींद खुल गई तो मेरा यहां आना ही व्यर्थ हो जाएगा।” “और ब्राह्मण को खाते समय कोई विघ्न पड़ गया तो मैं बछड़ों को फिर किस प्रकार चुरा पाऊंगा। इसलिए पहले मेरा काम होने दीजिए।” इस प्रकार उन दोनों का विवाद बढ़ता ही गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ समय बाद दोनों जोर-जोर से चिल्लाने लगे। आवाज सुनकर ब्राह्मण की नींद खुल गई। उसे जगा हुआ देखकर चोर उसके पास गया और उसने कहा, “ब्राह्मण! यह राक्षस तुम्हें खाना चाहता है।” यह सुनकर राक्षस उसके पास जाकर कहने लगा, “ब्राह्मण! यह चोर तुम्हारे बछड़ों को चुराकर ले जाना चाहता है।” &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक क्षण तक तो ब्राह्मण विचार करता रहा, फिर उठा और चारपाई से उतरकर उसने इष्ट देवता का स्मरण किया। उसने मंत्र-जप किया और उसके प्रभाव से उसने राक्षस को निष्क्रिय कर दिया। फिर उसने लाठी उठाई और उससे चोर को मारने के लिए दौड़ा। चोर वहां से भाग खड़ा हुआ। इस प्रकार उसने अपने बछड़े भी बचा लिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साभारः पंचतंत्र की कहानियां&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-5159586990623096035?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/5159586990623096035/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_5125.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/5159586990623096035'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/5159586990623096035'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_5125.html' title='शत्रुओं में फूट से अपना लाभ'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-4697788245779131704</id><published>2009-05-31T04:54:00.000-07:00</published><updated>2009-05-31T04:56:35.127-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>भली सीख न मानने का बुरा फल</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://josh18.in.com/media/images/2008/Nov/04nov_panch.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 180px;" src="http://josh18.in.com/media/images/2008/Nov/04nov_panch.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;किसी स्थान पर उद्धत नाम का एक गधा रहता था। दिनभर वह धोबी के साथ रहकर उसके कपड़े ढोता था। रात को धोबी उसको छोड़ देता था और वह मनमाना इधर-उधर घूमा करता था। प्रातःकाल होते ही वह स्वयं ही धोबी के घर पर आ उपस्थित होता जिससे कि धोबी उस पर विश्वास करके उसको कभी बांधता नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार किसी दिन रात को खेत में चलते हुए उसकी मित्रता एक श्रृंगाल (सियार) से हो गई। गधा खेत की बाड़ तोड़ने में निपुण था। इस प्रकार बाड़ तोड़कर वह खेत में घुसकर श्रृंगाल के साथ ककड़ियां खाया करता था। प्रातःकाल दोनों अपने-अपने स्थान पर चले जाया करते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन उस गधे ने श्रृंगाल ने कहा, “भानजे! देखो, आज की रात कितनी सुहानी है। चन्द्रमा चमक रहा है, बयार बह रही है, भीनी-भीनी सुगन्ध आ रही है। ऐसे में मेरा मन गाना गाने को कर रहा है। बताओ कौन से राग का गाना गाऊं?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रृंगाल बोला, “मामा! क्यों व्यर्थ में आपत्ति को निमंत्रण दे रहे हो? हम लोग यहां चोरी करने आए हैं। चोरों और व्यभिचारियों को चाहिए कि वे स्वयं को छिपाकर रखें। कहते हैं कि जिस व्यक्ति को खांसी आती हो उसको दूसरी स्त्री के पास नहीं जाना चाहिए और जो व्यक्ति रोगी हो उसको अपनी जीभ पर नियंत्रण रखना चाहिए।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“और मामा! आपका स्वर भी तो मधुर नहीं है। उसे सुनकर खेत के रखवाले जाग जाएंगे। तब फिर वे या तो आपको मार डालेंगे या फिर बांध देंगे। इसलिए चुपचाप अमृत के समान इन ककड़ियों को खाओ, गाने-वाने के फेर में मत पड़ो।” &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गधा कहने लगा, “तुम जंगली हो न इसलिए संगीत के विषय में तुम्हें न कोई ज्ञान है और न ही तुमको उसमें मजा आता है।” “मामा! शायद तुम ठीक कहते हो। किन्तु तुम्हें ही गाना कहां आता है, तुम तो रेंकते हो।” &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“क्या मूर्खता की बातें करता है! तू कहता है मुझे गाना नहीं आता और मैं कहता हूं कि मुझे सारा संगीत-शास्त्र कंठस्थ है। स्वर क्या होते हैं, उनके कितने भेद होते हैं, उन भेदों को क्या कहते हैं आदि-आदि। फिर भी तुम कहते हो कि मुझे गाना नहीं आता?” श्रृंगाल समझ गया कि गधे को गाने की सूझी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अतः उसने कहा, “मामा! यदि यही बात है तो मैं इस बाड़े के बाहर बैठकर खेत की रखवाली करता हूं, तुम निश्चिंत होकर अपना गाना गाओ।” श्रृंगाल खेत के बाहर होकर सुरक्षित स्थान पर बैठ गया। उसके जाते ही गर्दभ ने रेंकना आरम्भ किया। जल्द ही उसकी आवाज को सुनकर खेत का रखवाला क्रोध से पागल होकर दौड़ा हुआ आया। खेत में जब उसने गधे को देखा तो उसको इतना मारा, इतना मारा कि वह वहीं पर चित हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रखवाले को इतने ही में सन्तोष नहीं हुआ। उसने उस गधे के गले में एक भारी ऊखल बांध दी और स्वयं निश्चंत होकर सो गया। रखवाले के जाते ही गधा उठ गया। कहते हैं कि कुत्ते, घोड़े और खासकर गधे को मार की पीड़ा कुछ ही क्षणों तक रहती है। गधा उस ऊखल के साथ खेत के बाहर जाने लगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस समय श्रृगाल बोला, “मामा! मैंने कितना मना किया था किन्तु तुम माने नहीं। अब देखो कितना सुन्दर मणि उपहार रूप में तुम्हारे गले में लटका हुआ मिल गया है।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी ने ठीक ही कहा है जो स्वयं बुद्धिहीन हो और मित्र का कहना भी न माने वह व्यक्ति मुसीबत में पड़ जाता है।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(साभारः पंचतंत्र की कहानियां&lt;/span&gt;किसी स्थान पर उद्धत नाम का एक गधा रहता था। दिनभर वह धोबी के साथ रहकर उसके कपड़े ढोता था। रात को धोबी उसको छोड़ देता था और वह मनमाना इधर-उधर घूमा करता था। प्रातःकाल होते ही वह स्वयं ही धोबी के घर पर आ उपस्थित होता जिससे कि धोबी उस पर विश्वास करके उसको कभी बांधता नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार किसी दिन रात को खेत में चलते हुए उसकी मित्रता एक श्रृंगाल (सियार) से हो गई। गधा खेत की बाड़ तोड़ने में निपुण था। इस प्रकार बाड़ तोड़कर वह खेत में घुसकर श्रृंगाल के साथ ककड़ियां खाया करता था। प्रातःकाल दोनों अपने-अपने स्थान पर चले जाया करते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन उस गधे ने श्रृंगाल ने कहा, “भानजे! देखो, आज की रात कितनी सुहानी है। चन्द्रमा चमक रहा है, बयार बह रही है, भीनी-भीनी सुगन्ध आ रही है। ऐसे में मेरा मन गाना गाने को कर रहा है। बताओ कौन से राग का गाना गाऊं?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रृंगाल बोला, “मामा! क्यों व्यर्थ में आपत्ति को निमंत्रण दे रहे हो? हम लोग यहां चोरी करने आए हैं। चोरों और व्यभिचारियों को चाहिए कि वे स्वयं को छिपाकर रखें। कहते हैं कि जिस व्यक्ति को खांसी आती हो उसको दूसरी स्त्री के पास नहीं जाना चाहिए और जो व्यक्ति रोगी हो उसको अपनी जीभ पर नियंत्रण रखना चाहिए।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“और मामा! आपका स्वर भी तो मधुर नहीं है। उसे सुनकर खेत के रखवाले जाग जाएंगे। तब फिर वे या तो आपको मार डालेंगे या फिर बांध देंगे। इसलिए चुपचाप अमृत के समान इन ककड़ियों को खाओ, गाने-वाने के फेर में मत पड़ो।” &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गधा कहने लगा, “तुम जंगली हो न इसलिए संगीत के विषय में तुम्हें न कोई ज्ञान है और न ही तुमको उसमें मजा आता है।” “मामा! शायद तुम ठीक कहते हो। किन्तु तुम्हें ही गाना कहां आता है, तुम तो रेंकते हो।” &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“क्या मूर्खता की बातें करता है! तू कहता है मुझे गाना नहीं आता और मैं कहता हूं कि मुझे सारा संगीत-शास्त्र कंठस्थ है। स्वर क्या होते हैं, उनके कितने भेद होते हैं, उन भेदों को क्या कहते हैं आदि-आदि। फिर भी तुम कहते हो कि मुझे गाना नहीं आता?” श्रृंगाल समझ गया कि गधे को गाने की सूझी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अतः उसने कहा, “मामा! यदि यही बात है तो मैं इस बाड़े के बाहर बैठकर खेत की रखवाली करता हूं, तुम निश्चिंत होकर अपना गाना गाओ।” श्रृंगाल खेत के बाहर होकर सुरक्षित स्थान पर बैठ गया। उसके जाते ही गर्दभ ने रेंकना आरम्भ किया। जल्द ही उसकी आवाज को सुनकर खेत का रखवाला क्रोध से पागल होकर दौड़ा हुआ आया। खेत में जब उसने गधे को देखा तो उसको इतना मारा, इतना मारा कि वह वहीं पर चित हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रखवाले को इतने ही में सन्तोष नहीं हुआ। उसने उस गधे के गले में एक भारी ऊखल बांध दी और स्वयं निश्चंत होकर सो गया। रखवाले के जाते ही गधा उठ गया। कहते हैं कि कुत्ते, घोड़े और खासकर गधे को मार की पीड़ा कुछ ही क्षणों तक रहती है। गधा उस ऊखल के साथ खेत के बाहर जाने लगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस समय श्रृगाल बोला, “मामा! मैंने कितना मना किया था किन्तु तुम माने नहीं। अब देखो कितना सुन्दर मणि उपहार रूप में तुम्हारे गले में लटका हुआ मिल गया है।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी ने ठीक ही कहा है जो स्वयं बुद्धिहीन हो और मित्र का कहना भी न माने वह व्यक्ति मुसीबत में पड़ जाता है।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(साभारः पंचतंत्र की कहानियां&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-4697788245779131704?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/4697788245779131704/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_1627.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/4697788245779131704'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/4697788245779131704'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_1627.html' title='भली सीख न मानने का बुरा फल'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-3879086891249769556</id><published>2009-05-31T04:52:00.000-07:00</published><updated>2009-05-31T04:54:40.737-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>छोटे का भी साथ भला  भेजें</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://josh18.in.com/media/images/2008/Nov/12nov_crab.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 180px;" src="http://josh18.in.com/media/images/2008/Nov/12nov_crab.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;किसी नगर में ब्रह्मदत्त नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसको किसी आवश्यक कार्य से एक दिन किसी अन्य ग्राम को जाना था। उसने जब अपनी माता से गांव जाने की बात कही तो उसकी मां ने कहा, “अकेले मत जाना, किसी को साथ ले लेना।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेटा बोला, “मां! चिन्ता मत करो। रास्ता भी ठीक ही है और मुझे जाना जरूरी है, इसलिए अकेला ही जा रहा हूं।” मां का मन नहीं माना। वह समीप के जलाशय में गई और वहां से एक केकड़े को पकड़ लाई। उसे अपने पुत्र को देती हुई बोली, “बेटा! लो, इसे साथ ले लो। मार्ग में यह तुम्हारा सहायक सिद्ध होगा।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माता की आज्ञा मानकर उसने उस केकड़े को लिया और कपूर की डिबिया में रखकर उसे थैले में डाल दिया। इस प्रकार वह वहां से चला गया। कुछ दूर जाने पर जब दोपहर की धूप बड़ी तेज हो गई तो वह रास्ते में एक छायादार वृक्ष के नीचे बैठकर विश्राम करने लगा। उसे उसी प्रकार विश्राम करते हुए नींद आ गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ देर बाद वृक्ष के कोटर से एक सर्प निकला और वह ब्राह्मण के पास आया। सर्प को कपूर की महक अच्छी लगती है। उसने उस ब्राह्मण को तो नहीं छेड़ा पर उसके थैले को फाड़कर कपूर तक पहुंच गया। उसने ज्यों ही कपूर की डिबिया खोली कि केकड़े ने बाहर निकलकर उस सर्प को मार डाला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नींद खुलने पर ब्राह्मण की दृष्टि वहां पर मरे पड़े सर्प पर गई। समीप ही कपूर की डिबिया खुली थी। ब्राह्मण समझ गया कि इस केकड़े ने ही सर्प को मारा होगा। उस समय उसको माता का कथन याद हो आया। तब उसको अपने सहयात्री का महत्व भी समझ में आ गया। उसके बाद उस ब्राह्मण ने अपनी आगे की यात्रा पूर्ण की। इसलिए कहा जाता है कि यात्रा के समय साथ में रहने वाला अत्यन्त निर्बल व्यक्ति भी सहायक ही होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(साभारः पंचतंत्र की कहानियां&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-3879086891249769556?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/3879086891249769556/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_31.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/3879086891249769556'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/3879086891249769556'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_31.html' title='छोटे का भी साथ भला  भेजें'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-5737167323652774305</id><published>2009-05-30T04:39:00.000-07:00</published><updated>2009-05-30T04:42:11.269-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रेरणा स्रोत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जिज्ञासा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उपलब्धि'/><title type='text'>काव्या बनीं 'स्पेलिंग बी' चैंपियन</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2009/05/20090530094946kavya203.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 203px; height: 200px;" src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2009/05/20090530094946kavya203.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अमरीका के कैंसस में रहने वाली भारतीय मूल की काव्या शिवशंकर ने मशहूर 'स्क्रिप्स स्पेलिंग बी' चैंपियंस ख़िताब जीत लिया है. 13 साल की काव्या ने महीनों के प्रशिक्षण के बाद नौ शब्दों की सही स्पेलिंग बताई और विजेता बनीं.&lt;br /&gt;प्रतियोगिता में कुल मिलाकर 293 प्रतिस्पर्धियों ने हिस्सा लिया. इनमें 28 प्रतियोगी ग़ैर-अमरीकी देशों के भी थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आख़िरी दौर में काँटे की टक्कर हुई, लेकिन बाज़ी काव्या के हाथ लगी. उन्होंने ‘laodicean’ शब्द की सही स्पेलिंग बताई और ख़िताब पर कब्ज़ा किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रतियोगिता की ख़ासियत ये है कि इसमें भारतीय मूल के अमरीकियों का जलवा रहा है. पिछले 11 वर्षों में वह भारतीय मूल की सातवीं अमरीकी हैं, जिन्हें चैंपियन बनने का गौरव हासिल हुआ है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;दबदबा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रतियोगिता में नौ से 15 साल की उम्र के छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया. दिलचस्प तथ्य ये है कि 33 प्रतियोगियों की मुख्य भाषा अँगरेज़ी नहीं थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काव्या पहले भी तीन बार इस प्रतियोगिता के टॉप 10 में पहुँच चुकीं थीं, लेकिन उन्हें ख़िताब नहीं मिल सका था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; मुझे यक़ीन ही नहीं हो रहा है. ऐसा नहीं लगता कि सचमुच में ऐसा हुआ है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;काव्या शिवशंकर&lt;br /&gt;काव्या को पुरस्कार के रूप में एक चमचमाती ट्रॉफ़ी के अलावा 30 हज़ार डॉलर का नक़द इनाम भी मिला.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़िताब जीतने के बाद काव्या ने कहा, “मुझे यक़ीन ही नहीं हो रहा है. ऐसा नहीं लगता कि सचमुच में ऐसा हुआ है.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काव्या की माँ मिर्ले भी अपनी बेटी की इस उपलब्धि से गदगद हैं. उन्होंने कहा, “ये किसी सपने के सच होने जैसा है. हम इस लम्हे का इंतज़ार कर रहे थे.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो कहती हैं, “हमने खाना-पीना नहीं छोड़ा था. ऐसा भी नहीं था कि हमें नींद नहीं आ रही थी, लेकिन हमारा लोगों से मिलना-जुलना बहुत कम हो गया था.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काव्या ने इस प्रतियोगिता के लिए कड़ी मेहनत की और गहन प्रशिक्षण लिया. यही वजह रही कि माता-पिता काव्या का जन्मदिन भी नहीं मना सके.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काव्या कहती हैं, “स्पेलिंग मेरे जीवन में बहुत मायने रखती हैं.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनका कहना है कि वो न्यूरोसर्जन बनना चाहती हैं, लेकिन स्पेलिंग की जगह कोई नहीं ले सकता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और जब ‘acrocephaly’, ‘glossopharyngeal’ और ‘vestibulocochlear’ जैसे शब्द न्यूरोसर्जरी से जुड़े हों, तो काव्या को फ़िक्र करने की क्या ज़रूरत है&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-5737167323652774305?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/5737167323652774305/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_30.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/5737167323652774305'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/5737167323652774305'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_30.html' title='काव्या बनीं &apos;स्पेलिंग बी&apos; चैंपियन'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-5452196308537126114</id><published>2009-05-29T04:08:00.000-07:00</published><updated>2009-05-29T04:15:24.176-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सेहत'/><title type='text'>यूं कम हो जाएगी टीवी देखने की आदत</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.saidaonline.com/en/newsgfx/kid%20watching%20tv.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 500px; height: 334px;" src="http://www.saidaonline.com/en/newsgfx/kid%20watching%20tv.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अमरीकन अकादमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के अनुसार बारह वर्ष तक के बच्चों को प्रतिदिन एक घंटे से अधिक टेलीविजन नहीं देखना चाहिए। यदि आपका बच्चा इससे अधिक समय तक टीवी देखता है तो उसे मोटापे व आंख की समस्या हो सकती है। इसके अलावा उसकी क्रियेटिविटी भी कम हो जाती है। आइये, हम आपको बताते हैं कि बच्चों को ज्यादा टीवी देखने से कैसे रोका जाए&lt;br /&gt;* अपने बच्चे के टीवी देखने की समय सीमा निर्धारित करें। यदि यह सीमा एक घंटे है तो बच्चों को समझाएं कि इससे ज्यादा टीवी देखने के लांगटर्म में क्या नुकसान हैं।&lt;br /&gt;* अपने लिए भी टीवी देखने की समय सीमा बनायें और इसका कड़ाई से पालन करें। आपको देखकर बच्चा प्रेरित होगा। &lt;br /&gt;* बच्चा जब आपके कहने के अनुसार निर्धारित समय तक टीवी देखने लगे, तो उसकी तारीफ करें। यह बात अपने पडोसियों, बच्चों के ग्रैण्ड पैरेन्ट्स, दोस्तों और शिक्षकों को बतायें, जब सभी उसकी तारीफ करेंगे तब बच्चा इस आदत को खुशी-खूशी बनाये रखेगा।&lt;br /&gt;* बच्चे से पूछें कि उसको कौन से शो ज्यादा पसंद है। उस शो की रिकाडग कर लें और बाद में बच्चों को दिखायें। रिकार्डेड शो दिखाते समय कर्मिशयल ब्रेक में दिखाये जाने वाले विज्ञापनों को फास्ट फारवर्ड कर दें। इससे टीवी का तीस मिनट का शो आप बीस मिनट में बच्चे को दिखा देंगे।&lt;br /&gt;* बच्चों के कमरे या बेडरूम में कभी भी टेलीविजन न रखें, क्योंकि आपके सोने के बाद बच्चे टीवी देख सकते हैं। टीवी हमेशा कॉमन प्लेस में रखें, ताकि बच्चे क्या देख रहे हैं, यह निगरानी घर का कोई भी सदस्य कर सके। लेकिन ध्यान रखें- बच्चे को यह न पता चले कि उस पर नजर रखी जा रही है अन्यथा वह विद्रोही हो सकता है।&lt;br /&gt;* टेलीविजन के सामने सोफा या बेड न रखें क्योंकि सोफा रखने पर बच्चा आराम से बैठकर या लेटकर देर तक टीवी देख सकता है। टीवी के पास चेयर रखी जानी चाहिए।&lt;br /&gt;* बच्चों को यह बतायें कि टेलीविजन में दिखायी जाने वाली हर चीज सच नहीं होती। हिसा से भरे कार्यक्रम वास्तविक जिन्दगी की तस्वीर नहीं हैं। केवल शैक्षिक कार्यक्रमों से सीख लेनी चाहिए और मनोरंजक शो केवल मनोरंजन के लिए होते हैं, उन्हें अपने जीवन में उतारना नहीं चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-5452196308537126114?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/5452196308537126114/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_29.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/5452196308537126114'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/5452196308537126114'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_29.html' title='यूं कम हो जाएगी टीवी देखने की आदत'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-4303442755175536703</id><published>2009-05-28T08:11:00.000-07:00</published><updated>2009-05-28T08:20:57.224-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पहेली'/><title type='text'>बूझो तो जाने</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.school-clipart.com/_small/0511-0807-0912-2349.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 350px; height: 306px;" src="http://www.school-clipart.com/_small/0511-0807-0912-2349.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अक्सर बुरा तनाव होता है&lt;br /&gt;लेकिन मैं गुणकारी,&lt;br /&gt;जल पर चीजो को तैरा दूँ&lt;br /&gt;जिससे करता यारी  |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं ऐसा गुण होता बच्चों&lt;br /&gt;जो विधुत उपजाए,&lt;br /&gt;उपस्थित आवेशो की भी&lt;br /&gt;मेरा गुण दिखलाए |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्वेत प्रकाश साथ रंगों का&lt;br /&gt;पुंज जगत में प्यारा,&lt;br /&gt;क्या कहते हैं सोच-समझकर &lt;br /&gt;बोलो नाम हमारा |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पानी के तल पर क्यों सिक्का &lt;br /&gt;उठा हुआ है दिखता,&lt;br /&gt;मैं हूँ घटना कौन, हाथ &lt;br /&gt;इसमें मेरा ही मिलता?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अति साधारण हूँ मशीन मैं &lt;br /&gt;काम तुम्हारे आऊं,&lt;br /&gt;कपडे काटूं, दुरी नापूं &lt;br /&gt;सुविधाएँ दे जाऊं |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तर - पृष्ट तनाव, घर्सन, वर्णक्रम, अपवर्तन, उत्तोलक&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-4303442755175536703?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/4303442755175536703/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_28.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/4303442755175536703'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/4303442755175536703'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_28.html' title='बूझो तो जाने'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-93431712916048272</id><published>2009-05-27T06:11:00.000-07:00</published><updated>2009-05-27T06:15:40.301-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>माई इंडिया - गोवर्धन यादव</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://tbn2.google.com/images?q=tbn:JujWUwqxtV5OVM:http://www.asiaa.sinica.edu.tw/~aru/india_map.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 109px; height: 120px;" src="http://tbn2.google.com/images?q=tbn:JujWUwqxtV5OVM:http://www.asiaa.sinica.edu.tw/~aru/india_map.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;ब्लेकबोर्ड पर हिन्दुस्तान का नक्शा बनाकर शहरों का नाम लिख रहा था। दिल्ली को चिन्हित कर दिल्ली भर लिख पाया था कि तभी एक हवाईजहाज स्कूल के ऊपर से घरघराता निकल गया। क्लास के बच्चों का ध्यान उस तरफ जाना स्वाभाविक था। थोड़ी देर पश्चात् वह फिर से स्कूल के ऊपर से गुजरा और आगे जाकर लौट आया। उसने पूरे गांव के तीन-चार चक्कर लगाए और जमीन पर उतरने लगा। हवाईजहाज को नजदीक से देखने की प्रबल इच्छा को बच्चे दबा नहीं पाये, मैं कुछ कहूं इससे पूर्व वे अपनी कक्षा छोड़कर बाहर इकट्ठे होकर शोर मचाने लगे।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     आकाश में उड़ रहा वह एक हेलीकाप्टर था जो धीरे-धीरे जमीन की ओर बढ़ रहा था। उसके विशाल डैने अब भी तेजी से चक्करधन्नी काट रहे थे। सूखे पत्ते फरफराकर आकाश में ऊंचा उड़ने लगे और धूल का एक बड़ा गुबार उठने लगा। हेलीकाप्टर अब नीचे आ चुका था। उसके बड़े-बड़े पंख अब भी चारों ओर चक्कर काट रहे थे। आदिवासी महिलाएं एवं पुरुष अपनी-अपनी झोपड़ी छोड़कर अन्यत्र भागकर एवं पेड़ों की आड़ में छुपकर नजारा देखने लगे। शायद वे भयभीत हो गए थे। कुछ आदिवासी महिलाएं अपने दूध पीते बच्चों को बंदरिया की तरह छाती से चिपकाए बाहर आकर खड़ी हो गईं और विस्मित नजरों से नजारा देखने में लग गईं। घुटने से ऊपर और कमर के नीचे मैली-कुचैली साड़ी के छोर को बांध रखा था और शेष से अपनी पीठ तथा उरोजों को ढांक रखा था। एक शिशु ने तो साड़ी का छोर हटाया और सूखे से लटके वक्ष को चूसने लगा। उसके उरोज कब छिटककर बाहर आ गए इसका तनिक भी ध्यान उसे नहीं रहा क्योंकि वह उतरते जहाज को देखने में तल्लीन थी।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     हेलीकाप्टर के विशाल डैने अब थम चुके थे। हवा में उड़ रहे सूखे पत्ते धरती पर आकर गिरने लगे। धूल का गुब्बार अब शांत पड़ गया था। हेलीकाप्टर अब सभी को साफ-साफ नजर आने लगा था।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     हेलीकाप्टर के उतरते समय जो तेज हवा का झोंका आया उससे स्कूल की एक चौथाई दीवार जो गिरने-गिरने को हो रही थी भरभराकर गिर पड़ी। मैं मन ही मन उस जहाज को और उसमें सवार चालक को कोस रहा था। पर तुरंत ही उन्हें धन्यवाद भी देने लगा कि यदि कक्षा चल रही होती और उस समय वह दीवार सरकती तो न जाने कितने बच्चे अपाहिज हो जाते अथवा मर जाते।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     हेलीकाप्टर का दरवाजा खुला। 6-6½ फिट का एक कद्दावर अधेड़-नौजवान सफेद झक धोती-कुर्ता, सिर पर गांधी टोपी लगाये, आंखों पर बेशकीमती ऐनक चढ़ाए जमीन पर उतरने का उपक्रम कर रहा था। उसके चमचमाते जूते दूर से ही दिखलाई पड़ते थे। उसने उतरकर अपनी कमर पर हाथ रखा और एकटक हम लोगों की ओर देखने लगा। उसने चारों तरफ नजर फैलाई। दूर-दूर तक नंगे-अधनंगे बच्चे एवं आदिवासी महिलाएं पुरुष घेरा बनाये टुकुर-टुकुर देख रहे थे। काफी देर तक वह वैसा ही खडा रहा। मेरे मन के अन्दर भारतीय परम्पराएं हिलोरे ले रही थीं। मैंने आगे बढ़कर दोनों हाथ जोड़कर भारतीय मुद्रा में नमस्ते की। अब उसके शरीर में कुछ हरकतें हुईं। उसने कमर पर से हाथ अलग किए और दोनों हाथ जोड़कर मेरा अभिनंदन स्वीकार किया। मैं अब उसके नजदीक पहुंचने का उपक्रम करता हूं। उसने दोनों हाथ आगे बढ़ा दिए और मेरे बढते हाथों को अपने मजबूत हाथों से जोड़ दिया।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     मैंने सुस्वागतम-सुस्वागतम कहते हुए अपनी ओर से बात करने की पहल की, ''देखिए श्रीमान... इस गोंड़ी बस्ती में जाहिर है कि यहां न तो सर्किट हाउस है और न ही रेस्ट हाउस, मेरा अपना मकान उसे झोंपड़ा ही कहना ठीक होगा (हाथों का इशारा करते हुए) वो रहा, चलिए वहीं चलते हैं। आप चलकर विश्राम कीजिए और अपनी सेवा करने का मौका दीजिए।''&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     मैं आगे-आगे और वह मेरे पीछे यंत्रवत् चला आ रहा था। हमारे पीछे आदिवासी बच्चे महिलाएं एवं पुरुषों की भीड़ एक घेरा बनाते हुए चली आ रही थी। सामने दालान में एक कुर्सी, जिसका एक हत्था कई महीने पहले टूट चुका था, धूल-धूसरित पड़ी थी। अपने कंधे पर लटके गमछे से मैंने कुर्सी साफ की और उनसे बैठने का निवेदन किया। बाड़ी के उस तरफ खड़ी भीड़ अंदर की प्रत्येक गतिविधियों को देख रही थी।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     कुर्सी पर बैठने के बाद उन्होंने अपने माथे पर चू आया पसीना पोंछना शुरू किया। इसी बीच मैंने नजदीक पड़ी चारपाई को बिछाया और एक कोने में बैठ अपनी जोरू को आवाज लगाते हुए कहा, ''अरी सुनती हो भागवान्, देखो हमारे यहां कौन आया है। भाई चायपान की कुछ तो व्यवस्था करो।'' हमारे घर पहुंचने के पहले ही वह पिछवाड़े से होते हुए घर पहुंच गई थी।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     एक स्टील की प्लेट में पानी से भरे गिलास लेकर वो बाहर निकली और कहने लगी, ''दादाजी, लीजिए पानी पीजिए, कुएं का ताजा पानी है, एकदम ठंडा है।''&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     तभी मेरी चेतना जागी और मैंने तपाक् से कहा, ''श्रीमान, आप हेलीकाप्टर के साथ मिनरल वाटर लाए होंगे। किसी को भेजकर बुलवा लेते हैं। कुएं का पानी क्या आप पी पाएंगे? कहीं गला खराब हो गया तो यहां न तो कोई डॉक्टर है न ही कोई नाड़ी पकड़ वैद्य।''&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     मेरा इतना कहना ही था कि वे ठहठहाकर हंस पड़े और पानी का ग्लास उठाते हुए उन्होंने पूछा, ''मैं तो आपका परिचय लेना ही भूल गया। अच्छा ये बताइए आपका क्या नाम है और आप यहां क्या करते हैं?''&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     ''जी सर, मेरा नाम गोवर्धन है। मैं यहां पर विगत 20 साल से प्राइमरी में पढ़ा रहा हूं।'' मैंने कहा।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     'अच्छा-अच्छा तो तुम मास्टर हो, तभी इतना अच्छा बोल बता लेते हो। (और पानी से हलक गीला करते हुए) अच्छा तो ये बताओ मासाब कितने शिक्षक हैं यहां पर?'&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     'मुझे मिलाकर कुल चार।'&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     'और तो दिखाई नहीं पड़ते।'&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     'दरअसल बात ये है श्रीमान् कि वे दूर शहर से आते हैं। दो-चार माह में एकाध बार आ जाते हैं। वो भी तनखाह लेने के लिए। तनखाह लेकर गए कि फिर पता नहीं कब आ पाएंगे?'&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     'क्यों? वे स्कूल नहीं आते तो फिर करते क्या हैं?'&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     'ऐसा है श्रीमान्, एक मासाब ने अपनी पत्नी के नाम डाकघर बचत योजना के अंतर्गत एजेन्सी ले रखी है। जाहिर है कि वे पैसा क्लेक्शन में व्यस्त हो जाते हैं। दूसरे ने अपनी शोभा कन्स्ट्रक्शन कंपनी खोल रखी है। ठेकेदारी करते हैं। मकानबिल्डिंगें आदि बनवाते हैं। और तीसरे मासाब हमारी यूनियन के लीडर हैं। ये हम लोगों के हक के लिए सरकार से लड़ते रहते हैं। उन्हीं की मेहनत का फल है कि अब हमारी अच्छी तनखाह बनने लगी है,' मैंने कहा।&lt;br /&gt;     ''तो तुम मास्टरी के अलावा कुछ नहीं करते?''&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     ''नहीं श्रीमान् नहीं। मैं कुछ भी नहीं कर पाया। कोरा मास्टर बना बैठा हूं। गांधीजी ने एक बार आम सभा को संबोधित करते हुए कहा था कि पढ-लिखकर गांवों में चले जाना चाहिए। वहां ग्रामवासियों को भी शिक्षित बनाना चाहिए तभी हिन्दुस्तान में सही आजादी आ पायेगी। पता नहीं उनकी बात सुनकर मुझ पर क्या पागलपन छाया कि मैं शहर छोड़कर गांव आ गया। और फिर यहां का ही होकर रह गया। सुना है कि सरकार शिक्षकों का सम्मान करती है। तभी से श्रीमान मेरी भी एक इच्छा है कि मुझे राष्ट्रपति जी से विशेष सम्मान मिले।''&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     ''जैसा कि मैं देख भी रहा हूं कि तुमने गांव के लिए काफी कुछ किया है। तुम्हें अब तक तो सम्मान मिल जाना चाहिए था।''&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     थूक से गला तर करते हुए मैंने कहा, ''श्रीमान्, अभी तक आपने अपना परिचय नहीं दिया और हम हैं कि बड़बड़ किए जा रहे हैं।'' इसी बीच पत्नी ने हांक लगाई, ''अजी सुनते हो, वो डिराईवर साहब कब के बाहर खड़े हैं, तनिक उन्हें अंदर तो बुला लो।''&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     अपनी भूल को छिपाते हुए मैं खीं-खीं करके हंस पड़ता हूं और उनसे अंदर आने को कहता हूं। फिर पत्नी की ओर मुखातिब होते हुए मैंने उन्हें समझाया कि जीप-मोटर चलाने वाले को ड्राईवर और हवाईजहाज चलाने वाले को पायलट कहते हैं।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     मैं कुछ निर्देश दूं इससे पूर्व ही वह गरमा-गरम पकौड़े और चाय लेकर आई। एक हिलिंग डूलिंग मेज पर उन्होंने प्लेट करीने से जमा दिया और एक तरफ पानी से भरे गिलास एवं एक लोटा।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     पकौड़ों की प्लेट उनकी और पायलट साहब की ओर बढ़ाते हुए मैंने अपनी बात जारी रखी, ''तो श्रीमान् अपना परिचय तो दीजिए।''&lt;br /&gt;     ''मासाब मेरा नाम भारत है।''&lt;br /&gt;     ''जाहिर है कि आप मनोज कुमार तो नहीं हैं मैंने उनकी फिल्म देखी है। मैं रूबरू तो नहीं, पर उन्हें पहचानता जरूर हूं।''&lt;br /&gt;     ''अरे नहीं भई मेरा नाम भारत है भारत। तुम चाहो तो मुझे हिन्दुस्तान भी कह सकते हो या फिर मॉय इंडिया।''&lt;br /&gt;     'अरे आप तो अच्छा-खासा मजाक भी कर लेते हैं,'' मैंने दांत निपोरते हुए कहा।&lt;br /&gt;     'तुम मुझे भारत मानने को तैयार नहीं इसमें मेरा क्या कसूर है। तुम मान लो तब भी और न मानो तब भी मैं भारत हूं और भारत ही रहूंगा।'&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     'अच्छा भाई भारत ही सही। पर ये तो बताइए आप रहने वाले कहां के हैं और आपकी उम्र क्या है? आप क्या करते हैं? हेलीकाप्टर में बैठकर आए हैं जाहिर है कि आप बहुत बड़े बिजनेस मैन हैं अथवा कोई धन्ना सेठ?'&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     'सुनिए मासाब, मैं किसी एक प्रदेश में रहता हूं तो बताऊं (आकाश की तरफ सिर उठाकर देखते हुए) मैं तो सारे प्रदेशों में एक साथ रहता हूं वैसी मेरी उमर तो हजारों हजार साल की है और वर्तमान में 50 वर्षों की। मेरे हजारों-लाखों की तादाद में बच्चे हैं। कई बडे-बड़े कल कारखाने चला रहे हैं तो कई खेती कर रहे हैं यानि सुई से लेकर हवाईजहाज तक बनाते हैं। मैं उनकी मेहनत-मशक्कत से काफी खुश हूं और साथ ही दुखी भी हूं।'&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     'दुख किस बात का श्रीमान्?' मैंने पूछा।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     'कुछ ऐसी भी निठल्ली बेईमान औलाद निकली जिसने मेरी नजरों से छुपाकर करोड़ों-अरबों का गोलमाल किया। यहां तक कि भोली-भाली जनता को मेरे प्रिय गांधी के नाम का हवाला देकर बड़े-बड़े हवाला कांड खड़े कर दिए और न जाने सहस्रों रुपयों के घोटालों का पहाड़ भी खड़ा कर दिया। नकली चमक-दमक के चक्कर में विदेशों से भी कर्जा लेने लगे। स्वदेशी स्वावलम्बन तो वे भूल ही चुके हैं। गरीबों के नाम पर योजनाएं चलाते और अपनी गरीबी दूर करने से भी नहीं चूकते और कहते हैं कि हम सूरज की ओर चार कदम बढा चुके हैं। पता नहीं, इनके मन में सम्पत्ति बनाने की ललक क्यों पलने लगी है।' उन्होंने एक सांस में पता नहीं कितना कुछ बोल डाला।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     'अरे छोड़िए भी साहब घर गिरस्ती की बातें। ये बताइए आपका पूरा शरीर जख्मी दिखलाई पड़ रहा है। क्या राज है?' मैंने अपनी ओर से प्रश्न उछाला।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     'मेरी कुछ संतानें ऐसी भी हो चुकी हैं जिस पर भारत ही क्या समूचा संसार भी गर्व करता है, उनका आदर करता है। उन्होंने मेरी सेवा में अपना संपूर्ण जीवन, सारा सुख-वैभव तक न्यौछावर कर दिया। आज भी ऐसी संतानें हैं जो भरपूर फसल उगाते हैं, अपना स्वयं का पेट पालते हैं और पूरे देशवासियों का भी। कुछ तो चौखट पर खड़े होकर शत्रुओं के हमलों से मेरी हिफाजत करते हैं और हंसते-हंसते अपने प्राण तक न्यौछावर कर देते हैं। लहलहाती फसलें, हरे भरे वृक्ष देखकर मेरी तबीयत खुश हो जाती है। बच्चों के मन में दया का भाव, प्रेम-ममता, करुणा, आदर्श और त्यागमय जीवन-समर्पण आदि देखकर तबीयत गद्गद् हो जाती है। यह मुझे हमेशा प्राणवायु की तरह ताजगी देते रहती है। यही कारण है कि मैं हमेशा हृष्ट-पुष्ट दिखाई देता हूं और दुख इस बात का है कि मेरा छोटा लड़का खोटा सिक्का निकला। लड़-झगड़कर अलग रहने लगा। उसकी लिप्साएं उसका कपटपूर्ण व्यवहार आज भी उतना ही है जितना पहले कभी था। बात-बात में हथियार निकाल लेता है। गोला बारूद से ऐसे खेलता है जैसे दीपावली में छोटे बच्चे टिकली वाला तमंचा चलाते हैं। मेरे सिर पर, कंधों पर जो घाव देख रहे हो न मासाब, ये सब उस नामुराद की वजह से ही हैं। मेरी छाती में तथा पैरों में जो घाव रिसते देख रहे हैं न, ये भी उसकी कारस्तानी है। मेरे मन में यही दु:ख बार-बार सालता रहता है कि वह कब होश में आयेगा। इन जख्मों से मुझे दर्द इसलिए भी नहीं होता कि मेरे अपनों ने ही जख्म दिए हैं। कोई और होता तो... तो पता नहीं मैं क्या-क्या कर डालता। मेरे मन में अब भी यही आशा है, विश्वास है कि वह एक दिन अपने किए पर पछतायेगा। उसकी आंखों में पश्चाताप के आंसू जिस दिन छलछला आएंगे उस दिन मेरे ये सारे जख्म अपने आप भर जाएंगे।'  &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     बोलते-बोलते भारत जी को पता नहीं क्या हुआ तेजी से कुर्सी पर से उठे और तेज चाल चलते हुए हेलीकाप्टर के पास पहुंचे। पायलट भी पीछे-पीछे सरपट भागा जा रहा था। उन्होंने उसे चालू करने की आज्ञा दी और फर्र से उड़ गए।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     मैं पीछे-पीछे भारत जी, भारत भाई चिल्लाते-चिल्लाते भागा जा रहा था, तब तक तो वे आकाश की ऊंचाइयों पर पहुंच चुके थे। मेरा इस तरह चिल्लाना-चीखना देखकर पत्नी जागी और कहने लगी क्या कोई सपना देख रहे थे। मैंने चेतना में लौटते हुए कहा, 'हां, सपने में भारत जी आए थे।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;a href="http://www.srijangatha.com/2007-08/june07/kahani-goverdhanyadav.htm"&gt;साभार - सृजन गाथा.कॉम &lt;/a&gt; &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-93431712916048272?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/93431712916048272/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_7417.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/93431712916048272'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/93431712916048272'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_7417.html' title='माई इंडिया - गोवर्धन यादव'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-3502798891736745970</id><published>2009-05-27T06:08:00.000-07:00</published><updated>2009-05-27T06:10:54.016-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सेहत'/><title type='text'>चेहरे की खूबसूरती का राज फेस मास्क</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://deshbandhu.co.in/uploaded_files/supplement/img_605.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 266px;" src="http://deshbandhu.co.in/uploaded_files/supplement/img_605.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बाजार में तरह-तरह के फेस मास्क उपलब्ध हैं जैसे संतरे का, चंदन का और मुल्तानी मिट्टी का पर ये काफी महंगे होते हैं। साथ ही उन्हें खरीदते समय भी विशेष सावधानी बरतनी आवश्यक है जैसे-आप जब भी कोई फेस मास्क खरीद रही हैं तो अच्छी कंपनी का ही लें और प्रसाधन का प्रयोग करने से पूर्व उसमें प्रयुक्त सामग्री के विषय में पढ़ लें। कहीं किसी से आपकी त्वचा को एलर्जी न हो। एक्सपायरी तिथि भी अवश्य पढें। साथ ही फेस मास्क के प्रयोग की विधि पढे बिना उसे प्रयोग मत करें। सबसे जरूरी है अपनी त्वचा के प्रकार यानी तैलीय, रूखी, मिश्रित आदि ध्यान में रखते हुए उसी के अनुरूप फेस मास्क का चुनाव करें। आकर्षक पैकिंग से प्रभावित होकर कोई प्रसाधन न खरीदें।&lt;br /&gt;फेस मास्क का प्रयोग करते समय भी कुछ बातों को ध्यान में रखें। फेस मास्क का प्रयोग साफ हाथों से करें। फेस मास्क का प्रयोग करते समय आपका चेहरा बिल्कुल साफ होना चाहिए। उस पर कोई मेकअप नहीं लगा होना चाहिए। अगर आपकी त्वचा रूखी है तो किसी साफ कपडे क़ो पानी में भिगोकर चेहरा उससे अच्छी तरह साफ करें। इससे चेहरे की त्वचा के रोमकूप खुल जाएंगे और फेस मास्क अधिक प्रभाव छोडेग़ा। अगर आपकी त्वचा तैलीय है तो ऐसा न करें। इससे आपको मुंहासे हो सकते हैं।&lt;br /&gt;फेस मास्क लगाने से पूर्व अपने बालों को अच्छी तरह से पीछे बांध लें। मास्क पेस्ट साफ उंगलियों से स्पेटयूला से लगाएं। आंखों के आस-पास की त्वचा पर इसे न लगाएं। मास्क पेस्ट नरम हाथों से लगाए और त्वचा पर एकसार लगाएं।&lt;br /&gt;कुछ आसान फेस मास्क तैयार करने व प्रयोग करने की विधि: त्वचा पर निखार लाने के लिए मलाई में जरा सी हल्दी मिला दें और 15-30 मिनट तक लगा रहने दें। फिर हल्के गर्म पानी से चेहरा धो लें ताकि तैलीयता समाप्त हो जाए।&lt;br /&gt;अगर आपके रोमछिद्र खुले हुए हैं तो क्ले मास्क उसे कसेगा और त्वचा को ताजगी देगा। मुल्तानी मिट्टी में थोड़ी सी मलाई मिला लें और मिश्रण को त्वचा पर लगा कर सूखने दें। फिर चेहरे को पानी से साफ कर लें। टमाटर भी बडे रोमछिद्रों वाली त्वचा के लिए अच्छा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;रूखी त्वचा के लिएफेस मास्क&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;एक चम्मच शहद व एक चम्मच अंडे का सफेद भाग मिला कर चेहरे पर लगाएं और सूखने पर धो लें।&lt;br /&gt; रूखी त्वचा के लिए अंडे का पीला भाग लगाना भी उत्तम है क्योंकि यह विटामिन ए से भरपूर होता है। एक चम्मच अंडे का पीला भाग लें। उसमें शहद व आलिव आयल की कुछ बूंदें अच्छी तरह से मिलाएं और चेहरे पर लगाएं। अगर आपकी त्वचा बहुत रूखी है तो नींबू और संतरे का प्रयोग न करें।&lt;br /&gt; एक चम्मच मलाई में थोड़ा सा बेसन, हल्दी व दूध डालकर पेस्ट बना लें। सूखने पर धो दें। इससे रूखी त्वचा में नमी बनी रहेगी।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;तैलीय त्वचा के लिए फेस मास्क&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;खीरे को कद्दूकस करके उसमें दही मिला कर पेस्ट बना लें व 15 मिनट तक चेहरे पर लगाएं। फिर पानी से साफ कर लें। यह मास्क तैलीय त्वचा के लिए विशेष लाभदायक है।&lt;br /&gt;अंडे की सफेदी का मास्क भी खुले रोम छिद्रों को बंद करता है इसलिए तैलीय त्वचा पर इसका प्रयोग भी लाभप्रद है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मिश्रित त्वचा के लिए फेस मास्क&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;ह्व एक चम्मच बेसन में चुटकी भर हल्दी, दूध, कुछ बूंदें बादाम रोगन की डाल कर पेस्ट बनाएं और चेहरे पर लगाएं। सूखने पर ठंडे पानी से चेहरा साफ कर लें।&lt;br /&gt;ह्व  एक चम्मच बेसन में कुछ बूदें ग्लिसरीन व नींबू के रस की मिलाकर लगाएं और 10-15 मिनट बाद पानी से चेहरे को साफ कर लें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-3502798891736745970?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/3502798891736745970/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_8201.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/3502798891736745970'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/3502798891736745970'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_8201.html' title='चेहरे की खूबसूरती का राज फेस मास्क'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-7783351445712773967</id><published>2009-05-27T06:03:00.000-07:00</published><updated>2009-05-27T06:05:59.754-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सुरभि'/><title type='text'>छुट्टियों को यादगार बनाएं</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://deshbandhu.co.in/uploaded_files/supplement/img_596.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 274px; height: 220px;" src="http://deshbandhu.co.in/uploaded_files/supplement/img_596.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;ग्रीष्मावकाश शुरू हो गया है, तुम लोग भी स्वयं को तनावमुक्त व हल्का महसूस कर रहे होगे, क्योंकि होमवर्क करना, पढ़ाई करने की जिम्मेदारी से अब आपको मुक्ति मिल गई है। दिन भर खेल, धमाचौकड़ी करने की कल्पना मात्र से सभी बच्चे प्रफुल्लित रहते हैं, लेकिन ऐसा कुछ समय तक ही रहता है। फिर बच्चों को बोरियत महसूस होने लगती है कि लंबी दुपहरी कैसे बिताई जाए? क्यों न इस बार छुट्टियां सार्थक व ज्ञानवर्द्धक कार्यों में व्यस्त कर इन छुट्टियों को यादगार बनाया जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छुट्टियों में तुम लोग हिंदी व अंग्रेजी के नए शब्द सीख सकते हो सामान्य ज्ञान, चिल्डे्रन नॉलेज, बैंक व अन्य इसी तरह की पुस्तकें पढ़ने से ज्ञान में अभिवृद्धि की जा सकती है। तुम्हें जिस क्षेत्र में भी रुचि हो उसका प्रशिक्षण ले सकते हो। संगीत, वादन, चित्रकला, पेंटिंग अथवा अन्य जो कुछ भी तुम सीखना चाहते हो, उसे सीखें बडे बच्चे बागवानी के कार्यों में बड़ों की मदद कर सकते हो। बागवानी से हमें प्रकृति के बारे में नई-नई बातों को जानने का अवसर मिलता है। कुछ बड़ी लड़कियां, जिन्हें सिलाई, कढ़ाई, बुनाई में रुचि हो, वे इन्हें सीख सकती है। वैसे भी वर्षभर पढ़ाई की व्यस्तता के कारण इन कलाओं को सीखना संभव नहीं होता। कंप्यूटर के युग में कंम्यूटर की शिक्षा भी प्राप्त की जा सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जूडो कराटे या अन्य शरीर सौष्ठव संबंधी प्रशिक्षण लिया जा सकता है। यदि किसी विशेष खेल में रुचि हो तो उसकी भी कोचिंग कर सकते हो। दिन भर घर में कैद रहने से अच्छा है कि तुम लोग शारीरिक, मानसिक विकास के लिए हम उम्र बच्चों के साथ खेलो। वैसे सीमित समय तक टीवी देख सकते हो। लगातार टीवी देखते रहने से मानसिक विकास व ज्ञान कुंठित होता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-7783351445712773967?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/7783351445712773967/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_8536.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/7783351445712773967'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/7783351445712773967'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_8536.html' title='छुट्टियों को यादगार बनाएं'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-220601310457012388</id><published>2009-05-27T05:51:00.000-07:00</published><updated>2009-05-27T05:54:05.436-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सेहत'/><title type='text'>गर्मी से कैसे बचें</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://tbn0.google.com/images?q=tbn:OlWsOqYcG2kqGM:http://rhapsodyinbooks.files.wordpress.com/2009/05/hot-sun-thermometer.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 141px; height: 139px;" src="http://tbn0.google.com/images?q=tbn:OlWsOqYcG2kqGM:http://rhapsodyinbooks.files.wordpress.com/2009/05/hot-sun-thermometer.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;गर्मी का पारा लगातार ऊपर चढता जा रहा है। गर्मी पिछले कई वर्ष पुराने रिकॉर्ड को तोड रही है। अभी पिछले दिनों अप्रैल में तापमान ने पिछले 50 वर्ष पुराने रिकॉर्ड को तोडा। ऐसे में गर्मी से खुद को कैसे बचाया जाए हम सभी के लिए सबसे बडी समस्या बन गई है। क्योंकि बच्चों के खेल-कूद और पढाई के साथ बडाें की नौकरी तक के सारे काम ऐसे हैं, जिनके साथ समझौता नहीं किया जा सकता है। लेकिन यदि थोडी सी सावधानी बरती जाए तो कई बडी बीमारियों से बचा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खाने-पीने का रखें ख्याल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गर्मी में खान-पान का महत्व कई गुणा बढ ज़ाता है क्योंकि सर्दियों में फास्ट फूड जैसे गर्म पदार्थ ज्यादा हानिकारक नहीं होते हैं, लेकिन गर्मियों में वही घातक साबित हो सकते हैं। हमें अधिक से अधिक घर का बना भोजन खाना चाहिए। संभव हो तो खाने में हरी सब्जी और ठंडे खाद्य पदार्थों का सेवन करें। ऐसे खाद्य पदार्थ ज्यादा खाएं जिसमें पानी की अधिकता हो। साथ ही पानी का सेवन भी अधिक से अधिक करना चाहिए। वैसे तो हर व्यक्ति को चार-पांच लीटर पानी का सेवन अवश्य करना चाहिए, लेकिन मौसम को देखते हुए इसे बढ़ाया जा सकता है। साथ ही जूस और दूसरे द्रव्य पदार्थ का सेवन करते रहें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर से निकलते समय रखें ख्याल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर से निकलने से पहले पानी पीकर निकलें। हो सके तो पानी की बोतल भी साथ में रखें। छतरी साथ में रखने से अनावश्यक धूप से बचा जा सकता है, जो स्वास्थ्य के साथ-साथ त्वचा को भी धूप से बचाने में सहायक होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धूप में निकलने से बचें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मौसम को देखते हुए कोशिश करें कि धूप में न निकलें। अगर निकलना ही पडे तो शाम या सुबह में निकलने का प्रयास करें। महिलाओं और बच्चों को तो खासतौर से धूप में बाहर निकलने से बचना चाहिए, क्योंकि इनकी त्वचा नाजुक होती है। अगर आप धूप में निकले हैं और अचानक से वातानुकूलित कमरे या ऑफिस में आना पडे, तो एकाएक जाने की बजाय थोडी ठंडी जगह पर रूकने के बाद जाएं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या खाएं क्या नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गर्मी के मौसम में इस मौसम के फल का सेवन अधिक मात्रा में करना चाहिए। तरबूज, खरबूजा, खीरा, ककडी ज़ैसे फल शरीर को उचित मात्रा में पानी देने के साथ-साथ गर्मी से लडने की शक्ति भी देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मरीज के लिए सावधानियां&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्लडप्रेशर और मधुमेह जैसी बीमरियों से ग्रस्त मरीजों को गर्मी में खास सावधानी रखनी चाहिए, क्योंकि बढते तापमान में उनकी बीमारी भी बढ़ सकती है। उन्हें इनफेक्शन का खतरा ज्यादा होता है। उन्हें उपरोक्त सावधानियों के साथ-साथ डॉक्टरी सलाह भी लेते रहना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साभार - देशबंधू&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-220601310457012388?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/220601310457012388/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_6807.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/220601310457012388'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/220601310457012388'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_6807.html' title='गर्मी से कैसे बचें'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-3314778905432805599</id><published>2009-05-27T05:46:00.000-07:00</published><updated>2009-05-27T05:49:15.821-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सेहत'/><title type='text'>पेट की कई समस्याओं का आसान इलाज है हरड़</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://deshbandhu.co.in/uploaded_files/vichar/img_obt_661.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 120px; height: 91px;" src="http://deshbandhu.co.in/uploaded_files/vichar/img_obt_661.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;हरड़ या हरीतकी का वृक्ष 60 से 80 फुट ऊंचा होता है। प्रधानत: यह निचले हिमालय क्षेत्र में रावी तट से बंगाल आसाम तक लगभग पांच हजार फुट की ऊंचाई तक पाया जाता है। इसकी छाल गहरे भूरे रंग की होती है तथा पत्तों का आकार वासा के पत्तों जैसा होता है। सर्दियों में इसमें फल आते हैं जिनका भंडारण जनवरी से अप्रैल के बीच किया जाता है। मौटे तौर पर हरड़ के दो प्रकार हैं- बड़ी हरड़ और छोटी हरड़। बड़ी हरड़ में सख्त गुठली होती है जबकि छोटी हरड़ में कोई गुठली नहीं होती। &lt;br /&gt;वास्तव में वे फल जो गुठली पैदा होने से पहले ही तोड़कर सुखा लिए जाते हैं उन्हें ही छोटी हरड़ की श्रेणी में रखा जाता है। आयुर्वेद के अनुसार छोटी हरड़ का प्रयोग निरापद होता है क्योंकि आंतों पर इसका प्रभाव सौम्य होता है। वनस्पति शास्त्र के अनुसार हरड़ के तीन अन्य भेद हो सकते हैं। पक्वफल, अर्धपक्व फल तथा पीली हरड़। छोटी हरड़ को ही अधिपक्व फल कहते हैं जबकि बड़ी हरड़ को पक्वफल कहते हैं। पीली हरड़ का गूदा काफी मोटा तथा स्वाद कसैला होता है। फलों के स्वरूप, उत्पत्ति स्थान तथा प्रयोग के आधार पर हरड़ के कई अन्य भेद भी किए जा सकते हैं। नाम कोई भी हो चिकित्सकीय प्रयोगों के लिए डेढ़ तोले से अधिक भार वाली, बिना छेद वाली छोटी गुठली तथा बड़े खोल वाली हरड़ ही प्रयोग की जाती है।  टेनिक अम्ल, गलिक अम्ल, चेबूलीनिक अम्ल जैसे ऐस्ट्रिंजेन्ट पदार्थ तथा एन्थ्राक्वीनिन जैसे रोचक पदार्थ हरड़ के रासायनिक संगठन का बड़ा हिस्सा हैं। इसके अतिरिक्त इसमें जल तथा अन्य अघुलनशील पदार्थ भी होते हैं। इसमें 18 प्रकार के अमीनो अम्ल मुक्तावस्था में पाए जाते हैं। &lt;br /&gt;बवासीर, सभी उदर रोगों, संग्रहणी आदि रोगों में हरड़ बहुत लाभकारी होती है। आंतों की नियमित सफाई के लिए नियमित रूप से हरड़ का प्रयोग लाभकारी है। लंबे समय से चली आ रही पेचिश तथा दस्त आदि से छुटकारा पाने के लिए हरड़ का प्रयोग किया जाता है। सभी प्रकार के उदरस्थ कृमियों को नष्ट करने में भी हरड़ बहुत प्रभावकारी होती है।  अतिसार में हरड़ विशेष रूप से लाभकारी है। यह आंतों को संकुचित कर रक्तस्राव को कम करती हैं वास्तव में यही रक्तस्राव अतिसार के रोगी को कमजोर बना देता है। हरड़ एक अच्छी जीवाणुरोधी भी होती है। अपने जीवाणुनाशी गुण के कारण ही हरड़ के एनिमा से अल्सरेरिक कोलाइटिस जैसे रोग भी ठीक हो जाते हैं। &lt;br /&gt;इन सभी रोगों के उपचार के लिए हरड़ के चूर्ण की तीन से चार ग्राम मात्रा का दिन में दो-तीन बार सेवन करना चाहिए। कब्ज के इलाज के लिए हरड़ को पीसकर पाउडर बनाकर या घी में सेकी हुई हरड़ की डेढ़ से तीन ग्राम मात्रा में शहद या सैंधा नमक में मिलाकर देना चाहिए। अतिसार होने पर हरड़ गर्म पानी में उबालकर प्रयोग की जाती है जबकि संग्रहणी में हरड़ चूर्ण को गर्म जल के साथ दिया जा सकता है। &lt;br /&gt;हरड़ का चूर्ण, गोमूत्र तथा गुड़ मिलाकर रात भर रखने और सुबह यह मिश्रण रोगी को पीने के लिए दें इससे बवासीर तथा खूनी पेचिश आदि बिल्कुल ठीक हो जाते हैं। इसके अलावा इन रोगों के उपचार के लिए हरड़ का चूर्ण दही या मट्ठे के साथ भी दिया जा सकता है। &lt;br /&gt;लीवर, स्पलीन बढऩे तथा उदरस्थ कृमि आदि रोगों की इलाज के लिए लगभग दो सप्ताह तक लगभग तीन ग्राम हरड़ के चूर्ण का सेवन करना चाहिए। हरड़ त्रिदोष नाशक है परन्तु फिर भी इसे विशेष रूप से वात शामक माना जाता है। अपने इसी वातशामक गुण के कारण हमारा संपूर्ण पाचन संस्थान इससे प्रभावित होता है। यह दुर्बल नाडि़यों को मजबूत बनाती है तथा कोषीय तथा अंर्तकोषीय किसी भी प्रकार के शोध निवारण में प्रमुख भूमिका निभाती है। &lt;br /&gt;हालांकि हरड़ हमारे लिए बहुत उपयोगी है परन्तु फिर भी कमजोर शरीर वाले व्यक्ति, अवसादग्रस्त व्यक्ति तथा गर्भवती स्त्रियों को इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साभार - देशबंधु&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-3314778905432805599?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/3314778905432805599/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_4953.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/3314778905432805599'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/3314778905432805599'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_4953.html' title='पेट की कई समस्याओं का आसान इलाज है हरड़'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-8307153508352322586</id><published>2009-05-27T04:50:00.000-07:00</published><updated>2009-05-27T04:55:56.453-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सेहत'/><title type='text'>नेचरल रहें, खूबसूरत लगें</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://hindi.webdunia.com/miscellaneous/health/health/0905/24/images/img1090524071_1_1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 150px; height: 200px;" src="http://hindi.webdunia.com/miscellaneous/health/health/0905/24/images/img1090524071_1_1.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;गर्मियों में आप कितना ही वॉटरप्रूफ मेकअप कर लें, लेकिन वह मेल्ट हो ही जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सन प्रोटेक्शन &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;गर्मियों में आप जो लिप बाम यूज करती हैं, उसे यूज करने से पहले फ्रिज में रख दें। जब भी आप इस ठंडे लिप बाम को लगाएंगी, तो बेहद फ्रेश फील करेंगी। इस मौसम में आप फ्रूट फ्लेवर वाले लिप बाम भी ट्राई कर सकती हैं। इनकी खुशबू आपको गर्मी में भी कूल बनाए रखेगी। स्किन एक्सपर्ट डॉ. बिंदु कहती हैं कि बाजार में चिपस्टिक, लिप ग्लॉस, लिप बाम में कई वैराइटीज हैं, जिनका एसपीएफ 25 या इससे ज्यादा होता है। इससे धूप का असर आपके होंठों पर नहीं पड़ता और आपके होंठ न तो काले होते हैं और न ही फटते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर आप स्विमिंग या फिजिकल एक्टिविटी करती हैं, तो उस समय हल्का वॉटरप्रूफ मेकअप लगाएं। मेकअप एक्सपर्ट विम्मी जोशी कहती हैं कि ग्लैमरस दिखने के लिए वॉटरप्रूफ ब्यूटी प्रॉडक्ट्स इस्तेमाल करें। गर्मियों में लिक्विड फाउंडेशन लगाएं। इससे स्किन सॉफ्ट, फ्रेश और क्लीन दिखेगी। चेहरे पर फाउंडेशन लगाने से पहले हल्का कंसीलर लगाएं और फिर डस्टिंग पाउडर यूज करें। इससे पूरे चेहरे पर मेकअप एक जैसा लगेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बालों को दें नया लुक &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;आपके बाल बहुत ज्यादा ड्राई हैं, तो इन पर रोजाना कंडिशनर लगाएं। इस गर्म मौसम में अपने बालों को नया लुक देना चाहती हैं, तो गीले बालों पर सुंदर-सा रिबन बांध लें। आप एक ऊंची पॉनीटेल भी बना सकती हैं। ये स्टाइल गर्मियों में आपको कूल लुक देंगे और गॉर्जियस दिखाने के साथ गर्मी से भी बचाएंगे। अगर आप रोज बाल धोती हैं, तो इन्हें सुखाने के लिए ड्रायर यूज न करें। बालों को नेचरल रूप से सूखने दें। मार्किट में हेयर केयर के कई प्रॉडक्ट्स हैं, जो धूप व कैमिकलयुक्त पानी से आपके बालों को बचाते हैं। इसके अलावा, बाहर निकलने से पहले हैट या स्टोल जरूर कैरी करें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;स्टाइलिश सैंडल &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;गर्मी में आपके पैर सुंदर लगें, इसके लिए आप नाखूनों को अच्छी तरह फाइल करें। फिर अपने फुटवियर्स से मैच करता नेल पेंट लगाएं। नेल पेंट सूखने के बाद ही फुटवियर्स पहनें। इस मौसम में बैली या जूती पहनने से बचें। इन्हें पहनने से आपको गर्मी ज्यादा लगेगी। इस मौसम में स्ट्रैप्स वाले सैंडल कैरी करें। अगर आप कैजुअल लुक चाहती हैं, तो फ्लिप-फ्लॉप सैंडल पहन सकती हैं। वैसे, ओपन सैंडल पहनने के कई फायदे भी हैं। इससे पैरों को फ्रेश हवा मिलती है, जिससे पैरों में पसीना नहीं आता और बदबू भी नहीं होती। फिर पैरों में गर्मी न लगने से पूरी बॉडी कूल रहती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-8307153508352322586?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/8307153508352322586/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_766.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/8307153508352322586'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/8307153508352322586'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_766.html' title='नेचरल रहें, खूबसूरत लगें'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-5354731064634593129</id><published>2009-05-27T04:40:00.000-07:00</published><updated>2009-05-27T04:44:18.128-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सेहत'/><title type='text'>सेहत के लिए जरूरी है नींद</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://hindi.webdunia.com/miscellaneous/health/health/0905/24/images/img1090524071_1_3.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 155px; height: 115px;" src="http://hindi.webdunia.com/miscellaneous/health/health/0905/24/images/img1090524071_1_3.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जिंदगी के लिए आहार, निद्रा और मैथुन तीन प्राकृतिक कर्म माने गए हैं। शेक्सपीयर ने नींद को जिंदगी का सबसे महान पोषक माना है। यह तो हम सभी जानते हैं कि शरीर, मन और आत्मा को स्वस्थ रखने के लिए नींद और आराम निहायत जरूरी है, लेकिन ऐसे कितने भाग्यवान लोग हैं, जिन्हें रातभर चैन की नींद आती है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्राचीन समय से ही स्वस्थ रहने के नियमों में सबसे पहला स्थान नींद का रहा है। मानव शरीर की यही खासियत है कि दिनभर की शारीरिक थकान की भरपाई रातभर की नींद में पूरी हो जाती है। जो लोग रात में नहीं सोते उन्हें किसी न किसी तरह दिन में इसकी भरपाई करना जरूरी होता है। हर साल लाखों सड़क दुर्घटनाएँ उनींदे ड्राइवरों के कारण होती हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;* कितनी नींद जरूरी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पर कई मतभेद हैं। आधुनिक युग से पहले यानी 1920 के आसपास यूके में माना जाता था कि 9 घंटे की नींद तरोताजा रहने के लिए जरूरी है। अब ऐसा नहीं है। अब साढ़े सात घंटे की नींद को ही विशेषज्ञ पर्याप्त मानते हैं। कई विद्वानों का मानना है कि 6 घंटे की नींद वयस्क मानव शरीर के लिए पर्याप्त है। शर्त यही है कि उसे नींद दवाओं की मदद से नहीं, बल्कि प्राकृतिक रूप से आए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;* क्या होती है नींद &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नींद के कई चरण होते हैं। मात्र दस मिनट में ही जागृत अवस्था के हल्की नींद की ओर जाने को स्टेज वन श्रेणी की नींद माना गया है। स्टेज टू पहले से गहरी होती है, जो 20 मिनट तक रहती है। नींद के तीसरे और चौथे चरण को गहरी नींद माना गया है। नींद के इसी हिस्से में शरीर और दिमाग को आराम मिलता है और दिनभर की थकान मिटती है। नींद के इस हिस्से में दिमाग से डेल्टा लहरें उत्पन्न होती हैं, इसलिए इसे डेल्टा वेव भी कहा जाता है। इस अवधि में कोई सपने नहीं आते। 90 मिनट की गहरी नींद के बाद रैपिड आई मूवमेंट शुरू होता है। सामान्य नींद में लोग इसके कई बार कई चरणों से होकर गुजरते हैं। दिक्कत तब उत्पन्न होती है, जब यह पैटर्न बदल जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;* नींद का दुरुपयोग &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आधुनिक युग में नींद का सबसे अधिक दुरुपयोग किया जाता है। लोग बेडरूम का इस्तेमाल सिर्फ सोने के लिए नहीं, बल्कि दूसरे कामों के लिए भी करने लगे हैं। अक्सर शिकायत करते हैं कि रात को देर से खाते हैं, इसलिए जागना पड़ता है। कई बार पालक यह शिकायत करते हैं कि बच्चे जगते रहते हैं, इसलिए हमें भी जागना पड़ता है। यह प्रकृति की नियामत का दुरुपयोग है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टीवी सीरियल देखना या देर रात तक फिल्में देखने से नींद का पैटर्न बदल जाता है। दिन भर की थकावट निकल ही नहीं पाती है और दूसरा दिन सामने आ खड़ा होता है। जब रात में नींद ठीक से नहीं होती है तब चिड़चिड़ापन घर करने लगता है। एसीडिटी तथा अन्य शारीरिक समस्याएँ तो साथ आती ही हैं। अक्सर देखा गया है कि जो लोग रात को भरपूर नींद नहीं सोते, उन्हें दिन में नींद के झोंके आते रहते हैं। शरीर किसी न किसी तरह अपने नींद के कोटे की भरपाई कर लेना चाहता है, लेकिन आधुनिक जीवन की जरूरतें उसे पीछे धकेलती रहती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;* नहीं होती नुकसान की भरपाई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नींद की कमी की भरपाई होना मुश्किल होता है। यदि आप सोमवार से शुक्रवार तक काम में मसरूफ रहते हैं और रातों की नींद के कुछ घंटों की बलि चढ़ा देते हैं तो उसकी भरपाई शनिवार को चंद घंटे अधिक सोने से नहीं होगी। नींद के विषय को गंभीरता से लेना जरूरी है। ताकि मन और शरीर स्वस्थ बना रहे। कार्यकुशलता और क्षमता भी बरकरार रहे। थकान के कारण शरीर पूरी क्षमता से काम नहीं करता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दवाओं का दुरुपयोग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नींद की कमी को पूरा करने के लिए नींद लाने वाली दवाओं का सेवन करते हैं, किन्तु इनसे मिलने वाली नींद साधारण नींद ना होकर नशा होती है। इसमें नींद के प्राकृतिक गुण नहीं होते। इससे नींद से मिलने वाले लाभों से वंचित रह जाते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सावधानी: &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;* खाना जल्दी खाएँ। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;* दूध में शहद डाल कर पीने से नींद अच्छी आती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;* संतोषी मन बना कर सोएँ तो अच्छी नींद आएगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;* रात को स्नान करके सोने से भी नींद अच्छी आ सकती है&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-5354731064634593129?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/5354731064634593129/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_8543.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/5354731064634593129'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/5354731064634593129'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_8543.html' title='सेहत के लिए जरूरी है नींद'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-2845963377614553447</id><published>2009-05-27T04:31:00.000-07:00</published><updated>2009-05-27T04:34:18.938-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जिज्ञासा'/><title type='text'>क्या आप जानते हैं?</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.bhaskar.com/2009/05/24/images/question1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 310px; height: 240px;" src="http://www.bhaskar.com/2009/05/24/images/question1.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;इतनी लंबी मोमबत्ती!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आम मोमबत्तियां तो हम सबने देखी हैं, रंग-बिरंगी, छोटी-लंबी-मोटी है न! लेकिन सन् 1897 में स्टॉकहोम प्रदर्शनी में एक ऐसी मोमबत्ती दिखाई गई थी, जिसकी ऊंचाई 80 फुट और व्यास 8.5 फुट था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्थर से बना पाउडर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शरीर पर लगाए जाने वाले सुगंधित टैल्कम पाउडर ‘टैल्क’ नामक पत्थर, जो सबसे मुलायम खनिज है, से बनाया जाता है। इसमें बाद में सुगंधि मिला दी जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तैरता है लोहा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्विक सिल्वर कोई चांदी नहीं है, बल्कि यह पारे का नाम है। यह अकेली ऐसी धातु है, जो तरल अवस्था में रहती है। यह इतनी भारी होती है कि इस पर लोहा भी तैरता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे भारी और सबसे हल्की धातु&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लीथियम धातु सबसे हल्की है, जबकि ऑस्मियम धातु सबसे भारी है। ऑस्मियम की एक 2 फुट लंबी, 2 फुट चौड़ी और 2 फुट मोटी सिल्ली का वÊान एक हाथी के बराबर होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक असम्भव टाइपराइटर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यद्यपि जापान के लोग औद्योगिक दुनिया में सबसे आगे हैं, लेकिन वे आज तक जापानी भाषा के टाइपराइटर की कुछ कमियां दूर नहीं कर पाए हैं। इसका कारण यह है कि उनकी आम भाषा में 2 हÊार से अधिक अक्षर हैं, जिनके लिए पूर्ण परिष्कृत की-बोर्ड बनाना अत्यधिक कठिन कार्य है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे महंगा जल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुरू जल या भारी पानी, जिसका प्रयोग नाभिकीय भट्टियों में किया जाता है, विश्व का सबसे महंगा जल है। एक लीटर गुरू जल का मूल्य लगभग 200 पाउंड होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आसान है तैरना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नदी की तुलना में समुद्र में तैरना अधिक सरल होता है क्योंकि पानी में नमक घुला होने के कारण समुद्री जल का घनत्व अधिक होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साभार - भास्कर. कॉम&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-2845963377614553447?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/2845963377614553447/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_9679.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/2845963377614553447'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/2845963377614553447'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_9679.html' title='क्या आप जानते हैं?'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-753117659193934588</id><published>2009-05-27T04:20:00.000-07:00</published><updated>2009-05-27T04:29:13.564-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रेरणा स्रोत'/><title type='text'>आम आदमी में देश का भविष्य देखते थे नेहरू</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://tbn3.google.com/images?q=tbn:c7lrwxRUKnsnVM:http://wwwdelivery.superstock.com/WI/223/2102/PreviewComp/SuperStock_2102-2349.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 119px; height: 120px;" src="http://tbn3.google.com/images?q=tbn:c7lrwxRUKnsnVM:http://wwwdelivery.superstock.com/WI/223/2102/PreviewComp/SuperStock_2102-2349.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;आधुनिक भारत के शिल्पी कहे जाने वाले देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू न केवल एक राष्ट्रवादी और युगदृष्टा थे, बल्कि जनवादी भी थे। उन्होंने स्वतंत्र भारत में समतामूलक विकास की नींव रखी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेहरू (14 नवंबर 1889-27 मई 1964) ने स्वतंत्र भारत में संसदीय सरकार और जनवाद को बड़ी सावधानी से पाला-पोसा और इसकी जड़ें मजबूत की। इसे हम पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव में भी फलते-फूलते देख रहे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्राध्यापक कमल मित्र चिनाय ने बताया संविधान निर्माण में आम्बेडकर और अन्य नेताओं के अलावा नेहरू की भी भूमिका थी। उन्होंने अपने नेतृत्व में संविधान को अमल में लाने के लिए अहम योगदान दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चिनाय ने बताया आजादी के बाद के शुरुआती दिनों में सत्ता में कांग्रेस का बहुमत होते हुए भी उन्होंने विभिन्न मुद्दे पर खुलेआम बहस की, जिसे ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी की पत्रिका में भी देखा जा सकता था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने बताया कि 1950 के बाद से पार्टी पर पूर्ण वर्चस्व प्राप्त होने के बावजूद नेहरू ने आंतरिक जनवाद और खुली बहस को कांग्रेस के अंदर भी प्रोत्साहित किया। उन्होंने ऐसे संस्थागत ढाँचे के विकास में सहयोग दिया, जो जनवादी मूल्यों पर आधारित थे और जिनमें सत्ता विकेंद्रित थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रो. चिनाय ने बताया कि नेहरू खुद को समाजवादी कहते थे, लेकिन खुद को समाजवाद की धारा से कुछ अलग रूप में देखते थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार जब नेहरू से पूछा गया कि भारत के लिए वे क्या छोड़कर जाएँगे तो उन्होंने कहा था-आशा है चालीस करोड़ ऐसे लोग जो हमारा शासन चलाने के काबिल होंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेहरू का मानना था कि भारत जैसे विभिन्नता वाले समाज में जनवाद विशेष तौर पर जरूरी है। उन्होंने समाजवादी दृष्टिकोण को करोड़ों जनता तक पहुँचाया और समाजवाद को उनकी चेतना का हिस्सा बना दिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेहरू की सबसे बड़ी जिम्मेदारी और उनकी उपलब्धि भारत की आजादी का सुदृढ़ीकरण और उसकी चौकसी करना था, क्योंकि उस वक्त दुनिया दो महाशक्तियों अमेरिका और सोवियत संघ के बीच बँटी हुई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रो. चिनाय ने बताया नेहरू ने गुटनिरपेक्षता के माध्यम से बहुत सारे देशों को एकत्र कर लिया, वरना आजादी खतरे में पड़ जाती। नेहरू ने सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र को मिलाकर एक राष्ट्रीय क्षेत्र बनाया, जिसे मिश्रित अर्थव्यवस्था के नाम से जाना गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने बताया कि वे चाहते थे कि सार्वजनिक क्षेत्र निजी क्षेत्र को बढ़ने में मदद करे। साथ ही सार्वजनिक क्षेत्र लोगों को नौकरी मुहैया कराने में मदद करे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेहरू ने एक स्वतंत्र और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था के ढाँचे का निमार्ण कार्य आरंभ किया और पंचवर्षीय योजना की शुरुआत की। उन्होंने धर्मनिरपेक्षता की जड़ों को भारतीय जनता के बीच फैलाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साभार - वेबदुनिया. कॉम&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-753117659193934588?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/753117659193934588/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_27.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/753117659193934588'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/753117659193934588'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_27.html' title='आम आदमी में देश का भविष्य देखते थे नेहरू'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-7935275700615639393</id><published>2009-05-26T05:38:00.000-07:00</published><updated>2009-05-26T05:41:14.860-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सेहत'/><title type='text'>अब भैंस खाएगी हर्बल बिस्किट</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://hindi.webdunia.com/miscellaneous/health/healthnews/0905/26/images/img1090526014_1_1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 150px; height: 150px;" src="http://hindi.webdunia.com/miscellaneous/health/healthnews/0905/26/images/img1090526014_1_1.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;छिंदवा़ड़ा। चारा, भूसा और खली-चुनी के साथ अब गाय भैसों को जायकेदार "हर्बल बिस्किट" खाने को मिलेंगे। 16 किस्मों की जड़ी-बूटी से तैयार यह बिस्किट दुधारू पशुओं की दूध क्षमता ब़ढ़ाने में सहयोगी साबित होगा। पातालकोट में निवास करने वाले आदिवासी भुमकाओं के पारंपरिक ज्ञान को मूर्तरूप देकर छिंदवा़ड़ा निवासी डॉ. दीपक आचार्य ने औषधीय विज्ञान की दुनिया में एक प्रभावी सफलता हासिल की है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिले के पहुँचविहीन गाँवों में आदिवासी समाज के भुमका अपने पारंपरिक ज्ञान से मनुष्य और जानवरों की लाइलाज बीमारियों का उपचार देशी ज़ड़ी-बूटियों के सहारे करते हैं। ग्रामीण संस्कृति के इस अनमोल ज्ञान को सहेजने के लिए छिंदवा़ड़ा निवासी डॉ. दीपक आचार्य दस साल से पातालकोट क्षेत्र में रहने वाले भुमकाओं के पारंपरिक औषधीय ज्ञान का अध्ययन करते रहे। उन्होंने इस अवधि में लगभग बीस हजार नुस्खे और हर्बल फार्मूले एकत्र किए। अपना जीवन आदिवासियों के पारंपरिक ज्ञान और औषधीय विज्ञान को समर्पित करते हुए डॉ. दीपक ने समस्त नुस्खों और फार्मूलों का पेटेंट भुमकाओं के नाम करा लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह उत्पाद एक उत्प्रेरक की तरह कार्य करता है, जो जानवर की पाचक क्षमता और दूध बनाने की प्रक्रिया का ब़ढ़ाता है। प्रतिदिन दो बिस्किट रोटी में जानवरों को आसानी से खिलाए जा सकते हैं। &lt;br /&gt;- डॉ. दीपक आचार्य&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या है बिस्किट में &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह बिस्किट 16 किस्म की ज़ड़ी-बूटियों से तैयार किया गया। इसमें खैर, बबूल, शतावरी, धनिया, अजवायन, सौंफ, गन्ना, महुआ, बिदारी कंद, तिल, सुर्पखा, गुडुची, हर्रा, जीवंती, आँवला और जीरा शामिल है।&lt;br /&gt;- जगदीश पंवार&lt;br /&gt;&lt;a href="http://hindi.webdunia.com/miscellaneous/health/healthnews/0905/26/1090526014_1.htm"&gt;साभार - वेबदुनिया. कॉम &lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-7935275700615639393?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/7935275700615639393/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_26.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/7935275700615639393'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/7935275700615639393'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_26.html' title='अब भैंस खाएगी हर्बल बिस्किट'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-3000395068568773077</id><published>2009-05-25T05:46:00.000-07:00</published><updated>2009-05-25T05:51:23.338-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उपन्यास'/><title type='text'>उपन्यास 'आकाश चम्पा' का अंश</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2006/09/20060908045416upanyas_sanjeev203c.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 203px; height: 250px;" src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2006/09/20060908045416upanyas_sanjeev203c.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2006/09/20060908070929sanjeev_byline.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 58px; height: 55px;" src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2006/09/20060908070929sanjeev_byline.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगली शाम को मचान पर लिखते समय बुधुआ की बोली ने खलल डाली, ‘हमरा ऊपर विसवास नै छै?’&lt;br /&gt;मोतीलाल के कान खड़े हो गए. किससे झगड़ रहा है बुधुआ? मामी से?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘जब अपने पहरा पर बैठना था तो हमरा काहें ला बैठाई थीं?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात धीरे-धीरे समझ में आती है मोतीलाल के, कि अकेले बुधुआ ही पहरा नहीं देता था मामी भी पहरे पर रहती थीं. हद ही हो गई खातिरदारी की.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरे-धीरे कुछ और परतें खुलीं फिर कुछ और परतें...वह कौन है जो परछाइयों की तरह पीछे लगा है. घाट से दलान और दलान से मचान तक? मामी! लेकिन भला क्यों? वियोग विदग्धा मामी. सारी उमर निकाल दी मामाजी के पीछे. मामा, जो जाति खारिज, गाँव खारिज होने के कुछ साल बाद तेलंगाना गए तो लौटे ही नहीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुधुआ को जैसे कुकुरमाछी लग गई है. छनक-पटक कर चला गया है. शाम के झुटपुटे में मकई के पौधों के झुरमुट में खड़े हैं मोतीलाल.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘मामी’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चिहुँक जाती है मामी, ‘पाहुन’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘हाँ’ स्वर भारी है. कुछ दिन से एक जो बात पूछने का मन करता है.’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो थकी हुई आँखों ने, दो थकी हुई आँखों में झाँका. मामी की आँखों में अभी भी ‘भादर माह’ की बदली है. अब यह बदली छलक आई मोतीलाल की आँखों में, ‘हमरा ऊपर एतना ममता काहे?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थोड़ी सी मुस्कराहट, थोड़ी सी उदासी. नाक सिकोड़कर पूछ रही हैं मामी, ‘सारी उमर पार कर देने के बाद आज पूछने आए हो पाहुन? जो ढका है, ढका ही रहने दो.’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चौक गए हैं मोतीलाल. ‘कहीं मामी मुझसे प्यार तो नहीं करतीं?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘उसे अब भी नहीं खोलोगी तो कब खोलोगी?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुन कर गुन रही हैं मामी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आसमान में बादल भी हैं, रिमझिम भी. एक छोटी सी बदली ने ढक रखा है अस्तमान सूर्य को. बदली के किनारे रंजित और रोशन हैं. मकई के पत्तों पर ‘पट-पुट’ बज रही हैं बूंदें - दूर भी पास भी. सूरज निकलता आ रहा है बदली से जैसे प्रसव हो रहा है उसका. पूरब इंद्रधनुष खिल रहा है. पर यह मुहुर्त भर का मायाजाल है जो सूरज के डूबने के साथ-साथ तिरोहित हो जाएगा. बूनी थम रही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘हमने कुछ पूछा मामी...?’ मोतीलाल दोबारा याद दिलाते हैं मामी को. ‘पूछ रहे हो?’ मामी की गोरी गर्दन तन गई है. अरे बाप, यह कैसी नज़र से ताक रही हैं मामी. ऐसा रंग कब छलकता है आँखों में. ‘पूछ रहे हो तो सुनो...लेकिन एक बात... इस छिन के बाद ये ई समझ लो कि न हमने कुछ कहा, न तुमने कुछ सुना... जैसे बिजुरी चमक कर बादर में समा जाती है ठीक वैसे ही, यह बात भी... समझे?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘जी लेकिन पहले बोलिए तो’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मामी तनिक हँसती हैं, ‘इतने अधीर मत बनो पाहुना. तुम गौरा की माँग के सिंदूर हो. आँचल के अनमोल रतन. तुम्हारा नाम मोतीलाल नहीं, हीरालाल होता तो भी कम था. इतना अच्छा भी नैं होना चाहिए कि देखकर जी ललचाए. सो तुम्हें देखकर लालच लगती. चुरा लेने का मन करता. अब गौरा, मेरी जानो कि गोबर की गौरी! क्या जाने तुम्हारी कदर. तुम्हें रख नहीं पाई. मैं होती तो दिखा देती.’ मामी ने नाक को सिकोड़ कर हल्की सी वो जुंबिश दी कि मोतीलाल निहाल हो उठे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘तुम्हें चुरा लेने का मन करता. इसलिए बार-बार तुम्हारे पास जाती रही. बहाने गढ़ती रही पास आने की... लेकिन तुम ठहरे एक ही कठ करेज. मुड़कर ताका भी नहीं कभी.’ मामी को तिरछी चितवन में गहरा उपालंभ है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘अरे!’ चकित रह गए मोतीलाल. इस शुष्क, नीरस जीवन की कोख में ऐसा कोई वरदान भी अभी तक छुपा पड़ा है जो घेरे हुए था, मगर जिसे देख न पाए थे. आज मामी के इस रहस्योदघाटन से सारे तहखाने रौशन हो रहे हैं और इनके वैभव पर वे चकित हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नैतिकता की लक्ष्मण रेखा दरक रही है,‘और अगर ताक देता तो शायद हमसे--- या हम दोनों से ही वह पाप हो जाता.’ मामी ने एक गहरी सांस भरी, ‘चलो, अपनी गौरा के दरबार में दोख-पाप का भागी होने से तो बच गए हम.’ मामी तनिक ठमकी फिर बोलीं तो स्वर बदला हुआ था. ‘अब इस सूखती, सड़ती देह में क्या है. यह भी तो नहीं कह सकती कि अँकवार में भर कर चूम लो हमें, बाहों के घेरे में इतना कसो, इतना कि देह की सारी नसें तड़क उठें. तृप्त कर दो हमें कि जवानी से लेकर आज उमर के इस उतार पर आज तक की पियासी आत्मा की सारी पियास मिट जाए... न! इन सबसे बचा लिया बैजनाथ बाबा ने. तुम्हारी तुमरे अंदर रह गई हमारी हमारे अंदर.’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोनों दो मेघ खंडों की तरह पास आए, फिर ठिठक गई मामी. ‘ना ना छूना मत. मत छूना मुझे.’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठमक गए मोतीलाल के बढ़ते कदम.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अच्छा हुआ, दोनों ने एक दूसरे को छुआ नहीं. छू देते तो जाने कहां प्रलय आ जाता. दोनों में ही बिजलियाँ भरी थीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘क्या तुम्हें मालूम है कि मामाजी कहाँ हैं? मोतीलाल ने नज़र झुका ली थी. हाँ मामी की सजल आँखे झुकी नहीं थीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘क्या यह भी जानती हो कि...’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाँ, वे अब कभी भी लौट कर नहीं आएंगे. वर्षों पहले ही तेलंगाना में पुलिस की गोली से...’ आधे वाक्य पर मामी ने उस मर्मभेदी हाहाकार को रोक लिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘तो क्या वे रस से भरी सारी कहानियाँ, वह अभिसार, वह योगी...’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘सब मनगढंत थे लेकिन वही मेरे संबल थे. क्या करती?’ मामी किसी ढीठ की तरह बोले जा रही थीं. उनकी श्वेत लटें जैसे हर भुट्टे की भुई में फैल गई हों.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मामी बोल रही थीं और शाम की द्वाभा में पके केशों के बीच उनकी माँग की लाली दमक रही थी. जैसे गंगा के इस दीरा (दीयर) के राशि-राशि भूले शुभ्र काँसों के बीच डूबने के पहले सूरज ठिठक गया हो. जैसे देह का सारा रक्त संकेद्रित हो गया हो उस सिंदूर में -आख़िरी बार भभककर जल जाने से पहले का उपक्रम!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;संजीव&lt;br /&gt;साभार - बीबीसी हिंदी &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-3000395068568773077?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/3000395068568773077/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_1991.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/3000395068568773077'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/3000395068568773077'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_1991.html' title='उपन्यास &apos;आकाश चम्पा&apos; का अंश'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-2640530757752414906</id><published>2009-05-25T05:38:00.000-07:00</published><updated>2009-05-25T05:41:35.415-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>वक़्त</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2006/09/20060922061159kavita2203.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 203px; height: 250px;" src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2006/09/20060922061159kavita2203.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;यह कैसा वक़्त है&lt;br /&gt;कि किसी को कड़ी बात कहो&lt;br /&gt;तो वह बुरा नहीं मानता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे घृणा और प्यार के जो नियम हैं&lt;br /&gt;उन्हें कोई नहीं जानता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़ूब खिले हुए फूल को देख कर&lt;br /&gt;अचानक ख़ुश हो जाना,&lt;br /&gt;बड़े स्नेही सुह्रदय की हार पर&lt;br /&gt;मन भर लाना,&lt;br /&gt;झुँझलाना,&lt;br /&gt;अभिव्यक्ति के इन सीधे सादे रूपों को भी&lt;br /&gt;सब भूल गए,&lt;br /&gt;कोई नहीं पहचानता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कैसी लाचारी है&lt;br /&gt;कि हमने अपनी सहजता ही&lt;br /&gt;एकदम बिसारी है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बिना जीवन कुछ इतना कठिन है&lt;br /&gt;कि फ़र्क़ जल्दी समझ में नहीं आता&lt;br /&gt;यह दुर्दिन है या सुदिन है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो भी हो संघर्षों की बात तो ठीक है&lt;br /&gt;बढ़ने वालों के लिए&lt;br /&gt;यही तो एक लीक है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर भी दुख-सुख से यह कैसी निस्संगिता&lt;br /&gt;कि किसी को कड़ी बात कहो&lt;br /&gt;तो भी वह बुरा नहीं मानता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कीर्ति चौधरी&lt;br /&gt;साभार - बीबीसी हिंदी&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-2640530757752414906?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/2640530757752414906/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_5049.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/2640530757752414906'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/2640530757752414906'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_5049.html' title='वक़्त'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-1893747920917276959</id><published>2009-05-25T05:31:00.000-07:00</published><updated>2009-05-25T05:37:18.562-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>मुझे फिर से लुभाया</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2006/09/20060922060806kavita203.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 203px; height: 152px;" src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2006/09/20060922060806kavita203.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मुझे फिर से लुभाया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खुले हुए आसमान के छोटे से टुकड़े ने,&lt;br /&gt;मुझे फिर से लुभाया.&lt;br /&gt;अरे! मेरे इस कातर भूले हुए मन को&lt;br /&gt;मोहने,&lt;br /&gt;कोई और नहीं आया&lt;br /&gt;उसी खुले आसमान के टुकड़े ने मुझे&lt;br /&gt;फिर से लुभाया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; दुख मेरा तब से कितना ही बड़ा हो&lt;br /&gt;वह वज्र सा कठोर,&lt;br /&gt;मेरी राह में अड़ा हो&lt;br /&gt;पर उसको बिसराने का,&lt;br /&gt;सुखी हो जाने का,&lt;br /&gt;साधन तो वैसा ही&lt;br /&gt;छोटा सहज है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वही चिड़ियों का गाना&lt;br /&gt;कजरारे मेघों का&lt;br /&gt;नभ से ले धरती तक धूम मचाना&lt;br /&gt;पौधों का अकस्मात उग आना&lt;br /&gt;सूरज का पूरब में चढ़ना औ&lt;br /&gt;पच्छिम में ढल जाना&lt;br /&gt;जो प्रतिक्षण सुलभ,&lt;br /&gt;मुझे उसी ने लुभाया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे कातर भूले हुए मन के हित&lt;br /&gt;कोई और नहीं आया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुख मेरा भले ही कठिन हो&lt;br /&gt;पर सुख भी तो उतना ही सहज है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे कम नहीं दिया है&lt;br /&gt;देने वाले ने&lt;br /&gt;कृतज्ञ हूँ&lt;br /&gt;मुझे उसके विधान पर अचरज है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कीर्ति चौधरी&lt;br /&gt;साभार - बीबीसी हिंदी &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-1893747920917276959?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/1893747920917276959/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_9459.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/1893747920917276959'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/1893747920917276959'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_9459.html' title='मुझे फिर से लुभाया'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-5460492571803112726</id><published>2009-05-25T05:21:00.001-07:00</published><updated>2009-05-25T05:25:25.424-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>बरसते हैं मेघ झर-झर</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2006/09/20060922061104kavita203l.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 203px; height: 350px;" src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2006/09/20060922061104kavita203l.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बरसते हैं मेघ झर-झर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भीगती है धरा&lt;br /&gt;उड़ती गंध&lt;br /&gt;चाहता मन&lt;br /&gt;छोड़ दूँ निर्बंध&lt;br /&gt;तन को, यहीं भीगे&lt;br /&gt;भीग जाए&lt;br /&gt;देह का हर रंध्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रंध्रों में समाती स्निग्ध रस की धार&lt;br /&gt;प्राणों में अहर्निश जल रही&lt;br /&gt;ज्वाला बुझाए&lt;br /&gt;भीग जाए&lt;br /&gt;भीगता रह जाए बस उत्ताप!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बरसते हैं मेघ झर-झर&lt;br /&gt;अलक माथे पर&lt;br /&gt;बिछलती बूँद मेरे&lt;br /&gt;मैं नयन को मूँद&lt;br /&gt;बाहों में अमिय रस धार घेरे&lt;br /&gt;आह! हिमशीतल सुहानी शांति&lt;br /&gt;बिखरी है चतुर्दिक&lt;br /&gt;एक जो अभिशप्त&lt;br /&gt;वह उत्तप्त अंतर&lt;br /&gt;दहे ही जाता निरंतर&lt;br /&gt;बरसते हैं मेघ झर-झर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कीर्ति चौधरी&lt;br /&gt;साभार - बीबीसी हिंदी&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-5460492571803112726?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/5460492571803112726/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_5980.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/5460492571803112726'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/5460492571803112726'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_5980.html' title='बरसते हैं मेघ झर-झर'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-5188142193194984161</id><published>2009-05-25T05:18:00.000-07:00</published><updated>2009-05-25T05:20:17.537-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>एक बाल कविता</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2006/10/20061019120339kavita01.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 203px; height: 350px;" src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2006/10/20061019120339kavita01.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;दो देशों के बीच मचा जब घोर महासंग्राम,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;दिन पर दिन बीते, आ गए लाखों सैनिक काम!&lt;br /&gt;कभी किसी का पलड़ा भारी कभी कोई बलशाली,&lt;br /&gt;होते होते एक देश का हुआ ख़ज़ाना ख़ाली!&lt;br /&gt;उसने राजदूत बुलवा कर भेजा एक प्रस्ताव,&lt;br /&gt;क्षमा करें, संधि करलें पर चलें न कोई दाँव!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तर आया इतने हाथी, इतने घोड़े दे दो,&lt;br /&gt;इतनी मुद्राएँ, वस्त्रों के इतने जोड़े दे दो!&lt;br /&gt;एक शर्त पर और है अपनी दस सेवक भिजवादो,&lt;br /&gt;ह्रष्टपुष्ट , बलशाली हों, बस इतना काम करादो!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजा ने संदेश यह सुन कर दूतों को बुलवाया,&lt;br /&gt;दस बलशाली सेवक लाने जगह-जगह दौड़ाया!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ दिन बीते, सैनिक लौटे, आए मुँह लटकाए,&lt;br /&gt;राजा देख उन्हें चिल्लाया, यह क्या हाय, हाय!&lt;br /&gt;अरे मूर्खो, इतना सा भी काम नहीं कर पाए,&lt;br /&gt;पूरे देश से दस बलशाली लोग नहीं ला पाए!&lt;br /&gt;सैनिक बोले इतना ही कह सकते हैं हे, राजन्,&lt;br /&gt;हम बेबस हैं चाहे ले लें आप हमारा जीवन!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गली-गली और नगर-नगर की ख़ाक है छानी हमने,&lt;br /&gt;नींद को भूले, भूख को त्यागा, पिया न पानी हमने!&lt;br /&gt;भूख-प्यास की मारी जनता, शक्ति कहाँ से पाए,&lt;br /&gt;पूरे देश में दस बलशाली लोग नहीं मिल पाए!&lt;br /&gt;ऐसे लोग ह्रष्टपुष्ट हों, खोट नहीं हो जिनमें,&lt;br /&gt;गाँव-नगर में नहीं, वे हैं तो केवल राजमहल में!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सलमा ज़ैदी   &lt;br /&gt;साभार - बीबीसी हिंदी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-5188142193194984161?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/5188142193194984161/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_2201.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/5188142193194984161'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/5188142193194984161'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_2201.html' title='एक बाल कविता'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-1119833162553135652</id><published>2009-05-25T05:13:00.000-07:00</published><updated>2009-05-25T05:15:56.753-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>बादल का छाताः</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2006/10/20061006121504cloudy203.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 203px; height: 152px;" src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2006/10/20061006121504cloudy203.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;एक था नन्हा सा बच्चा. नाम तो न जाने उसका क्या था, पर घर में सब उसे बचुआ कहकर बुलाते थे.&lt;br /&gt;एक दिन बचुआ घर के पास वाले सरस्वती पार्क में घूमने गया. वहाँ ढेर सारे बच्चे मिलकर खेल रहे थे. पर बचुआ का कोई दोस्त नहीं था. वह चुपचाप पार्क के एक कोने में बैठकर आकाश में उमड़-घुमड़ रहे बादलों को देख रहा था. बादलों की अजब-गजब शक्लें थीं. कोई हाथी, कोई ऊँट, कोई बहुत बड़े खरगोश तो कोई छुक-छुक रेलगाड़ी की शक्ल जैसा बादल भी था. कुछ हवाई ज़हाज की शक्ल में भूरे-सलेटी बादल भी थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बादल तो ऐसा था, जैसे कोई बाघ मोटर साइकिल पर शान से बैठा, उसे चला रहा हो. और ये सारे अजीबोगरीब शक्लों वाले जानवर तेज़ी से दौड़ लगा रहे थे. देखकर बचुआ को बड़ा मज़ा आया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने में उसे लगा कि नन्हा सा बादल उसे देखकर हँसा है. यह देखकर बचुआ भी हँस पड़ा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थोड़ी देर में नन्हा बादल आसमान से उतरा और बचुआ के पास आकर खड़ा हो गया. बोला,‘‘आओ बचुआ, घूमने चलें. झटपट मेरे ऊपर बैठ जाओ.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचुआ बड़ा खुश हुआ. वह बादल के ऊपर बैठा, तो नन्हा बादल झटपट उड़कर आसमान की ओर जाने लगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचुआ को थोड़ा-थोड़ा डर लग रहा था. बादल हँसकर बोला,‘‘आराम से टाँगें फैलाकर बैठ जाओ बचुआ और वह सामने वाली किरणों की डोरी पकड़ लो. फिर डर नहीं लगेगा.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचुआ बैठ गया तो बादल और भी तेज़ी से उड़ने लगा. फिर वह एक जगह रुका. हँसकर बोला,‘‘बचुआ, ठंडी-ठंडी हवा में कही सो तो नहीं गए! देखो, हम जापान देश में आ गए हैं. आओ, नीचे उतरकर ज़रा यहाँ की खूबसूरती देखें.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब वे घूमने निकले, तो थोड़ी-थोड़ी बारिश हो रही थी. नन्हा बादल बोला, ‘‘ठहरो, मैं कुछ करता हूँ.’’ और वह झट एक छाते में बदल गया. अब बादल के छाते के अंदर बचुआ देर तक घूमता रहा. वह ज़रा भी नहीं भीगा था. रास्ते में जहाँ कहीं बचुआ भटकता, छाता बना नन्हा, भूरा बादल उसे रास्ता दिखाता,‘‘बचुआ, ऐसे नहीं, ऐसे चलो.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचुआ थक गया, तो नन्हा बालक एक चुस्त, फुर्तीला जापानी लड़का बन गया. उसने बादलों के रंग की टोपी पहनी हुई थी. उस पर बिजली की तरह चम-चम चमकते मोती लगे थे. वह जापानी लड़का बड़ा चुस्त और खुशदिल था. दौड़कर उसके लिए ढेर सारे फल और मेवे ले आया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ देर बाद बचुआ फिर बादल पर बैठा और उड़ चला. अब नन्हे बादल ने उसे चीन देश की सैर कराई. वहाँ वह नीली आँखों वाली एक प्यारी सी चीनी लड़की ता शिंकू की शक्ल में उसके आसपास घूमता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह नन्हे बादल ने बचुआ को पूरी दुनिया घुमा दी. इंगलैंड, जर्मनी, फ्राँस, अमरीका समेत उसने दुनिया के अजब-अजब तरह के लोग देखे. सुंदर नदियाँ, पहाड़ और समुद्र देखे. झीलें देखीं, जंगल और रेगिस्तान देखे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखकर बचुआ खूब खुश हुआ. जिन चीज़ों को पहले उसने खाली भूगोल की किताब में पढ़ा था, आज उन्हें ख़ुद अपनी आँखों से देख पा रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लौटा तो बचुआ को घर की बुरी तरह याद आ रही थी. अम्मा और बाबू जी याद आ रहे थे. सोच रहा था ‘वाह! उन्हें दुनिया के अजब-गजब रंग-रूपों के बारे में बताऊँगा, तो वे कितने खुश होंगे.’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने नन्हे बादल से कहा, तो वह हँसकर बोला,‘‘हाँ-हाँ बिलकुल...बिलकुल खुश होंगे. बताना उन्हें सारी बातें.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचुआ नीचे उतरा, तो बादल एक सुंदर रिक्शा बन गया. सफेद रंग का चम-चम चमकता रिक्शा. उस पर एक सुंदर, सुनहरा छाता भी तन गया. बचुआ बैठा, तो वह रिक्शा ख़ुद-ब-ख़ुद चल पड़ा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचुआ खुश-अहह...! वाह रे राम, दुनिया कितनी खूबसूरत है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उधर सड़क पर लोग यह देख रहे थे. हैरान होकर सोच रहे थे,‘अरे, यह क्या?.. यह तो अजब तमाशा है.’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तभी बचुआ का घर आ गया. बचुआ झट रिक्शे से उतरा और दौड़ते हुए अपने घर जा पहुँचा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह झट अपनी अम्मा से मिला, बाबू से मिला. सबको अपनी अनोखी सैर के बारे में बताया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सब खुश थे. वाह रे वाह, अपने बचुआ ने तो बड़ा कमाल किया!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचुआ की अम्मा और बाबू जी ने सोचा कि बादल को धन्यवाद तो देना चाहिए. पर उन्होंने बाहर जाकर देखा, तो बादल गायब. वह ऊपर आसमान में जाकर बड़े प्यार से हँसता हुआ हाथ हिला रहा था. मानो विदा ले रहा हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाहर अब भी ढेरों लोग खड़े थे. सब पूछ रहे थे बचुआ की अम्मा और बाबू से कि बचुआ कौन से रिक्शे में बैठकर आया है? चाँदी जैसा चम-चम करता रिक्शा था. उस पर सुनहरा छत्र तना था. उसे तो कोई चला भी नहीं रहा था. अपने आप हवा में चलता जा रहा था. और फिर वह रिक्शा हमारे देखते-देखते हवा में उड़कर जाने कहाँ चला गया!... कैसे हुआ यह अजूबा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब बचुआ ने बताया कि वह रिक्शा तो एक नन्हा खुशदिल बादल था और वही उसे सारी दुनिया में घुमाकर लाया है, तो लोग बड़े हैरान हुए. सब बचुआ से उसकी अनोखी यात्रा के बारे में पूछने लगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचुआ ने उन्हें सब कुछ बताया कि वह किस तरह उस नन्हे सैलानी बादल पर बैठकर दुनिया के अजब-अनोखे पर्वत, नदियाँ, झरने, झीलें और समंदर देखकर आया है, तो लोगों की खुशी का ठिकाना न रहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब बचुआ पार्क में जाता, तो अकेला न रहता. सब बच्चे बार-बार उसकी अजब-अनोखी कहानी सुनते. उसे अपने साथ खेल खिलाते और बातें करते. बचुआ ने पक्का वादा किया है कि अब के बादल आया, तो वह उन सबको अपने साथ बादल पर बैठ, सारी दुनिया की सैर कराने ले जाएगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रकाश मनु&lt;br /&gt;545 सेक्टर-29&lt;br /&gt;फरीदाबाद,हरियाणा&lt;br /&gt;फोन-0129-2500030&lt;br /&gt;साभार - बीबीसी हिंदी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-1119833162553135652?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/1119833162553135652/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_8434.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/1119833162553135652'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/1119833162553135652'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_8434.html' title='बादल का छाताः'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-6952166439097305700</id><published>2009-05-25T04:47:00.001-07:00</published><updated>2009-05-25T04:48:55.321-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>पुश्तैनी तलवार</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.bhaskar.com/2009/03/07/images/cartoon1.gif"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 310px; height: 240px;" src="http://www.bhaskar.com/2009/03/07/images/cartoon1.gif" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जब तेनालीराम राज दरबार में आना शुरू कर चुके थे उस समय का यह किस्सा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सम्राट कृष्णदेव राय के वंशज पुश्तों से विजय नगर पर राज्य करते आए थे। प्रत्येक राजवंश की महत्वपूर्ण वस्तुओं की हिफाजत के लिए सम्राट ने एक विशाल संग्रहालय की स्थापना की। उसकी देख-रेख के लिए अनेक होशियार तथा काबिल कर्मचारियों का निरीक्षण कर रहे थे। एकाएक अपने पूर्वज नरेश नायक की तलवार देखकर रुक गए। सम्राट कृष्णदेव राय ने मंत्री से पूछा- तुम्हें इस तलवार में क्या खासियत दिखाई दे रही है? मंत्री बोला- अन्नदाता, यह तलवार नहीं, आपके पूर्वजों की बहादुरी की कहानी है। सेनापति की तरफ सम्राट ने देखा तो वह बोला- महाराज, यह तलवार नहीं, वह अनमोल हीरा है जिसने दुश्मनों के कठोर से कठोर हाड़ मांस को भी गाजर मूली की तरह काट डाला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सम्राट तलवार की तारीफ सुन, फूले न समा रहे थे। पुरोहित व दूसरे सभी दरबारियों ने तलवार की प्रशंसा में जमीन आसमान एक करने शुरू कर दिए। अचानक मंत्री ने देखा कि तेनालीराम खामोश खड़ा है। सम्राट को सुनाते हुए उसने तेनालीराम से कहा- तुम क्यों खामोश हो तेनालीराम? तुम भी बताओ, तुमने तलवार में क्या देखा? पानी। पानी, तेनालीराम का जवाब सुनकर सभी दरबारी एक साथ चौंककर बोले।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब मंत्री ने सम्राट कृष्णदेव राय की तरफ देखते हुए तेनालीराम से कहा- इस महान तलवार का अपमान मत को तेनालीराम, जो तलवार संसार की धन-संपत्ति से अधिक मूल्यवान है उसमें तुम्हें पानी दिखाई दे रहा है। सम्राट कृष्णदेव राय भी अपनी इस पुश्तैनी तलवार की तौहीन को अधिक देर तक न पचा सके। उन्होंने फुफकारते हुए तेनालीराम की तरफ देखा और बोले- तेनालीराम तुम आवश्यकता से अधिक ढीठ होते जा रहे हो। या तो एक सप्ताह के अंदर साबित करो कि तुमने जो तलवार में देखा है वह सही है वरना मैं तुम्हें प्राणदंड दिए बिना न रहूंगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरबारियों को अहसास हुआ कि इस बार तेनालीराम बच न सकेगा। वे मुस्कुरा कर एक-दूसरे को देखने लगे। आदेश देकर सम्राट जाने लगे तो तेनालीराम ने हाथ जोड़कर एक सप्ताह के लिए वहीं रहने की अनुमति देने को कहा। कुछ सोचकर सम्राट ने इजाजत दे दी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आठवें दिन दरबार खचाखच भरा था। सभी को उम्मीद थी कि तेनालीराम उस पुश्तैनी तलवार में पानी देखने की बात सिद्ध नहीं कर पाएगा और उसे प्राणदंड मिलेगा। दम साधे सभी तेनालीराम के आने का इंतजार कर रहे थे। दरबार शुरू हुए आधा घंटा भी नहीं बीता था कि तेनालीराम मुस्कुराता आता दिखाई दिया। उसके पीछे-पीछे संग्रहालय के तीन कर्मचारी अपने-अपने सिर पर पुस्तकों के गट्ठर उठाकर ला रहे थे। सम्राट सहित सभी दरबारी अचंभे में थे। तेनालीराम ने उन गट्ठरों को खोलकर महाराज से कहा- महाराज, मेरी बात का सबूत ये प्राचीन पुस्तकें हैं जो मैं आपके संग्रहालय से लाया हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आश्चर्य से सम्राट ने कुछ कहना चाहा तो तेनालीराम बोला- महाराज, इन पुस्तकों में आपके उन पूर्वजों की शौर्य गाथाएं हैं जिन्होंने इस प्रतापी तलवार का इस्तेमाल दुश्मनों के खिलाफ किया। इन सभी ने लिखा है कि उस तलवार ने विजय नगर के दुश्मनों को बार-बार पानी पिलाया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर दूसरे गट्ठर की ओर संकेत करके तेनालीराम ने कहा- इन पुस्तकों में लिखा है कि पानीदार तलवार के आगे दुश्मनों के सारे हवाई किले धराशायी हो गए। वह तीसरे गट्ठर की तरफ इशारा करके कुछ कहना ही चाहता था कि सम्राट कृष्णदेव राय ने स्वयं उठकर उसे गले से लगा लिया। बोले- बस, बस तेनालीराम, हम समझ गए कि जिस तलवार में पानी न हो, वह हीरे की हो या चांदी की, बेकार है। तुमने उस पुश्तैनी तलवार में अवश्य ही पानी देखा होगा। दरबारियों के सिर झुक गए। राजा ने तेनालीराम को पुरस्कार से सम्मानित किया।&lt;br /&gt;साभार - दैनिक भास्कर&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-6952166439097305700?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/6952166439097305700/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_706.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/6952166439097305700'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/6952166439097305700'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_706.html' title='पुश्तैनी तलवार'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-3773053780139558239</id><published>2009-05-25T04:39:00.000-07:00</published><updated>2009-05-25T04:43:33.844-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>सोने की गेंद</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.bhaskar.com/2009/04/03/images/story-child11.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 310px; height: 240px;" src="http://www.bhaskar.com/2009/04/03/images/story-child11.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;हर रविवार की सुबह गांव के कुछ लोग चौपाल पर जमा होकर यहां-वहां की हांकने में जुटे थे। तभी गांव का एक धनी दुकानदार भी वहां आ पहुंचा और शेखी बघारते हुए बोला, ‘तुम सब अपनी बातें छोड़ो, मेरी सुनो। मैं तो हरीश सेठ के बंगले के अंदर जाकर सब कमरे भी देख चुका हूं।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोगों को उसकी बात पर सहसा विश्वास न हुआ क्योंकि हरीश सेठ उस गांव का ही नहीं, पूरे नगर में सबसे धनवान होने के साथ-साथ लालची, अक्खड़ और महाकंजूस भी था।वहां बैठे बड़बोले मोहन से रहा न गया। वह बोला, ‘तुमने तो हरीश सेठ का बंगला देखा भर है। मैं चाहूं, तो उसके साथ बैठकर खाना भी खा सकता हूं।‘ ‘ये मुंह और मसूर की दाल। तुझ जैसे फटीचर का यह ख्वाब कभी पूरा नहीं हो सकता।’ दुकानदार ने मोहन का मÊाक उड़ाते हुए कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘तो लगी शर्त! अगर मैंने हरीश सेठ के साथ बैठकर खाना खा लिया, तो तुम अपनी बग्घी का घोड़ा और पालतू गाय मुझे सौंप दोगे और अगर मैं वैसा न कर पाया, तो बिना वेतन के दो साल तक मैं तुम्हारे यहां काम करूंगा।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘मुझे मंजूर है।’ दुकानदार ने वहां मौजूद लोगों के सामने मोहन से हाथ मिलाते हुए कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘अब देखो मेरा कमाल!’ कहने के साथ ही मोहन मन ही मन योजना बनाकर हरीश सेठ के बंगले पर जा पहुंचा और वहां तैनात दरबान से बोला, ‘सेठजी से जाकर कहो कि मुझे उनसे कुछ Êारूरी बात पूछनी है।’सेठ ने जिज्ञासावश मोहन को अपने पास बुलवाकर पूछा, ‘क्या पूछना चाहते हो मुझसे?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘सेठजी, कृपया आप मुझे यह बताएं कि लगभग आधा किलो वजनी सोने की गेंद का मूल्य कितना होगा?’ ‘लगता है इसके हाथ कहीं से सोने की गेंद लग गई है। इससे पहले कि यह गंवार उसे कहीं ओर बेचे, मुझे ही वह हासिल कर लेनी चाहिए।’ सोचकर हरीश सेठ ने कहा, ‘बता दूंगा, इतनी भी क्या जल्दी है। पहले कुछ खा-पी लेते हैं।’ उसने अपने तथा मोहन के लिए बढ़िया-बढ़िया पकवान बनवाए। फिर दोनों ने डटकर भोजन किया। उसके बाद हरीश सेठ ने मोहन की खातिरदारी करते हुए उसे चांदी का वरक चढ़ी पान की गिलौरी भी भेंट की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘अब तुम दौड़कर घर जाओ और सोने की गेंद मेरे पास ले आओ, पर उसे बड़ी सावधानी के साथ और ढंककर लाना।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘लेकिन मेरे पास तो कोई गेंद नहीं है।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘मÊाक मत करो। मैं तुम्हें उस गेंद के बदले में दो बोरी आटा, दो बोरी दाल और चांदी के कुछ सिक्के भी दूंगा।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘मैं सच कह रहा हूं कि मेरे पास ऐसी कोई गेंद नहीं है। मैं तो सोच रहा था कि अगर मुझे कहीं से वैसी कोई सोने की गेंद मिल जाए, तो उसकी कीमत कितनी होगी, बस वही पूछने मैं आपके पास आया था।’‘मूर्ख..बदतमीज..जाहिल..चल फूट यहां से। जाने कहां-कहां से उठकर चले आते हैं।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हरीश सेठ का पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा था। मोहन चुपचाप बंगले से बाहर आ गया और जोर जोर से हंसने लगा। जहां वह एक अमीर किंतु लालची और कंजूस सेठ के साथ बढ़िया भोजन करने में सफल हुआ, वहीं शर्त जीतकर एक बढ़िया घोड़ा तथा गाय भी हासिल कर चुका था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-3773053780139558239?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/3773053780139558239/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_25.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/3773053780139558239'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/3773053780139558239'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_25.html' title='सोने की गेंद'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-8215371135501803856</id><published>2009-05-23T06:35:00.000-07:00</published><updated>2009-05-23T06:49:04.773-07:00</updated><title type='text'>गोटू व मोटू</title><content type='html'>गोटू और मोटू जोकर डंबो सर्कस में काम करते थे। वे दोनों अच्छे मित्र थे। गोटू बहुत लंबा और पतला था, जबकि मोटू छोटा व मोटा था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन गोटू और मोटू सर्कस में करतब दिखा रहे थे। गोटू हवा में साबुन के बुलबुलों को पकड़ने की कोशिश कर रहा था। यह देख कर बच्चे हँसते हुए तालियाँ बजाने लगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसी समय अचानक गोटू ने थोड़ासा साबुन वाला पानी जमीन पर उड़ेल दिया। फिर जैसे ही मोटू बुलबुले को पकड़ने के लिए ऊपर की ओर कूदा, फिसल कर नीचे गिर गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोटू दर्द के कारण जोरजोर से चिल्लाने लगा, ''हाय, मैं मर गया।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोटू और सर्कस देखने वाले बच्चों ने सोचा कि यह उसका दूसरा करतब है। इसलिए वे जोर जोर से हंसने लगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मोटू को बहुत चोट आई थी। वह इस कारण भी दुखी था कि गोटू उस पर हँस रहा है। तभी उसने गोटू को सबक सिखाने का निश्चय किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'शो' के बाद उस रात जैसे ही सब लोग रात के खाने के लिए इकठ्ठे हुए, मोटू के दिमाग में एक विचार आया। उसने गोटू की प्लेट से २ पूड़ियाँ चुरा कर अपनी जेब में रख लीं। लेकिन गोटू को इस बात का पता न चला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले दिन जब गोटू चमकीले लाल कपड़ों में शो के लिए तैयार हो रहा था, तभी मोटू ने उस की कमीज के पीछे पूड़ियों को लटका दिया। फिर उसने गोटू से कहा, ''जल्दी करो, शो के लिए तुम्हें देर हो रही है।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोटू जल्दी से अपनी कैप पहन कर तंबू से बाहर आया तो ३-४ कुत्तों ने उसके पीछे चलना शुरू कर दिया। गोटू हड़बड़ाता हुआ शो के लिए चल दिया। साथ ही कुत्ते भी भूंकते हुए उसके पीछे-पीछे चलने लगे। मोटू कोने में खड़ा हँस रहा था। तभी सर्कस मैनेजर ने उन दोनों को आवाज दी, ''गोटू मोटू तुम जल्दी से रिंग में जाओ।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोटू ने सर्कस कर्मचार्रियों की सहायता से कुत्तों से पीछा छुड़ाया और रिंग में पहुँचा। जब बच्चों ने गोटू की कमीज पर पूड़ियाँ लटकी देखीं तो उन्होंने सोचा कि यह भी उस के करतब का ही अगला भाग है। फिर एक पालतू कुत्ते ने पूड़ियों को सूंघ कर गुर्राना शुरू कर दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन गोटू ने अपना खेल जारी रखा। उसने हवा में बुलबुले उड़ाने का करतब शुरू किया। मोटू बुलबुलों को पकड़ने के लिए कूदने लगा। तभी एकलंबा सा बुलबुला गोटू की कैप पर जा कर बैठ गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब मोटू उछलने के बाद भी उसे नहीं पकड़ सका, क्योंकि उसका कद छोटा था। वह बुलबुले को पकड़ने के लिए नई योजना बनाने लगा। बच्चे उस दृश्य को देख कर बहुत खुश हो रहे थे। बाद में मोटू एक सीढ़ी लेकर आया और उसे गोटू के सामने लगा दिया। जब वह सीढ़ी पर चढ़ रहा था, तब एक दूसरा पालतू कुत्ता भीड़ में से बाहर आया और गोटू की कमीज पर लगी पूर्ड़ियों पर झपटा। उसने गोटू को भी काट लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोटू दर्द के मारे अपना संतुलन खो बैठा। गोटू, मोटू और कुत्ता सभी धड़ाम से गिर पड़े। अब दोनों जोकर दर्द के मारे चिल्ला रहे थे, जबकि बच्चे यह देख कर हँसने लगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर गोटू और मोटू जल्दी से रिंग से बाहर आए। दोनों को अस्पताल ले जाया गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोटू ने गोटू से माफी मांगी और कहा, ''मैं नहीं जानता था कि मेरा यह मजाक हमें इस परेशानी में डाल देगा।'' अब मोटू और गोटू ने निश्चय किया कि वे फिर ऐसी शरारत कभी नहीं करेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तभी पीछे से आवाज आई, ''नहीं नहीं, ऐसा मत कहो। आज तुम दोनों की वजह से सर्कस का यह करतब बहुत कामयाब रहा है,'' सर्कस का मालिक मोटू और गोटू के लिए गुलदस्ता लिए खड़ा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोटू व मोटू की आँखें खुशी के कारण चमकने लगीं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-8215371135501803856?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/8215371135501803856/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_23.html#comment-form' title='10 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/8215371135501803856'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1301783505505450222/posts/default/8215371135501803856'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post_23.html' title='गोटू व मोटू'/><author><name>chandan kumar</name><uri>https://profiles.google.com/100090925442302127211</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-scursjISG44/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/FCFZo1RrFzo/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1301783505505450222.post-2927102783649154439</id><published>2009-05-21T05:40:00.000-07:00</published><updated>2009-05-26T05:33:49.877-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पत्र'/><title type='text'>सम्पादक का पत्र</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_RAyMNWUM4XQ/Shvhpl7OuhI/AAAAAAAAAfA/WIia6t9GduY/s1600-h/sangh.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 138px; height: 138px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_RAyMNWUM4XQ/Shvhpl7OuhI/AAAAAAAAAfA/WIia6t9GduY/s200/sangh.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5340109887849282066" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे नन्हे मुन्हे दोस्तों और मेरे बड़े पाठकगण आज से मैं इस ब्लॉग की सुरुवात कर रहा हूँ | यह ब्लॉग आपके परिचित ब्लॉग संघ साधना का ही एक अंग है | अंतर सिर्फ यही है की उस ब्लॉग में नन्हे मुन्ने पाठको को बड़े बड़े विषय समझ में नहीं आते है कुछ मित्रो ने मुझे कहा की संपादक महोदय एक ऐसा ब्लॉग होना चाहिए जिसमे छोटे बच्चो के लिए ऐसे विषय हो जिनसे उनके &lt;br /&gt;ज्ञान में वृद्धि हो |&lt;br /&gt;संपादक &lt;br /&gt;चन्दन कुमार &lt;br /&gt;लाल बिल्डिंग  कालोनी &lt;br /&gt;जमशेदपुर &lt;br /&gt;झारखण्ड&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1301783505505450222-2927102783649154439?l=baaljagat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://baaljagat.blogspot.com/feeds/2927102783649154439/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://baaljagat.blogspot.com/2009/05/blog-post.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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